हिंदू होने का अर्थ!
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :03 Jan 2019 8:00 AM (IST)
विज्ञापन

तरुण विजय वरिष्ठ नेता, भाजपा tarunvijay55555@gmail.com जब-जब हिंदुओं को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा का अवसर मिला, तब-तब विदेशी विधर्मियों से बढ़कर स्वदेशी स्वधर्मियों ने ही अपने अहंकार और भीतरी विरोधियों से शत्रुता को प्रमुखता देते हुए मार्ग में बाधाएं डालीं और एक तरह से मिलती-मिलती विजय पानीपत की पराजय में बदलती चली गयी. […]
विज्ञापन
तरुण विजय
वरिष्ठ नेता, भाजपा
tarunvijay55555@gmail.com
जब-जब हिंदुओं को अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा का अवसर मिला, तब-तब विदेशी विधर्मियों से बढ़कर स्वदेशी स्वधर्मियों ने ही अपने अहंकार और भीतरी विरोधियों से शत्रुता को प्रमुखता देते हुए मार्ग में बाधाएं डालीं और एक तरह से मिलती-मिलती विजय पानीपत की पराजय में बदलती चली गयी. दुर्भाग्य से इतिहास भी तो पराजय का ही पढ़ाया जाता है, पर पानीपत कितनों को याद होगा? यह सवाल जरा स्वयं से पूछिए.
जो समाज अपनी जय और पराजय की स्मृति नहीं रखता, उसका क्या भविष्य होगा? भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बारे में अदालत ने जो फैसला दिया है, उसी से स्पष्ट हो जाता है कि इस देश में जो लोग हिंदू संस्कृति या हिंदू हित की बात राजनीति में करने के लिए उतरते हैं, उन्हें बाहर और भीतर से कितने आघात एवं झूठे और बेबुनियाद आरोप सहन करने पड़ते हैं. लेकिन, यह भी सच है कि कई बार लम्हों की खता सदियों तक झेलनी पड़ती है.
हिंदू भूल गये कि अगर स्वामी दयानंद ने पाखंड खंडिनी पताका उठाकर हिंदुओं के आलस्य और रूढ़िवादिता के साथ पारस्परिक शत्रुता और कर्मकांड में डूबे रहने पर करारे प्रहार नहीं किये होते तथा परंपरागत हिंदुओं की अहमन्यता को वेद शक्ति के प्रहार से चूर-चूर नहीं किया होता, तो उत्तर भारत ईसाई बन गया होता. स्वामी दयानंद ने जातिप्रथा के आधार पर भेदभाव को हमारे घरों से दूर किया और अहंकारी ब्राह्मणों के कर्मकांड को चुनौती देते हुए शुद्धि आंदोलन चलाया तथा धर्मांतरित होकर ईसाई तथा मुसलमान बन चुके हिंदुओं को वापस लाैटा लाये.
स्वामी श्रद्धानंद शुद्धि आंदोलन के महापुरुष थे और उनका कार्य इतना प्रखर तथा सफल था कि कट्टर मुसलमान भी उनका सम्मान करते थे और वे इतिहास के अकेले हिंदू संन्यासी हुए, जिन्हें दिल्ली की जामा मस्जिद में मुसलमानों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया.
लेकिन राजनीति और धनी एवं उच्च जाति के अहंकारी हिंदुओं के कारण समाज में आज भी जाति भेद प्रबल है. अनुसूचित जाति के नौजवान शादी में घोड़े पर चढ़कर बारात ले जाते हैं, तो उन्हें उतार दिया जाता है, अपमानित किया जाता है. विद्यालयों में उनके बच्चों को अक्सर ताने सुनने पड़ते हैं.
पिछले महीने मैं मेरठ में वाल्मीकि समाज के प्रभावशाली बच्चों के एक सम्मान समारोह में गया था. वाल्मीकि बच्चे प्रतिभा और कुशलता में किसी से कम नहीं हैं.
लेकिन, उन्हें समाज में जो भेदभाव सहना पड़ता है, उसका हम अंदाजा नहीं लगा सकते. मुझे एक प्रोफेसर मिले, आप उनके अनुभव सुनेंगे, तो आंखों में आंसू और हृदय में गुस्सा उबलने लगेगा. सब कुछ सही होते हुए भी जब कॉलेज के प्रबंधकों को पता चलता है कि वे अनुसूचित जाति से हैं, तो या तो उन्हें नौकरी नहीं देते या स्तर से कम पर देते हैं.
