इत्ते प्रतिशत, उत्ते प्रतिशत

आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार [email protected] उस परीक्षा में वह लड़की 99 प्रतिशत नंबर ले आयी, पर वह 100 प्रतिशत खुश न थी. एक प्रतिशत नंबर कम क्यों आये, यह दुख था. जिस तरह से परीक्षाओं में नंबर-वितरण हो रहा है, उसे देखते हुए अंतरराष्ट्रीय गणित परिषद् यह भी फैसला कर सकती है कि अब सौ […]
आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
उस परीक्षा में वह लड़की 99 प्रतिशत नंबर ले आयी, पर वह 100 प्रतिशत खुश न थी. एक प्रतिशत नंबर कम क्यों आये, यह दुख था. जिस तरह से परीक्षाओं में नंबर-वितरण हो रहा है, उसे देखते हुए अंतरराष्ट्रीय गणित परिषद् यह भी फैसला कर सकती है कि अब सौ में से 110 नंबर देना या 150 नंबर देना भी गणितीय तौर पर वैध माना जायेगा. नंबर फट रहे हैं, सौ प्रतिशत के दायरे में ना समा रहे.
इस कदर प्रतिशतबाजी हो रही है कि उस टीवी चैनल पर एंकर कह रहा था कि केजरीवालजी और कांग्रेस का गठबंधन दिल्ली में 99 परसेंट था. पचास परसेंट हो भी सकता था, 49 परसेंट नहीं भी हो सकता था, कुल मिला कर 99 परसेंट था.
मामला पेचीदा है, पाॅलिटिक्स में कुछ भी काम शत-प्रतिशत ना होता. जो नेता अभी राष्ट्रवाद के नाम पर शत-प्रतिशत झूलता दिख रहा है, वह कल ही एकदम घनघोर सेकुलरत्व की ओर कूच कर सकता है, तब भी वह शत-प्रतिशत सेकुलर नहीं होगा. इसलिए नेता का कुछ भी शत-प्रतिशत कभी न होता. शत-प्रतिशत तो सिर्फ नेता की कुर्सी-आकांक्षा होती है, ऐसे-वैसे या चाहे जैसे भी मिल जाये कुर्सी.
शरद पवार क्या शत-प्रतिशत कांग्रेस के राहुल गांधी के साथ हैं, इस सवाल का जवाब शत-प्रतिशत देना मुश्किल है, शरद पवार लगभग कांग्रेसी हैं, पर अगर यह गुंताड़ा लग गया कि तमाम दलों के समर्थन से उनके खुद के पीएम बनने का स्कोप हो जाये, तो वह कांग्रेस के विरोधी हो सकते हैं. केजरीवाल शत-प्रतिशत कांग्रेस विरोधी थे, फिर शत-प्रतिशत कांग्रेस समर्थक बनने को तैयार हो गये. अब वह लगभग कांग्रेस समर्थक भी हो सकते हैं, मौका और मुकाम देख कर.
आंध्र के चंद्राबाबू नायडू के बारे में कोई भी कभी भी नहीं कह सकता है कि वह शत-प्रतिशत किधर के हैं. आंध्र के नेता जगन रेड्डी के पिता कांग्रेस के बड़े नेता थे, जगन कांग्रेस के विरोधी हैं, पर क्या वह मोदी के साथ हैं? जी, इस सवाल का शत-प्रतिशत पक्का जवाब नहीं दिया जा सकता. जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि शत-प्रतिशत तो नेता कुर्सी को लेकर ही होता है कि मिलनी चाहिए.
बहुत पहले महाराष्ट्र के नेता राज ठाकरे मोदी के साथ थे शत-प्रतिशत. अब वह मोदी के खिलाफ हैं शत-प्रतिशत. राज ठाकरे शत-प्रतिशत किसके साथ हैं, यह अभी नहीं पता. किसी भी मसले पर नेता लगभग होने के बिंदु पर हो, तब ही नेता सा दिखता है. किसी भी बिंदु पर एकदम पक्की राय तो वैज्ञानिक होने का भ्रम दे देती है. पक्का हो जाये नेता, तो उसका पतन सुनिश्चित है, लगभग रहे, तो इधर से उधर भाग सकता है.
उधर से फिर इधर भाग सकता है. कहीं लग और फिर यहां से भाग, राजनीतिक तौर पर लगभग होने में ही मजे हैं. पक्का नेता वैज्ञानिक के स्तर पर पतित हो जाता है. वैज्ञानिक चेतना वाला बंदा किसी कोने की किसी प्रयोगशाला में तो काम कर सकता है, पर नेतागिरी नहीं कर सकता. लगभग होने में ही नेता का विकास है. विकास ही क्या, नेता का अस्तित्व ही लगभग होने में है.
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By Prabhat Khabar Digital Desk
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