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भारत-अमेरिकी संबंध की दिशा

Updated at : 28 Jun 2019 7:39 AM (IST)
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भारत-अमेरिकी संबंध की दिशा

पुष्पेश पंत अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार pushpeshpant@gmail.com अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो का भारत दौरा उस वक्त संपन्न हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के संबंध काफी असहज हैं. छोटे-बड़े अनेक मतभेद अंतरराष्ट्रीय सामरिक परिप्रेक्ष्य और उभयपक्षीय राष्ट्रहितों के टकराव के कारण प्रकट हो रहे हैं. पिछले लगभग तीन दशक से भारत और अमेरिका […]

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पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो का भारत दौरा उस वक्त संपन्न हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के संबंध काफी असहज हैं. छोटे-बड़े अनेक मतभेद अंतरराष्ट्रीय सामरिक परिप्रेक्ष्य और उभयपक्षीय राष्ट्रहितों के टकराव के कारण प्रकट हो रहे हैं. पिछले लगभग तीन दशक से भारत और अमेरिका के संबंध क्रमशः प्रगाढ़ और गुटनिरपेक्षता के युग वाला परस्पर अविश्वास पूरी तरह मिट चुका था. जब से भारत ने आर्थिक सुधारों का सूत्रपात किया है, अमेरिका के साथ पूंजीवाद बनाम समाजवाद जैसी सैद्धांतिक बहस बेमानी हो गयी है.
खासकर जब यूपीए के कार्यकाल में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाण्विक ऊर्जा के शांतिपूर्ण करार पर हस्ताक्षर करने के लिए अपनी सरकार दांव पर लगा दी थी, तब से आम भारतीय सोचता आ रहा है कि भारत अमेरिका के बहुत करीब है. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मास्टर कार्ड जैसी बड़ी कंपनियों के मुख्य कार्यकारी भारतवंशी ही हैं. पहले कार्यकाल में मोदी की अमेरिका यात्रा और तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा के साथ उनकी आत्मीय दोस्ती ने इस मान्यता को पुष्ट किया कि दोनों देशों के बीच मनमुटाव नहीं है. फिर क्या कारण है कि पॉम्पियो की यात्रा को लेकर गंभीर आशंकाए मुखर हो रही हैं?
भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर के साथ पॉम्पियो ने जो संयुक्त बयान जारी किया है, उसमें राजनयिक शब्दाडंबर के बावजूद इस बात को छुपाया नहीं जा सका कि दोनों देशों के बीच अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर मतभेद बरकरार हैं.
पॉम्पियो ने कहा कि दुनिया में कोई भी देश चाहे कितने भी करीबी दोस्त क्यों ना हों, उनके बीच कुछ ना कुछ मतभेद बचे रहते हैं और यह स्वाभाविक ही है. संवाद से इनका समाधान निकाला जाता है यही जनतांत्रिक राजनयी की खूबी है. जयशंकर ने इसी सच को दूसरे शब्दों में व्यक्त किया और इस बात के लिए अमेरिका का आभार प्रकट किया कि वह हिंद प्रशांत क्षेत्र में आवागमन को अाबाद रखने में भारत के साथ सहयोग कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के विरुद्ध उसकी सहायता के लिए तत्पर रहा है.
पर जब प्रेस सम्मेलन में यह प्रश्न पूछा गया कि क्या ईरान के चाबहार बंदरगाह के विषय में कोई बातचीत हुई, तो उन्होंने जवाब दिया नहीं, इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि फिलहाल इस बारे में कोई टकराव नहीं है. फिलहाल भले ही ट्रंप का अमेरिका चाबहार को भारत के साथ विवाद का मुद्दा नहीं बनाना चाहता, भविष्य में वह ऐसा कर सकता है. यह बात रेखांकित करना जरूरी है कि पॉम्पियो ने ईरान को दुनियाभर में आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक घोषित किया है.