कौन स्वाभिमानी समाज या व्यक्ति होगा, जो जाति के आधार पर या किसी भी कारण से इस तरह के तिरस्कार को सहन करेगा? एक बार मैंने स्वयं एक हवाई अड्डे पर देखा कि एक सांसद अपने बगल के यात्री से सिर्फ इसलिए भिड़ गये, बल्कि उसे झापड़ मार दिया, क्योंकि वह यात्री लाइन में सांसद जी से आगे आ गया था.
एक जाति सदियों से इस देश में सफाई कर्मचारी बनी हुई है. यह किस आंबेडकर का सम्मान है और हिंदू समाज की कौन सी धार्मिक महानता है?
मूर्तियां, मंदिर, आश्रम और करोड़ों रुपये लगाकर होनेवाले भगवद् भजन-कीर्तन के कार्यक्रम लगातार बढ़ रहे हैं. हर मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर और शनिवार को शनि देवता के नये-नये मंदिरों के सामने भीड़ बढ़ रही है. लेकिन, जिस समाज के हृदय में राम, अधरों पर राम, नाम में राम (अधिकतर अनुसूचित जातियों के), हिंदू जगजीवन राम से लेकर अर्जुन राम तक सब कुछ सहन करते हुए भी राम का साथ नहीं छोड़ते, ऐसे सच्चे और शौर्यवान रामभक्तों के साथ हम लोग क्या व्यवहार करते हैं?
राजनीति में अनुसूचित जाति के लोग किसी भी दल में आगे नहीं बढ़ाये जाते. उनका अगला टिकट मिलना या ना मिलना उन लोगों के हाथ में रहता है, जो चुनाव क्षेत्र में छोटी जाति, बड़ी जाति का आंकड़ा देखकर टिकट का अावंटन करते हैं.
अनुसूचित जाति के बच्चे-बच्चियों पर जब हमला होता है, या उनका अपमान होता है, तो क्या आपने कभी देखा कि संसार त्यागकर समस्त प्राणियों को एक समान माननेवाले संत-महात्मा या हिंदू सांसद-विधायक लोग अनुसूचित जाति के घर-परिवारों में जाकर उनके साथ खड़े होते हों और जाति भेद के आधार पर उनसे अन्याय करनेवाले हिंदुओं को समझाकर सामाजिक समता स्थापित करते हों? अगर कहीं ऐसा कोई वातावरण बनते दिखता है, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साधारण अनाम, अजान कार्यकर्ता चुपचाप ही सामाजिक समरसता के लिए अनुसूचित जाति बस्तियों और वाल्मीकि मंदिरों में काम करते दिखते हैं. पर हालात बहुत कठिन तथा जटिल हैं.
समता की बात करनेवालों को 14 अक्तूबर, 1956, नागपुर की दीक्षा भूमि का दृश्य कभी भी भूलना नहीं चाहिए. उस दिन डॉ आंबेडकर लाखों अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध हो गये थे. अगले दिन 15 अक्तूबर, 1956 को दिया गया आंबेडकर का भाषण हर हिंदू को पढ़ना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए कि आप अपने ही हिंदू भाई-बहनों के साथ केवल तब तक ही तो भेदभाव कर सकते हो, जब तक वे स्वयं को हिंदू कहते हैं?
हिंदू समाज एक खतरनाक दौर से गुजर रहा है. उत्तराखंड से अरुणाचल प्रदेश तक बड़ी संख्या में हिंदू विभिन्न कोणों से हम लोगों का शिकार हो रहे हैं, तथा संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में उन पर हमले बढ़े हैं और संख्या का रुझान घटने की तरफ चल पड़ा है.
सड़कें, पानी, बिजली, राजनीति करते रहिए, लेकिन अगर सदियों से केवल हिंदू होने के कारण जो विभिन्न दिशाओं से हमले झेल रहे हैं, वही आज भी स्वयं को अपनी विरासत, परंपरा तथा धार्मिकता पर चोट होते देखने पर विवश होंगे, तो हे परम पराक्रमी विभिन्न दलों के नेताओं, भारत अपने ही समाज के साथ पुन: अन्याय होते देख सुखी नहीं हो सकता. पद, पैसा और प्रभाव तो काबुल, रावलपिंडी, लाहौर और कराची के हिंदुओं के पास भी कम नहीं था. यह बात भी क्या याद दिलानी पड़ेगी?
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
विज्ञापन
लेखक के बारे में
By Prabhat Khabar Digital Desk
यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।
Tags
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए
विज्ञापन




