एक निर्णायक मोड़

बालाकोट में लड़ाकू विमानों से आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने की घटना भारतीय रक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है. बीते दशकों में पाकिस्तान से अनेक गंभीर झड़पें हुई हैं और ऐसी तनातनी के मौके आये हैं, जिनके बड़े युद्ध में भी बदलने के आसार थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसकी बड़ी वजह यह थी […]
बालाकोट में लड़ाकू विमानों से आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने की घटना भारतीय रक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है. बीते दशकों में पाकिस्तान से अनेक गंभीर झड़पें हुई हैं और ऐसी तनातनी के मौके आये हैं, जिनके बड़े युद्ध में भी बदलने के आसार थे.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसकी बड़ी वजह यह थी कि भारत अपने ऊपर काबू रखता था. यह धैर्य पाकिस्तान की नजर में भारत की कमजोरी थी. साल 1987 में उसके द्वारा परमाणु हथियार जुगाड़ कर लेने के बाद भारत को सावधानी का बरताव करना पड़ा था, क्योंकि बड़ी लड़ाई के नतीजे पूरे उपमहाद्वीप को तबाह कर सकते थे. रक्षा नीति के इस आयाम के कारण ही कारगिल की लड़ाई के दौरान हमारे लड़ाकू विमानों ने नियंत्रण रेखा को पार नहीं किया था. परंतु, अब पाकिस्तान के परमाणु हथियार रखने की धौंस भारत को कड़ी कार्रवाई करने से रोक नहीं सकती है.
बालाकोट में बमबारी 1971 के बाद पहला ऐसा मौका है, जब भारतीय वायु सेना ने युद्धकों को न सिर्फ नियंत्रण रेखा से पार भेजा, बल्कि वे पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीरी हिस्से से भी परे जाकर उसकी जमीन पर बने आतंकी ठिकाने को तबाह कर आये. तीन दशक पहले जब पाकिस्तान ने चोरी-छुपे परमाणु हथियार प्राप्त किये, तो रक्षा, कूटनीति और राजनीति से जुड़े अनेक पर्यवेक्षकों की राय थी कि चूंकि दोनों देशों के पास अब यह भयानक हथियार है, तो इनके संबंधों में स्थिरता आयेगी और संघर्षों की आशंका कम होगी. भारत ने इस दिशा में लगातार कोशिशें भी की है, लेकिन पाकिस्तान का रवैया ऐसा नहीं रहा.
तीन युद्धों में शर्मनाक हार झेल चुकी पाक सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ ने पड़ोसी देश को घाव देने के लिए आतंकवाद के हथियार का इस्तेमाल शुरू कर दिया. पाकिस्तान समझ रहा था कि भारत से सीधे युद्ध में जीत पाना संभव नहीं है और परमाणु हथियारों की वजह से सीधे युद्ध की संभावना भी नहीं है. लेकिन, पुलवामा हमले ने भारत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर कब तक पाकिस्तान के इस छद्म युद्ध का संयम से सामना किया जाता रहेगा.
कारगिल में जीत के बावजूद भारतीय सेना और वायु सेना ने नियंत्रण रेखा का मान रखा था. कुछ समय बाद संसद पर हमले के दौरान भी इसे लांघने की कवायद नहीं की गयी. मुंबई हमले के बाद भी भारत ने धैर्य नहीं खोया और कोई सैनिक कार्रवाई नहीं की. परंतु, पुलवामा हमले ने भारत को मजबूर कर दिया कि अब सब्र से काम नहीं चलेगा और अब पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देना जरूरी है. भारत चाहता तो मिसाइलों का इस्तेमाल कर सकता था, या फिर 2016 की तरह नियंत्रण रेखा के आस-पास हमले कर सकता था.
लेकिन, लड़ाकू विमानों का नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तानी आकाश में जा धमकना और बमबारी कर सकुशल वापस आना अनेक संकेतों का पुंज है, जिसमें सबसे अहम यह है कि परमाणु हथियार के दम पर पाकिस्तान का ब्लैकमेल अब नहीं चलेगा.
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