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सबको मिले छत

Updated at : 02 Jan 2019 7:00 AM (IST)
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सबको मिले छत

रोटी, कपड़ा और मकान हमारी बुनियादी जरूरत है. यह विडंबना ही है कि आजादी के सात दहाई बाद भी आबादी के बहुत बड़े हिस्से के सिर पर छत नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 दिसंबर, 2016 को मध्य वर्ग के लिए घर खरीदने के लिए सरकारी अनुदान योजना की घोषणा की थी. अब इसे […]

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रोटी, कपड़ा और मकान हमारी बुनियादी जरूरत है. यह विडंबना ही है कि आजादी के सात दहाई बाद भी आबादी के बहुत बड़े हिस्से के सिर पर छत नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 दिसंबर, 2016 को मध्य वर्ग के लिए घर खरीदने के लिए सरकारी अनुदान योजना की घोषणा की थी. अब इसे इस वर्ष मार्च तक बढ़ा दिया गया है.

इसके तहत छह से 18 लाख की सालाना आय के लोगों द्वारा पहली बार घर खरीदने पर बैंकों के माध्यम से ढाई लाख के कर्ज आधारित अनुदान की व्यवस्था है. इस योजना की कामयाबी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अब तक 93 हजार खरीदार करीब दो हजार करोड़ रुपये का फायदा उठा चुके हैं. ऐसी योजनाएं खरीदारों के साथ बैंकों और रियल इस्टेट के कारोबार के लिए लाभकारी हैं. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सरकार ने 2022 तक सभी को आवास मुहैया कराने की महत्वाकांक्षी पहल की है.

इसके तहत आसान कर्ज मुहैया कराने, अनुदान देने तथा घरों का आकार बढ़ाने की मंजूरी जैसे कदम उठाये गये हैं. इस वृहद योजना में निजी क्षेत्र की सहभागिता भी सुनिश्चित करने का प्रयास हुआ है. जीएसटी में कटौती कर तथा विभिन्न कानूनी आधारों पर रियल इस्टेट और खरीदार को सहूलियत देने का इरादा भी सरकार का है. निर्धन एवं निम्न आय वर्ग के लिए 2.67 लाख के अनुदान की योजना भी चल रही है.

हालांकि, समय पर परियोजनाओं के पूरा न हो पाने तथा समुचित निवेश की कमी जैसे अवरोध भी हैं. वित्तीय संस्था क्रिसिल के मुताबिक, नवंबर, 2018 तक सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 63 लाख घर बनाने की मंजूरी दी थी, परंतु इनमें से सिर्फ 12 लाख घर ही बन सके हैं और 23 लाख घर निर्माणाधीन हैं.

मौजूदा वित्त वर्ष के अंत तक 30 लाख आवास देने तथा 75 लाख घरों के निर्माण की मंजूरी का लक्ष्य था. साल 2022 तक के लक्ष्य को पूरा करने के लिए आगामी तीन सालों में सरकार को एक लाख करोड़ रुपये सालाना का निवेश करना होगा, पर अभी तक 32.5 हजार करोड़ रुपये ही दिये गये हैं.

अगर जून, 2015 से 2022 तक का हिसाब लगाएं, तो निवेश की राशि डेढ़ लाख करोड़ रुपये हर साल होगी. क्रिसिल की मानें, तो सिर्फ पांच राज्यों- आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में ही 55 फीसदी के आसपास घरों की मंजूरी दी गयी है.

अन्य राज्यों की जरूरत के मद्देनजर इस असमानता को दूर किया जाना चाहिए तथा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में आवास समस्या पर विचार होना चाहिए. केंद्रीय योजना के अंतर्गत मार्च, 2019 तक ग्रामीण भारत में एक करोड़ से अधिक घर बनाने का इरादा तय हुआ था, पर 2017-18 में सालाना लक्ष्य का 57 फीसदी ही पूरा हो पाया और 51 लाख में से 29 लाख से कुछ ही अधिक घर बन सके. उम्मीद है कि आगामी महीनों में निर्माण कार्य में तेजी आयेगी और लक्ष्य को कमोबेश हासिल किया जा सकेगा.

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