फौरी उपायों के बाद दूर की सोचें

Published at :18 Jul 2014 4:43 AM (IST)
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फौरी उपायों के बाद दूर की सोचें

इस बार पूरे देश में मानसून के गड़बड़ाने से पर्याप्त वर्षा नहीं हो रही है. झारखंड की स्थिति भी खराब है. सिमडेगा, पलामू, गढ़वा जिलों में सामान्य से काफी कम वर्षा हुई है. राज्य के अन्य हिस्सों में भी वर्षा सामान्य से कम है. अगर एक सप्ताह में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई, तो राज्य सूखे […]

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इस बार पूरे देश में मानसून के गड़बड़ाने से पर्याप्त वर्षा नहीं हो रही है. झारखंड की स्थिति भी खराब है. सिमडेगा, पलामू, गढ़वा जिलों में सामान्य से काफी कम वर्षा हुई है. राज्य के अन्य हिस्सों में भी वर्षा सामान्य से कम है. अगर एक सप्ताह में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई, तो राज्य सूखे की चपेट में आ सकता है. अभी तक रोपनी भी नहीं हुई है.

अब किसानों को वैकल्पिक खेती के लिए भी तैयार रहना चाहिए. ऐसी बात नहीं है कि इससे निबटने के लिए सरकार तैयारी नहीं कर रही है. शुक्रवार को रांची में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बैठक की और पलामू-गढ़वा के लिए विशेष पैकेज देने की घोषणा की. इससे इन जिलों को राहत मिलेगी. लेकिन इससे समस्या का पूरा समाधान नहीं हो जायेगा. राज्य में कई जिले ऐसे हैं जहां के किसान परेशान हैं. उन सभी जिलों को चिह्न्ति कर वहां के लिए भी राहत की घोषणा करनी होगी. पलामू का इलाका लंबे समय से सूखा की चपेट में रहा है. लेकिन इस क्षेत्र में सूखे से निबटने के लिए लंबी योजना नहीं बनायी जाती. जब संकट गहरा हो जाता है, तो तंत्र सक्रिय होता है.

इसी पलामू प्रमंडल में कई ऐसी सिंचाई परियोजनाएं हैं जो वर्षो से लंबित पड़ी हैं. अगर ये योजनाएं पूरी हो जातीं, तो सूखे से निबटने में आसानी होती. सरकार का ध्यान इस ओर भी जाना चाहिए कि सिंचाई परियोजना क्यों नहीं पूरी होती? व्यवस्था ऐसी हो कि अगर कम वर्षा भी हो, तब भी किसानों को फर्क नहीं पड़े. आज राज्य के बड़े हिस्से में सिंचाई की सुविधा नहीं है. खेती के लिए पूर्णत: वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है. अभी तो बुआई व रोपाई का संकट है, लेकिन अगर वर्षा नहीं हुई तो तालाब, डैमों में पानी नहीं भरेगा और पीने के पानी का भी संकट हो सकता है.

इसलिए एक ओर सरकार स्थिति से निबटने के लिए फौरी योजना बनाये जिससे किसानों को राहत मिले. उसके बाद उन लंबित परियोजनाओं को भी शीघ्र पूरा करे जो 30-40 साल से अधूरी हैं. इसी झारखंड में सत्तर के दशक से सुवर्णरेखा परियोजना चल रही है. लागत कई गुना बढ़ गयी है, लेकिन योजना पूरी नहीं हुई. इस बार का संकट और गंभीर है, क्योंकि पूरे देश में कम वर्षा हुई है. इसलिए यहां के गरीब लोगों को दूसरे राज्यों में भी खेती का काम नहीं के बराबर मिलेगा.

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