कागज के फूलों से खुशबू
Author Prabhat khabar digital desk
Updated:
विज्ञापन

मुकेश कुमार युवा टिप्पणीकार [email protected] भयंकर प्रतियोगिता, हर तरफ भीड़, सबसे आगे बढ़ने की आपाधापी में लोग आज भौतिक सुख पाने के लिए आत्मिक सुख को तिलांजलि देते जा रहे हैं. यही कारण है कि भीड़, चकाचौंध जश्न और मेलों में आवाजाही के बाद भी इंसान बिल्कुल अकेला-सा है. वह इस अकेलेपन को दूर करने […]
विज्ञापन
मुकेश कुमार
युवा टिप्पणीकार
भयंकर प्रतियोगिता, हर तरफ भीड़, सबसे आगे बढ़ने की आपाधापी में लोग आज भौतिक सुख पाने के लिए आत्मिक सुख को तिलांजलि देते जा रहे हैं.
यही कारण है कि भीड़, चकाचौंध जश्न और मेलों में आवाजाही के बाद भी इंसान बिल्कुल अकेला-सा है. वह इस अकेलेपन को दूर करने के लिए तरह-तरह के जतन करता है. इसके बावजूद वह खुश दिखता तो जरूर है, पर अंदर से शायद ही खुश होता हो. रोजी-रोटी की अनिश्चितता ने इंसान को हताश तो किया ही है, कभी-कभी हताशा की लंबी मियाद अवसादित भी कर देती है.
यही वजह है कि अपने डेली रूटीन की ऊब और बोरियत को मिटाने के लिए तात्कालिक उपाय के तौर पर आभासी जगत यानी सोशल मीडिया में अपना सहारा ढूंढता है. यहां फुरसत के कुछ पल गुजार रिफ्रेश महसूस करने जैसा है. सोशल साइटों पर इतनी तेजी से दोस्त बनाते जाते हैं कि कुछ दिनों में ही फ्रेंडलिस्ट की लिमिट क्रॉस हो जाती है.
सोचनेवाली बात यह है कि परेशानी या किसी मुश्किल में क्या ऐसे दोस्त या दोस्ती का यह भंडार काम देगा? आज के दौर में हम दोस्त, दोस्ती के नाम पर कितनी भी बड़ी फौज खड़ी कर लें, लेकिन वक्त पड़ने पर वैसे लोग ही काम आते हैं, जिनके साथ हमारा आभासी नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जुड़ाव हो तथा जिसके सुख-दुख में हम भी साथ खड़े हों.
आज तो हम पड़ोसियों से अनजान रहते हैं, लेकिन हजारों मील दूर बैठे अजनबी इंसान से दोस्ती बनाते हैं. ऐसी दोस्ती क्या हमें भावना के स्तर पर आनंदित कर पायेगी? सामाजिक परिधि में व्यक्तिगत-संबंध ही हमें मानसिक रूप से संतृप्त करते हैं.
क्योंकि हम जब हंसते हैं, तो उसके साथ किसी की समवेत-हंसी भी चाहते हैं और जब रोते हैं, तो किसी का कंधा खोजते हैं. डिजिटल-रिलेशन में यह संभव नहीं. अजनबी से चैट में वह आनंद नहीं, जो चहेते के साथ खट्टी-मीठी बतकही में है, प्यार-मुहब्बत और नोक-झोंक में है.
टेक्स्ट मैसेज की टीपा-टापी में असल भाव गौण हो जाता है. अमुक व्यक्ति सहानुभूति जता रहा है या व्यंग्य कर रहा है, यह सामने वाले के विवेक पर निर्भर करता है.
यहां लोग सोचते कुछ हैं, लिखते कुछ हैं और कमेंट पर त्वरित प्रतिक्रिया तो गजब ही देते हैं. किसी बात पर मनमुटाव हुआ, तो एक-दूसरे को ब्लॉक भी करते हैं. कभी-कभी कमेंट को पढ़कर लोगों में इतना रोष बढ़ जाता है कि सिर-फुटव्वल की नौबत तक आ जाती है. यह विडंबना ही है कि हम अपने वास्तविक रिश्तों को नजरअंदाज करके नकली रिश्तों में दिलचस्पी ज्यादा लेते हैं. यह कागज के फूल से खुशबू मांगने जैसी बात हुई.
सोशल साइटों पर इस तरह के चैट और संवाद का आनंद तभी सच्चा और दोगुना होता, जब आप अपने किसी परिचित या प्रियजन से किसी कारण दूर होने पर ऐसे मंचों का सीमित प्रयोग करते हैं. सिर्फ फ्लर्टिंग-मेनिया से ग्रस्त होकर यहां अनजान लोगों से ताका-झांकी करना खुद को धोखा देना तो है ही, यह मृगतृष्णा के अलावा कुछ भी नहीं.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन










