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दक्षिण भारत मोदी के असर से अछूता

Updated at : 24 May 2019 4:12 AM (IST)
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दक्षिण भारत मोदी के असर से अछूता

आर राजागोपालन वरिष्ठ पत्रकार rajagopalan1951@gmail.com द क्षिण भारत में तेलुगु देशम, तेलंगाना राष्ट्र समिति, द्रमुक, अन्ना द्रमुक, जनता दल (सेकुलर), वायएसआर कांग्रेस दक्षिण भारत के प्रमुख क्षेत्रीय दल हैं. चंद्रबाबू नायडू और एमके स्टालिन ने उत्तर भारतीय मतदाताओं के मन-मस्तिष्क को नहीं समझा. द्रमुक और टीडीपी ने मोदी को कमतर आंका. यही वह सीख है, […]

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आर राजागोपालन
वरिष्ठ पत्रकार
rajagopalan1951@gmail.com
द क्षिण भारत में तेलुगु देशम, तेलंगाना राष्ट्र समिति, द्रमुक, अन्ना द्रमुक, जनता दल (सेकुलर), वायएसआर कांग्रेस दक्षिण भारत के प्रमुख क्षेत्रीय दल हैं. चंद्रबाबू नायडू और एमके स्टालिन ने उत्तर भारतीय मतदाताओं के मन-मस्तिष्क को नहीं समझा. द्रमुक और टीडीपी ने मोदी को कमतर आंका. यही वह सीख है, जिसे 2019 में नरेंद्र मोदी की जीत से सीखा जा सकता है.
दक्षिण भारत के लिए इस चुनाव का अभिप्राय यह है कि दक्षिण और उत्तर भारत के बीच पूर्ण विभाजन है. मोदी ने राजनीतिक तौर पर चंद्रबाबू नायडू को मात दे दी है. अब नायडू अपना मुंह कहां दिखायेंगे? नायडू द्वारा किये गये सभी वादों का अब क्या होगा? आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती क्या उन्होंने बनायी? कंप्यूटीकरण के चैंपियन होने के नाते क्या चंद्रबाबू नायडू ईवीएम मुद्दे पर आयेंगे और उसमें खराबी होने को दोष देंगे?
नायडू ने अपनी कहानी खत्म कर दी. वे दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता में व्यस्त रहे हैं. वे एक जगह से दूसरी जगह जाते रहे हैं. उनके राजनीतिक रसूख का क्या होगा? तेलुगु देशम पर आंध्र प्रदेश में ग्रहण लग गया है. एनडीए सरकार से असमय अपना समर्थन वापस लेने के कारण भाजपा ने टीडीपी को सबक सिखाया.दो वर्षों के लिए नायडू ने आंध्र प्रदेश के विकास को अवरुद्ध कर दिया और उसे पीछे धकेल दिया.
दूसरी तरफ जगन रेड्डी नियमित तौर पर मतदाताओं का समर्थन जुटाते रहे. वे तभी से सक्रिय रहे हैं, जब उनके पिता वायएस राजशेखर रेड्डी की मृत्यु के बाद राहुल गांधी और सोनिया गांधी द्वारा उन्हें दरकिनार कर दिया गया था. उन्होंने तेलुगु देशम के आधार को समाप्त कर दिया है. क्या चंद्रबाबू नायडू अब राष्ट्रीय जनतांत्रित गठबंधन से बाहर आने के लिए पश्चाताप करेंगे? क्या उन्हें 2014 में मिले लोकप्रिय जनादेश के साथ विश्वासघात करने के कारण तो दरकिनार नहीं किया गया, जो उन्हें नरेंद्र मोदी के कारण मिला था?
दक्षिण के आठ मुख्य क्षेत्रीय दलों की राष्ट्रीय राजनीति में इस बार कोई प्रासंगिकता नहीं है. कारण, मोदी ने एकतरफा जीत दर्ज की है. वर्ष 2014 में जयललिता ने तमिलनाडु की 39 में 37 सीटें जीती थीं. वे राष्ट्रीय राजनीति में अप्रासंगिक थीं. उन्हें केवल लोकसभा उपाध्यक्ष का पद मिला और वे एस थंबीदुरई हैं. अभी तमिलनाडु में डीएमके प्रमुख विजेता है. एमके स्टालिन को चाहे जितनी भी सीटें मिले, डीएमके अप्रासंगिक रहेगी. वह डीएमके ही थी, जिसने कहा कि मोदी वापस जाओ. उसका क्या हुआ? वह डीएमके ही थी उसने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश किया था. उसका क्या हुआ? वे स्टालिन ही थे, जिन्होंने सोचा था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन रहे हैं.
दक्षिण भारत उत्तर भारत के राजनीतिक मिजाज को नहीं पढ़ पाया, जहां भाजपा ने भारी कामयाबी हासिल की है. दक्षिणी राज्यों में राष्ट्रवाद मुद्दा नहीं है, जबकि पुलवामा और बालाकोट उत्तर भारत में चुनावी भाषणों का प्रमुख विषय था. ऐसा दक्षिण में नहीं था. हालांकि, कर्नाटक और तेलंगाना में हिंदुत्व निश्चित रूप से एक मुद्दा था, लेकिन तमिलनाडु में क्या स्थिति है? मोदी और अमित शाह अब तमिलनाडु पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे. उत्तर का बाद वे दक्षिण का रुख करेंगे. अगले साल तमिलनाडु में कभी भी चुनाव हो सकते हैं. भाजपा वहां त्रिपुरा की तरह प्रदर्शन करना चाहेगी.
साल 2020 या 2021 में मोदी और शाह यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि दक्षिण भारत से 2024 के आम चुनाव में 130 में से कम-से-कम 50 सीटें भाजपा को मिलें. भाजपा अपनी तैयारी पांच साल पहले कर लेती है और वह राहुल गांधी की कांग्रेस की तरह नहीं है, जो भारत को पिछले दशकों में ले जाना चाहती है.
आप चाहे जैसे इस लोकसभा चुनाव का विश्लेषण करें, यह दक्षिणी राज्यों के लिए निश्चित रूप से एक धक्का है. और, क्षेत्रीय दलों की इन जीतों के बाद भाजपा पक्के तौर पर अपने भविष्य की योजना तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश को ध्यान में रखते हुए तैयार करेगी.
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