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राजनीति में युवाओं को मौका मिले

Updated at : 25 Mar 2019 6:10 AM (IST)
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राजनीति में युवाओं को मौका मिले

आशुतोष चतुर्वेदी प्रधान संपादक, प्रभात खबर ashutosh.chaturvedi @prabhatkhabar.in mail जीवन के हर क्षेत्र में पीढ़ियों का परिवर्तन हमेशा मुश्किल होता है. इसके लिए साहसिक पहल की जरूरत होती है. भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. इतनी युवा आबादी किसी देश के पास नहीं हैं, लेकिन हर क्षेत्र में युवाओं […]

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आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in mail
जीवन के हर क्षेत्र में पीढ़ियों का परिवर्तन हमेशा मुश्किल होता है. इसके लिए साहसिक पहल की जरूरत होती है. भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. इतनी युवा आबादी किसी देश के पास नहीं हैं, लेकिन हर क्षेत्र में युवाओं की अनदेखी की जा रही है.
दलील दी जाती है कि उनके पास अनुभव की कमी है. जान लीजिए कि अगर राजनीति समेत जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं को मौका नहीं दिया गया, तो हम इस अवसर को गंवा देंगे. पिछले दिनों भाजपा के उम्मीदवारों की सूची में लालकृष्ण आडवाणी का नाम नहीं था. उनके स्थान पर गांधीनगर से अमित शाह को उम्मीदवार बनाया गया है.
इसको लेकर मीडिया में खासा हो-हल्ला मचा. आडवाणी गांधीनगर से छह बार सांसद रहे हैं और उनकी उम्र 91 साल से ज्यादा हो चुकी है. अब उनके विश्राम का समय आ गया है. 2014 में भी भाजपा ने 75 साल से अधिक उम्र के नेताओं से अनुरोध किया था कि वे लोकसभा का चुनाव न लड़ें, लेकिन यह फैसला बुजुर्ग नेताओं को रास नहीं आया था और उनकी नाराजगी से बचने के लिए उन्हें टिकट देना पड़ा, जबकि यह निर्णय तो वरिष्ठ नेताओं की ओर से आना चाहिए था, ताकि उन्हें गरिमामय विदाई दी जा सके.
भाजपा ही नहीं, सभी दलों में कमोबेश यही स्थिति है. कोई नेता रिटायर होना ही नहीं चाहता है, जबकि चुनाव न लड़ने से किसी नेता का योगदान कम नहीं हो जाता. भाजपा का जब भी जिक्र होगा, लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी के योगदान को याद किया जायेगा. भाजपा को दो सीटों की पार्टी से यहां तक पहुंचाने में उनका अहम योगदान है. आडवाणी ने 1992 की अयोध्या रथ यात्रा निकाल कर भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में खड़ा कर दिया था. एक दौर था, जब लालकृष्ण आडवाणी भारत की राजनीति की दिशा को तय करते थे और उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार तक माना जाता था.
सबसे दिलचस्प बात यह है कि हमेशा आडवाणी पर कटाक्ष करने वाली कांग्रेस की ओर से बयान आया कि भाजपा अपने बुजुर्ग नेताओं का आदर नहीं करती है, जबकि कुछ समय पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने एक ऐतिहासिक अवसर आया था, जब वह मध्य प्रदेश और राजस्थान में सत्ता की कमान युवाओं को सौंप सकते थे, लेकिन राहुल गांधी ने यह ऐतिहासिक मौका गंवा दिया.
उन्होंने मध्य प्रदेश की कमान 72 वर्षीय कमलनाथ को सौंपी और राजस्थान में 67 वर्षीय अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना दिया. कांग्रेस के दो युवा नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट को किनारे कर दिया गया. मुख्यमंत्री चुने गये दोनों नेता बुजुर्ग हैं और अपने करियर के ढलान पर हैं. वह अवसर था, जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी युवा नेतृत्व को मौका दे कर राजनीतिक जोखिम उठा सकते थे. इस ओर शायद लोगों का ध्यान नहीं गया कि भाजपा ने मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद 45 वर्षीय प्रमोद सावंत को गोवा का मुख्यमंत्री बना कर भाजपा ने पीढ़ी परिवर्तन कर दिया है.
