राख के आंचल में आग पलती है

Published at :12 Jul 2014 4:58 AM (IST)
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राख के आंचल में आग पलती है

।। चंचल ।। सामाजिक कार्यकर्ता राखी के सीने में आग है. जब सारी दुनिया जल कर बुझ जायेगी, तब इस राखी के सीने से जो आग निकलेगी, वह घर नहीं चूल्हे जलायेगी. यह गांव की पूंजी है. शहर इसके लिए झंखता है. लोगों का कहना है कि सिर्नेत सिंह पगला गये हैं. दिन भर चौराहे […]

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।। चंचल ।।

सामाजिक कार्यकर्ता

राखी के सीने में आग है. जब सारी दुनिया जल कर बुझ जायेगी, तब इस राखी के सीने से जो आग निकलेगी, वह घर नहीं चूल्हे जलायेगी. यह गांव की पूंजी है. शहर इसके लिए झंखता है.

लोगों का कहना है कि सिर्नेत सिंह पगला गये हैं. दिन भर चौराहे पर बैठे रहते हैं और आने-जानेवाले को रोक कर हर्र-हर्र करते हैं. घास छोलने जा रही महिलाओं की टोली देखते ही सिर्नेत सिंह खड़े हो गये. दूकच्छी धोती घुटने के ऊपर ही रहती है, नंगे पांव एक हाथ में बांस का डंडा लिये सिर्नेत सिंह ने हुर्र-हुर्र किया, फिर हर्र-हर्र करने लगे. महिलाओं की टोली ठमक कर खड़ी हो गयी. मुग्धा, मध्या और प्रौढ़ा कुछ घूंघट में कुछ मुंह उघार, सबकी ठिठोली पल भर के लिए ठहर गयी. आंखों में तरस-करुणा का भाव उभर आया- सिर्नेत सिंह, भरापूरा परिवार, अच्छी खासी जमीन के मालिक, परोपकारी मन.. आज उनकी यह हालत..

छोटका कहारिन खुरपी खांची समेत सिर्नेत के नजदीक आयी- घर जा देवर कुछ खाय-पी ल, सुबह से हियंयी बाटा.. भूख लगी होय. सिर्नेत ने तरेर कर देखा- ना भौजाई. हम सिरीरामपुर गये रहे, पहिले नोवाखाली गये. पता चला बापू आगे गये, हम भी भागे. जाके मिले सिरीरामपुर में. उहीं भोजन-भजन भवा. बापू ने कहा गांव जाकर उसकी पहरेदारी करो, कुछ लोग गांव को शहर बनाना चाह रहे हैं, उसे रोकना. तब तक हम आ रहे हैं. कहते-कहते सिर्नेत थक कर बैठ गये. अषाढ़ की उमस, उम्र का तकाजा. तब तक आसरे ने चाय बढ़ा दी. सिर्नेत ने गौर से आसरे को देखा- पर पइसा तो है नहीं बाबू! आसरे वहीं बैठ गया-कोई बात नहीं कक्का! पैसा मिल गया है. चिखुरी काका ने पैसा दे दिया है.

चिखुरी? चाय पकड़ते-पकड़ते सिर्नेत सिंह रुक गये- सुराजी है बेटा, पंडित जी के साथ नैनी जेल में रहा. मौलाना इसे बहुत मानते रहे. बहुत दिन हुआ उसे देखे हुए. मिलवाओगे? आसरे ने बात काटी. पहले चाय पी लीजिए नहीं तो ठंडी हो जायेगी. सिर्नेत सिंह बमक उठे- पुदई की औलाद! चाय ठंढी हो जायेगी, इसकी फिकर ज्यादा है? मुल्क की सड़क ठंडी हो गयी है, इसकी रत्ती भर परवाह नहीं है?

नौजवानों का सीना सिकुड़ रहा है, उसकी सोच ठंडी हो गयी है, इसकी खबर भी नहीं? जालिमों का जुल्म बढ़ता जा रहा है, सुना नहीं कल गांधी मैदान में डॉ लोहिया बोल रहे थे, जालिम वही पलते हैं जहां दब्बू रहते हैं. यह मुल्क ही दब्बुओं से भर गया है. कहां है चिखुरी. चलो हम पूछेंगे इसी वास्ते मुल्क को आजाद कराये थे. कहां हो चिखुरी खड़े हो जाओ. जनता सवाल पूछ रही है. यह कह कर सिर्नेत सिंह उठ गये.

सिर्नेत को आता देख चिखुरी का दरबार सकते में. सब उठ कर खड़े हो गये. नवल उपाधिया ने दूसरी तरफ मुंह घुमाया- ये लो अब इन्हें ङोलो. चिखुरी ने घुड़का- नवल! सब चुप. सिर्नेत ने दो बार हर्र-हर्र का नारा दिया, फिर चालू हो गये- चिखुरी, आपने मौलाना को ढेरा चलाना सिखाया था, नैनी में, याद है? कल मिले थे मौलाना अबुल कलाम आजाद. बता रहे थे कि आपने किस तरह उन्हें ढेरा चलाना सिखाया (ढेरा तकली जैसा एक देसी यंत्र है जिससे सन का सूत काता जाता था. इससे रस्सी वगैरह बनती है). हम पूछने आये हैं, कहां गयी वह तकली? सुना है अंगरेजी मीडियम ने वह तकली लील ली? कहां थे चिखुरी?

कल वारेन हिस्तेंगिज को सुना? कुटीर उद्योग को धीरे-धीरे मारो. लोहार, कुम्हार, धुनिया, इन्हें खत्म करो. अब गांव को शहर बनाया जायेगा. बताओ चिखुरी, जब गांव शहर बन जायेगा, तो देश कहां जायेगा? लखन कहार ने उमर दरजी को कुहनी मारी, सोचा रहा कि गांव शहर बनी तो गोरी-गोरी देखन को मिलिहैं. ई तो चले आये उसे भी रोकने? गनीमत थी कि यह न तो चिखुरी सुन पाये न ही सिर्नेत. लाल्साहेब सुने जरूर, लेकिन मुस्कुरा कर रह गये. सिर्नेत बांस को दीवार से टिकाये और धोती के खूंट से कागद की एक पुड़िया निकाले. उसे सर से लगाया. खुली पुड़िया को अपलक देखते रहे. आज यह पहली दफा हो रहा था कि उनके पास पुड़िया है. पर किसकी हिम्मत की उनसे पूछ ले कि इसमें क्या है. लेकिन चिखुरी ने पूछा- इसमें क्या है बड़े भाई? सिर्नेत ने बड़े गौर से चिखुरी को देखा. कमर के बल झुके, पुड़िया को दोनों हथेली रख कर सब के सामने कर दिया- एक साथ कई चीत्कार- राखी?

सिर्नेत ने संजीदगी से पुड़िया संभाली. हां, राखी है. इसके सीने में आग है. जब सारी दुनिया जल कर बुझ जायेगी, तब इस राखी के सीने से जो आग निकलेगी, वह घर नहीं चूल्हे जलायेगी. यह गांव की पूंजी है. शहर इसके लिए झंखता है. राखी की यह पुड़िया हमें लाल बहादुर शास्त्री ने दी थी और हमने उनके साथ नारा लगाया था- जय जवान, जय किसान. आज गांव को शहर बनाने की बात हो रही है. हुर्र-हुर्र करते हुए सिर्नेत चले गये. नवल उपाधिया ने सन्नाटा चीरा-एक से एक पागल हैं. चिखुरी बुदबुदाये-तुम क्या जानोगे कि पागल क्या कह के जा रहा है.. और राखी? चिखुरी चुप रहे, दरबार उठ गया.

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