अमेरिका की नजर में ईरान आतंकवादी हो सकता है, पर भारत इस राय से सहमत हो, यह जरूरी नहीं. भारत जिस कट्टरपंथी जेहादी आतंकवाद का शिकार है उसका प्रायोजक ईरान नहीं, बल्कि अमेरिका का मित्र सऊदी अरब है. सऊदी से ही पाकिस्तान को संरक्षण, सहायता और प्रोत्साहन मिलता रहा है.
पश्चिम एशिया की रणभूमि में अमेरिका जिन तत्वों के साथ है, उनके खिलाफ रूस, ईरान और लेबनान तथा कुर्द खड़े हैं. यहां बुनियादी टकराव यमन से लेकर सूडान तक सुन्नी सऊदी अरब और शिया ईरान के बीच है. ऊर्जा सुरक्षा अर्थात तेल की राजनीति में भी यह द्वंद्व सऊदी अरब और ईरान के बीच है.
सद्दाम हुसैन के खात्मे के बाद इराक के तेल कूपों को हथियाने के बाद अमेरिका की रणनीति ईरान को एक तेल निर्यातक शक्ति के रूप में ध्वस्त करने की है, ताकि सऊदी अरब की मदद से वह और उसका बगल बच्चा इस्राइल यूरोप पर अपना प्रभुत्व उनकी तेल आपूर्ति को नियंत्रित कर अच्छी तरह कर सकता है. जयशंकर ने भारतीय हितों को अमेरिकी हितों से अलग करते हुए यह जोड़ना जरूरी समझा कि ईरान के साथ भारत के संबंध सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं. इसके दूसरे ऐतिहासिक-सांस्कृतिक आयाम भी हैं.
मध्य एशिया की राजनीति में चीन ही भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है. वह जिस ऐतिहासिक रेशम राजमार्ग के पुनर्निर्माण से ग्वादर के पोत तक पहुंचना चाहता है, वह वास्तव में दक्षिण एशिया में भारत की घेराबंदी और प्रकारांतर से रूस को बचाव की मुद्रा में रहने को विवश करने का प्रयास है.
जहां अमेरिका अपनी सामरिक नीति के अनुसार भारत को अफगानिस्तान के दलदल में धंसाना चाहता है, वहीं भारत ईरान में चाबहार तक अपनी पहुंच बढ़ा रूस के साथ उस उत्तर-दक्षिण गलियारे को वन बेल्ट वन रोड के मुकाबले खड़ा करना चाहता है, जिसकी चर्चा यूपीए के पहले कार्यकाल में मनमोहन सिंह के पलटी खाने के पहले काफी गर्म थी. तब अजरबैजान से भारत तक लायी जानेवाली तापी गैस पाइपलाइन लाने का शोर मचा. पता नहीं क्यों आज रूस के साइबेरिया क्षेत्र में उस सखालिन तेल-गैस निवेश को हम एकदम भूल गये हैं, जिसमें भारत ने कई अरब डॉलर लगाये थे.
अमेरिका को आज उस सैनिक साज-सामान की खरीदारी को लेकर भी सिरदर्द है, जो भारत रूस से कर रहा है. पश्चिम एशिया में पुतिन की दुस्साहसिक नीतियों को देखते हुए और उक्रेन में सैनिक हस्तक्षेप के बाद अमेरिका ने रूस पर प्रतिबंध लगाये हैं. पर ट्रंप के लिए यह समझना परमावश्यक है कि आधी सदी से भी अधिक समय से भारत सैनिक साज-सामान की खरीदारी रूस से करता रहा है. मोदी कार्यकाल में भारत ने रूस से इतर विकल्प तलाशने शुरू किये हैं. जिनमें फ्रांस से राफेल और इस्राइल से परिष्कृत टेक्नोलॉजी का आयात शामिल है.
कुछ छोटे-छोटे मुद्दे हैं, जिन पर अमेरिकी रियायत कर भारत को बड़ी रियायत के लिए मजबूर करने का प्रयास कर रहे हैं. एच1-बी वीजा की संख्या बढ़ाने से कुछ खास हासिल होनेवाला नहीं. जब तक अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद निर्बाध रूप से नहीं पहुंचते, तब तक अमेरिकी उत्पादों और सेवाओं के लिए अपना बाजार खोलने की भारत की मजबूरी नहीं होनी चाहिए. ट्रंप विश्व व्यापार संगठन को नष्ट करने की धौंस-धमकी दे अमेरिकी बाजार को संरक्षित रखना चाहते हैं.
पर चीन के साथ वाणिज्य युद्ध की घोषणा कर उन्होंने अपने लिए विकट चुनौती पैदा की है. भारत-अमेरिकी संबंध अंततः विदेश मंत्री स्तर के संवाद से तय होनेवाले नहीं. जी-20 सम्मेलन के अवसर पर शी, आबे और पुतिन के साथ मोदी की मुलाकात ही इस बात का फैसला करेगी कि ट्रंप भारतीय प्रधानमंत्री पर कितना दबाव बना सकते हैं? अंत में याद रखें- शक्तियों के संबंध व्यक्तिगत दोस्ती पर नहीं, राष्ट्रहितों के अनुसार ही समायोजित होते हैं.
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