किसी युवा नेता को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी देने से न केवल पीढ़ियों का अंतर हो जाता है, बल्कि सोचने के तौर तरीके में भी बदलाव आ जाता है. युवाओं में कुछ कर दिखाने का जज्बा होता है. मैं इस पक्ष में हूं कि पुरानी पीढ़ी के अनुभव का हमें लाभ उठाना चाहिए, लेकिन पीढ़ियों के परिवर्तन के लिए हमें साहसिक कदम उठाने होंगे, लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि हमारे सोचने का तरीका पुराना ही है.
सरकारी अथवा निजी क्षेत्र की नौकरी से आम आदमी 58 या फिर 60 साल की उम्र में रिटायर कर दिया जाता है और उसके स्थान पर कोई युवा जिम्मेदारी संभालता है, लेकिन राजनीति में उम्र की कोई सीमा नहीं होती. भले ही आप शारीरिक और मानसिक रूप से उतने चैतन्य न रहें, लेकिन सत्ता का मोह नहीं जाता है. यही वजह है कि सभी राजनीतिक दलों में बूढ़े नेता सत्ता से चिपके रहते हैं.
2014 में जब लोकसभा के चुनाव हुए थे, तब चुने गये 543 सांसदों में से 253 की औसत उम्र 55 साल से अधिक थी. विश्लेषकों का कहना है कि यह सबसे बूढ़े सांसदों वाली लोकसभा थी. संसद में युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व देश के युवाओं के अनुपात में बेहद कम था. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछली संसद में 45 साल से कम के केवल 79 सांसद थे.
सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में, चाहे वह खेल का मैदान हो अथवा राजनीतिक का रण, हर जगह यह बात नजर आती है. क्रिकेट में भी आपने गौर किया होगा कि अक्सर जब तक खिलाड़ी को बाहर बैठने के लिए नहीं कह दिया जाता, तब तक उसकी आकांक्षा टीम में बने रहने की होती है.
हालांकि कई खिलाड़ी इसके अपवाद भी हैं. क्रिकेट विश्व कप होने वाला है और इसमें भारत का नेतृत्व विराट कोहली करेंगे और उन्हें धौनी के अनुभव का लाभ मिलेगा. भारत को विश्व कप जिताने वाले कपिल देव और महानतम बल्लेबाज सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर को कभी-न-कभी तो जाना पड़ा. वह हमेशा तो भारतीय टीम में बने नहीं रह सकते थे. आपको तेंदुलकर का मामला याद होगा. उनका प्रदर्शन स्तरीय नहीं चल रहा था, लेकिन वह रिटायर नहीं हो रहे थे. चयनकर्ताओं में साहस नहीं था कि वे कह सकें कि अब आपको रिटायर हो जाना चाहिए. यह फैसला सचिन के ऊपर ही छोड़ दिया गया था और काफी इंतजार के बाद उन्होंने यह फैसला किया.
भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. भारत के मुकाबले चीन और अमेरिका बुजुर्गों के देश हैं. चीन में लगभग 21 करोड़ और अमेरिका में लगभग 7 करोड़ युवा हैं. 1991 की जनगणना के अनुसार देश में लगभग 34 करोड़ युवा थे. माना जा रहा है कि 2020 तक भारत दुनिया के सबसे युवा देश हो जायेगा. आप गौर करें कि युवा देश में अब भी जीवन के हर क्षेत्र की बागड़ोर बुजुर्ग लोगों के हाथों में है.
हमारे यहां एक और समस्या है कि अलग-अलग क्षेत्रों में युवा की परिभाषा भिन्न-भिन्न है. राजनीति में तो 50 से 60 साल तक के लोगों को युवा मान लिया जाता है. 2003 में राष्ट्रीय युवा नीति में युवाओं का पारिभाषित किया गया था और 13 से 35 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों को युवा माना गया था. भारत के युवा होने की खबर पर पूरी दुनिया की नजर है.
कुछ समय पहले ब्रिटेन के जाने माने अखबार गार्डियन में इयान जैक ने एक विस्तृत लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा है कि युवा भारत दुनिया को बदल सकता है. इस लेख में कहा गया है कि युवा भारतीयों में पारंपरिक एशियाई संस्कृति और अमेरिकी युवाओं की आकांक्षाओं का समावेश है. हर तरफ इस बात की चर्चा है, लेकिन अपने ही देश में इस बड़े परिवर्तन की अनदेखी हो रही है.
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