शब्दों में बड़ी ताकत होती है
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 25 Jun 2019 6:00 AM
श्रीप्रकाश शर्मा टिप्पणीकार spsharma.rishu@gmail.com शब्दों में गजब की ताकत होती है. गहन रिसर्च के बाद दुनियाभर के मनोविश्लेषक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि शब्द महज अभिव्यक्ति के माध्यम की एक बेसिक यूनिट नहीं हैं, बल्कि ये हमारी मनोदशा को भी महती रूप से प्रभावित करते हैं. कदाचित यही कारण है कि शब्द-प्रयोग के औचित्य […]
श्रीप्रकाश शर्मा
टिप्पणीकार
spsharma.rishu@gmail.com
शब्दों में गजब की ताकत होती है. गहन रिसर्च के बाद दुनियाभर के मनोविश्लेषक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि शब्द महज अभिव्यक्ति के माध्यम की एक बेसिक यूनिट नहीं हैं, बल्कि ये हमारी मनोदशा को भी महती रूप से प्रभावित करते हैं.
कदाचित यही कारण है कि शब्द-प्रयोग के औचित्य और अनौचित्य पर हमारे जीवन की खुशी और खामोशी निर्भर करती है. यदि हम शब्दों को उनके अर्थ की उपयुक्तता और संदर्भ की गंभीरता को बिना तौले हुए जीवन में प्रयोग करते हैं, तो हम खुद के लिए अनचाहे मुसीबतों का जाल बुनते हैं, जिससे निजात का रास्ता सहज नहीं होता है.
आज जब ह्वाॅट्सएप, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, ट्विटर इत्यादि ने हमारे जीवन में घुसपैठ कर लिया है, तो हमारी जीवन शैली, सोच के ढंग और चारित्रिक और नैतिक मूल्यों के मानकों में भी बड़ी तब्दीलियां आयी हैं.
इन परिवर्तनों के साथ शब्दों के प्रयोग के संस्कार के एक अजीब संस्करण का भी आगाज हुआ है. सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई के नाम पर जिस कदर बिना लगाम के अपने कुत्सित विचारों और झूठे समाचारों को पोस्ट किया जाता है, उन पर कमेंट किया जाता है और जितनी शीघ्रता से उन्हें शेयर किया जाता है, यह हमारे लिए गंभीर चिंता का विषय है.
पत्र-पत्रिकाओं में छपे कार्टूनों और लेखों के माध्यम से युक्तिगत आक्षेपों के साथ-साथ उच्च पदों पर सार्वजनिक हस्तियों और सेलिब्रिटीज की निजता और शालीनता को तार-तार करने की घातक प्रवृत्तियों ने सामाजिक सद्भाव और परस्पर प्रेम-भाव में जहर घोलने का काम किया है. स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को जहां जीवन को डिग्निटी प्रदान करने के लिए सुनिश्चित किया गया था, आज उसी के दुरुपयोग के कारण जीवन में आत्मसम्मान का तेजी से अपहरण हुआ है.
प्रश्न उठता है कि आखिर सरेआम अपने भावों और विचारों को अभिव्यक्त करने की क्या कोई लक्ष्मण रेखा नहीं होनी चाहिए? जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक और मनोविश्लेषक फ्रेडरिक नीत्शे ने एक बार कहा था, ‘मुझे केवल कागज का एक पन्ना और जिससे लिखा जाये ऐसी कोई चीज मिल जाये, तो मैं दुनिया को ऊपर से नीचे तक घुमा सकता हूं.’
आशय यही है कि इस दुनिया में मन के अनियंत्रित भाव से घातक कोई चीज नहीं होती है. मन में उपजे विचारों को यदि हवा दे दी जाये, तो इसकी लपट में दुनिया को खाक करने की क्षमता होती है. विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में महात्मा गांधी के इस विचार में दुनिया के वर्तमान संकट का अचूक समाधान छुपा हुआ है, ‘समाचारपत्रों में बड़ी शक्ति होती है, ठीक वैसी ही जैसी कि पानी के जबरदस्त प्रवाह में होती है.
इसे खुला छोड़ देंगे तो गांव के गांव बहा देगा. उसी तरह निरंकुश कलम समाज के विनाश का कारण बन सकती है. लेकिन अंकुश भीतर का होना चाहिए, बाहर का अंकुश तो और भी जहरीला होगा.’ इसलिए अपने भावों को व्यक्त करने के लिए अंकुश कलम पर नहीं, शब्दों पर नहीं, बल्कि मन पर लगाने की दरकार है.
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