गाजा और भारत की दुविधा

Published at :23 Jul 2014 6:01 AM (IST)
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गाजा और भारत की दुविधा

।। प्रभात कुमार रॉय ।। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य भाजपा की सहानुभूति इस्राइल के साथ उसी तरह रही है, जिस तरह कांग्रेस और वामपंथियों की सहानुभूति फिलिस्तीन के साथ रही है. इसलिए भाजपा नीत एनडीए सरकार किसी भी तरह इस्राइल की आलोचना से बचना चाहती है. फिलिस्तीन की गाजा पट्टी पर विगत […]

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।। प्रभात कुमार रॉय ।।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य

भाजपा की सहानुभूति इस्राइल के साथ उसी तरह रही है, जिस तरह कांग्रेस और वामपंथियों की सहानुभूति फिलिस्तीन के साथ रही है. इसलिए भाजपा नीत एनडीए सरकार किसी भी तरह इस्राइल की आलोचना से बचना चाहती है.

फिलिस्तीन की गाजा पट्टी पर विगत कुछ दिनों से घमासान युद्ध जारी है. गाजा पर हुकूमत करनेवाली कट्टरपंथी तंजीम हमास और इस्राइल पर हुकूमत करनेवाली लिकहुड पार्टी ने यूनाइटेड नेशंस के महासचिव बान की मून की युद्ध विराम की अपील को अनसुना कर दिया है. इस्राइल द्वारा निरंतर दागे जा रहे राकेटों और मिसाइलों ने गाजा में फिलिस्तीन में पांच सौ से अधिक जानें ले चुकी हैं और तेरह हजार से ज्यादा जख्मी हो चुके हैं. हमास द्वारा जवाबी कार्रवाई में इस्राइल के तकरीबन 30 सैनिकों और कुछ नागरिकों की मौत हो चुकी है.

भारतीय संसद में भी गाजा पट्टी के घमासान युद्ध पर कुछ गर्मी छा गयी है, जबकि विपक्ष ने फिलिस्तीनी नागरिकों की निरीह मौतों पर मोदी सरकार की बेरुखी की कटु आलोचना की है. मोदी सरकार की मंशा गाजा के घमासान पर चर्चा कराने की कदापि नहीं थी, किंतु नियम 176 के तहत, जिसमें वोटिंग का प्रावधान नहीं है, आखिरकार सरकार चर्चा के लिए तैयार हुई. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के शीर्षस्थ लीडर के तौर पर भारत ने स्वेजनहर संकट और क्यूबा संकट के न्यायपूर्ण समाधान के लिए शानदार पहलों को अंजाम दी थी. तब भारत ने कभी विश्व महाशक्तियों के नाराज अथवा प्रसन्न होने की कतई परवाह नहीं की थी. लेकिन आज एक अंतरराष्ट्रीय संकट के समाधान के लिए कोई पहल तो दूर, भारत सरकार उस पर चर्चा भी नहीं करना चाहती है.

परंपरागत तौर पर भारत की सहानुभूति सदैव फिलिस्तीनियों के साथ रही है, किंतु इस्राइल और फिलिस्तीन लिबरेशन फ्रंट (अलफतह) के मध्य जब 1993 में ऑस्लो में समझौता हुआ, तब फिलिस्तीनियों को जॉर्डन नदी के वैस्ट बैंक और गाजा पट्टी के क्षेत्रों पर स्वायत्तशासी शासन संचालित करने की राजशक्ति प्राप्त हो गयी. 1994 में फिलिस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकरण का गठन हो गया था और पांच वर्षो की अवधि में फिलिस्तीन को पूर्ण राष्ट्र का दर्जा हासिल हो जाना था, लेकिन दुर्भाग्यवश फिलिस्तीन को पूर्ण राष्ट्र का दर्जा अब तक हासिल नहीं हुआ है. तकरीबन 21 वर्षो के पश्चात फिलिस्तीन में अब हालात एकदम बदल गये हैं, फिलिस्तीन के वर्तमान राष्ट्रपति महमूद अब्बास हैं, किंतु स्वायत्तशासी फिलिस्तीन के गाजा पर उनकी धुर विरोधी तंजीम हमास की हुकूमत चलती है. उदारवादी अलफतह का शासन वस्तुत: जॉर्डन नदी को वैस्ट बैंक पर स्थित फिलिस्तीन क्षेत्र तक सीमित रह गया है.

भाजपा की सहानुभूति सदैव ही इस्राइल के साथ उसी तरह रही है, जिस तरह कांग्रेस और वामपंथियों की सहानुभूति फिलिस्तीन के साथ रही है. इस्राइल के साथ भारत के कूटनीतिक रिश्ते अब बहुत गहरे हो चुके हैं. भाजपा की हुकूमत किसी भी तरह इस्राइल की आलोचना से बचना चाहती है. यही कारण रहा कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कोशिश की कि संसद में गाजा पर कोई चर्चा न की जाये, किंतु राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने सुषमा स्वराज की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और नियम 176 के तहत चर्चा की अनुमति दे दी.

जब अरब देशों में कट्टर इसलामिक विचारधारा का प्रभाव बढ़ने लगा, तो फिलिस्तीन में यासर अराफात की उदारवादी अलफतह तंजीम का प्रभाव अत्यंत कम होने लगा, जो अपने एक हाथ में समाजवाद और जनतंत्र का परचम लेकर और दूसरे हाथ में हथियार लेकर दीर्घकाल से फिलिस्तीनियों का नेतृत्व करती रही. फिलिस्तीनियों के मध्य उभरी वैचारिक फूट का दुष्परिणाम हुआ कि अब तक फिलिस्तीन को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल पाया है. फिलिस्तीनियों में कट्टरपंथी आक्रामक हमास का प्रभाव बढ़ने और गाजा पर उसकी सत्ता स्थापित होने का परिणाम हुआ कि फिलिस्तीनियों के साथ शांति-समझौता चाहनेवाली इस्राइल की वामपंथी लेबर पार्टी के स्थान पर दक्षिणपंथी लिकहुड पार्टी की शक्ति बहुत बढ़ गयी और आजकल वही इस्राइल में सत्तानशीन है. अब दोनों तरफ की कट्टरपंथी ताकतें सत्तानशीन हैं, तो आखिरकार जंग कब और कैसे समाप्त होगी, कुछ कहा नहीं जा सकता.

इस्राइल पर अमेरिकी नेतृत्व में नाटो राष्ट्रों का सबसे अधिक कूटनीतिक प्रभाव रहा है, क्योंकि उसको प्रबल सैन्य शक्ति बनाने में नाटों राष्ट्रों की बड़ी भूमिका है. हमास पर ईरान का प्रभाव रहा है, जो कि उसे अत्याधुनिक हथियार और वैचारिक खुराक मुहैया कराता है. गाजा में जारी घमासान जंग और अधिक बढ़ेगी, तो इसका असर समूचे अरब क्षेत्र पर पड़ेगा. अपनी कूटनीतिक दुविधा का पूर्णत: परित्याग करके गाजा युद्ध को समाप्त करने के लिए भारत सरकार को अपने कूटनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि उसके आजकल अमेरिका और ईरान दोनों देशों के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं. किसी संकट का न्यायपूर्ण समाधान करने की दिशा में पहल करने में किसी पक्ष की नाराजगी और प्रसन्नता की परवाह भारत को नहीं करनी चाहिए.

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