कर्नाटक संकट के लिए कांग्रेस दोषी

Updated at : 17 Jan 2019 12:00 AM (IST)
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कर्नाटक संकट के लिए कांग्रेस दोषी

आर राजागोपालन, वरिष्ठ पत्रकार rajagopalan1951@gmail.com कर्नाटक का राजनीतिक ड्रामा लोकसभा चुनावों का एक ट्रेलर है- गठबंधन सरकार के गिरने के बारे में राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी ही सुर्खियां हैं. भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपनी योजना की सफलता को सुनिश्चित करना चाहती हैं. भाजपा यह दिखाना चाहती है कि गठबंधन चाहे देश के स्तर […]

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आर राजागोपालन, वरिष्ठ पत्रकार
rajagopalan1951@gmail.com
कर्नाटक का राजनीतिक ड्रामा लोकसभा चुनावों का एक ट्रेलर है- गठबंधन सरकार के गिरने के बारे में राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी ही सुर्खियां हैं. भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपनी योजना की सफलता को सुनिश्चित करना चाहती हैं. भाजपा यह दिखाना चाहती है कि गठबंधन चाहे देश के स्तर पर हो या क्षेत्रीय स्तर पर, इसे टूटना ही है.
वहीं कांग्रेस यह जताना चाहती है कि 2019 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं होगा और जनता दल (सेक्युलर) के साथ उसका गठबंधन लोकसभा चुनावों तक रहेगा.
लोकसभा चुनाव के लिए जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडीएस और कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे की बातचीत शुरू होते ही कर्नाटक की राजनीति संकटग्रस्त हो गयी. दोनों दलों में तनातनी दिसंबर के मध्य में ही शुरू हो गयी थी. चूंकि, मुख्यमंत्री पद जेडीएस के पास है, इसलिए कांग्रेस उसे अधिक सीटें नहीं देना चाहती है. जेडीएस ने 28 में से 12 सीटें मांगी है.
बातचीत आधे-आधे के बंटवारे से शुरू हुई थी. बंटवारे पर खींचतान का नतीजा यह हुआ कि असंतुष्ट अस्थिरता का खेल खेलने लगे. स्वाभाविक रूप से भाजपा ने इसका फायदा उठाया है. कांग्रेस ने मुख्यमंत्री कुमारस्वामी पर किसानों की कर्जमाफी जैसे अपने वादे को पूरा करने का दबाव बनाया था.
इसमें सिर्फ 800 किसानों के कर्ज माफ हुए. प्रधानमंत्री मोदी ने जेडीएस पर तंज किया कि कर्नाटक सरकार चुनावी घोषणापत्र को लागू करने में असफल रही है. इस घटनाक्रम से कांग्रेस के पैर उखड़ गये. कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने अपनी बाजी भी खूब खेली. इसी तरह से भाजपा के येदियुरप्पा भी सरकार गिराने की कोशिशों में शामिल हो गये.
पुत्र के राज्य में मुख्यमंत्री बनने से पिता देवगौड़ा प्रधानमंत्री पद के सपने देखने लगे. यह भी कांग्रेस के लिए एक बड़ी समस्या है कि पिता और पुत्र को कैसे संभाला जाये. लखनऊ में अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव तथा हैदराबाद में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के बेटे केटी राव और वाइएसआर कांग्रेस के नेता जगन रेड्डी जैसे युवा नेता लोकसभा सीटों के बारे में बैठकें कर रहे हैं, लेकिन कर्नाटक में कोई युवा चेहरा नहीं है.
मंत्री पद के लिए पुराने चेहरे ही आपस में भिड़े हुए हैं. कर्नाटक कांग्रेस के लिए लोकसभा सीटों पर समझौता चिंता का विषय नहीं है, वह सिर्फ इस लचर गठबंधन को आम चुनाव तक खींचना चाहती है.
कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व की विचारधारा का आधार है. राज्य में पहले भाजपा सरकार होने का श्रेय संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं को जाता है. लेकिन, वहां हिंदू चरमपंथ के विरोध में भी मजबूत ताकत मौजूद है. अल्पसंख्यकों की राज्य में बड़ी संख्या है.
बंगलुरु में ही मुस्लिम आबादी के घनत्व और हिंदुत्व की भावना बढ़ने से कांग्रेस का संगठनात्मक आधार घटता गया और जेडीएस जैसी तीसरी ताकत का उभार हुआ. कर्नाटक की राजनीति में मौजूदा संकट इस विचारधारात्मक मतभेद से भी सीधे तौर से जुड़ा हुआ है.
साल 2018 में कर्नाटक के मतदाताओं ने कांग्रेस के खिलाफ जनादेश दिया था. भाजपा को बड़ी जीत मिली थी. लेकिन, कांग्रेस ने पिछले दरवाजे से घुसकर कुमारस्वामी को सरकार बनाने के लिए उकसाया. दोनों पार्टियों के समर्थक अभी तक किसी स्पष्ट समझदारी पर नहीं पहुंच सके हैं.
सरकार गिराने के खेल का यह सार-संक्षेप है. डीके शिवकुमार जैसे असंतुष्ट कांग्रेस नेता, जो मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के िखलाफ खड़े हो रहे हैं. मुख्यमंत्री कुमारस्वामी लाचार हैं. या तो वे आंसू बहाते हैं या खुलेआम कहते हैं कि ईश्वर ही कर्नाटक को बचा सकता है. दोनों ने राज्य की राजनीति की गति को रोक दिया है.
आखिर देवगौड़ा को राज्य-प्रशासन में क्यों हस्तक्षेप करना चाहिए? उन्हें पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव को कानून-व्यवस्था के बारे में चर्चा करने के लिए अपने घर क्यों बुलाना चाहिए? मुख्यमंत्री कुमारस्वामी पिता द्वारा अपने अधिकारों के हनन को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? कांग्रेस के नेता इन बातों से चिंतित हैं.
अब वे दो सवाल, जो कर्नाटक के लोगों के दिमाग में हैं- क्या कुमारस्वामी सरकार बचेगी? क्या जेडीएस और कांग्रेस के बीच कोई समझौता हो सकेगा? राज्य की नौकरशाही और प्रशासन ठप्प पड़े हुए हैं.
कर्नाटक की राजनीति का एक पर्यवेक्षक होने के नाते यह लेखक इतना जरूर कह सकता है कि जो भी हो रहा है, वह विचारधारात्मक मुद्दों की राजनीति नहीं है, बल्कि जाति और धर्म पर आधारित है. लिंगायत और वोक्कालिगा जैसी प्रभावशाली जातियां भी राजनीति द्वारा प्रेरित होकर जिला स्तर पर हस्तक्षेप करती हैं.
कांग्रेस नेतृत्व की नजर चुनावी फंड पर थी, जो किसी तरीके से सरकार गठन का बड़ा कारण था. बीते छह महीने में कांग्रेस को कुछ खेमों से चुनावी धन मिला भी है. लेकिन, इसी बीच कांग्रेस के हाथ में तीन सरकारें- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान- और आ गयीं.
अब लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के पास धन की कमी नहीं है. निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस की रुचि कुमारस्वामी प्रयोग को जारी रखने में नहीं है. इसी कारण सिद्धारमैया के नेतृत्व में कांग्रेस इस गठबंधन और सरकार की राह में रोड़े अटका रही है. कर्नाटक को स्थायी सरकार चाहिए और लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी होने चाहिए, ताकि लोग नये चेहरे और नया गठबंधन चुन सकें.
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