मोदी की प्राथमिकताओं में कश्मीर नहीं

Updated at : 19 Jun 2014 5:26 AM (IST)
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मोदी की प्राथमिकताओं में कश्मीर नहीं

।। शुजात बुखारी ।। एडिटर, राइजिंग कश्मीर जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित स्वायत्तता प्रस्ताव का नयी दिल्ली द्वारा अस्वीकार इस बात का प्रमाण है कि किस तरह से केंद्र सरकार ने उन्हीं संस्थाओं को अनदेखा किया है, जिन्हें वह मजबूत करना चाहती है. पिछले महीने सरकार के गठन के बाद नयी दिल्ली में […]

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।। शुजात बुखारी ।।

एडिटर, राइजिंग कश्मीर

जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित स्वायत्तता प्रस्ताव का नयी दिल्ली द्वारा अस्वीकार इस बात का प्रमाण है कि किस तरह से केंद्र सरकार ने उन्हीं संस्थाओं को अनदेखा किया है, जिन्हें वह मजबूत करना चाहती है.

पिछले महीने सरकार के गठन के बाद नयी दिल्ली में भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बैठक के बाद दोनों देशों की ओर से जारी बयानों में ‘कश्मीर’ का कोई जिक्र नहीं था. पाकिस्तानी विदेश मंत्री सरताज अजीज ने बाद में मीडिया को बताया कि बैठक में इस मसले पर चरचा हुई थी, लेकिन आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की गयी.

ऐसे में इस विवादित मसले पर सरकारों के रवैये को लेकर कश्मीर में चिंता होना स्वाभाविक है. लेकिन विश्लेषकों ने इस बात को नजरअंदाज करने का आग्रह किया, क्योंकि दोनों नेताओं को कुछ समय दिया जाना चाहिए, ताकि वे ऐसे जटिल मसलों के समाधान के तौर-तरीकों को खोज सकें.

हालांकि, अब स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी ने अगले एक साल के लिए अपनी सरकार के लिए जो प्राथमिकताएं निर्धारित की हैं, उनमें कश्मीर कहीं नहीं है. पाकिस्तान के साथ इस मसले पर बातचीत निश्चित रूप से एक बाह्य आयाम है और जब भी दोनों देश इसे अपने बीच दूरी बढ़ानेवाले मामले के रूप में देखेंगे, तो इस पर बात कर लेंगे. लेकिन, मोदी सरकार ने इसे एक आंतरिक मामले के बतौर देखने का कोई इरादा नहीं व्यक्त किया है. राष्ट्रपति ने 9 जून को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में केंद्र सरकार के अगले एक साल के कार्यक्रमों व नीतियों का उल्लेख किया था. इस संबोधन में गंभीरता से लिये जानेवाले मसले के रूप में कश्मीर का कहीं जिक्र नहीं था.

मोदी ने कश्मीर के बारे में सिर्फ एक कार्य तय किया है कि कश्मीरी पंडितों को वापस लाया जाये, जो घाटी में 1990 के शुरुआत में हुए सशस्त्र विद्रोह के बाद पलायन कर गये थे. इन पंडितों की संख्या के बारे में परस्पर विरोधी आंकड़े हैं. पंडितों के संगठनों का दावा है कि चार लाख लोगों ने पलायन किया था, जबकि सरकारी आंकड़ों में 24,202 परिवारों के छोड़ने का उल्लेख है. इस आधार पर कश्मीर छोड़ कर गये पंडितों की संख्या एक लाख पचास हजार से अधिक नहीं होनी चाहिए. सरकारी तथ्यों के मुताबिक, तब 219 पंडित मारे गये थे. राष्ट्रपति मुखर्जी ने अपने संबोधन में कहा था, ‘यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रयास किये जायेंगे कि कश्मीरी पंडित अपने पूर्वजों की भूमि पर पूर्ण गरिमा, सुरक्षा और सुनिश्चित जीविका के साथ वापस लौटें’.

निश्चित रूप से यह एक स्वागतयोग्य कदम है और कश्मीरियों ने हमेशा कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा पर चिंता व्यक्त की है, जबकि उन्होंने भी पिछले बीस वर्षो में इस विवाद के सबसे बुरे नतीजों को ङोला है. इस प्रकरण में चिंता की बात यह भी है कि उमर अब्दुल्ला सरकार ने उन संपत्तियों को फिर से खरीदने का प्रस्ताव रखा है, जिन्हें उस हिंसा के दौर में पंडित बेच कर चले गये थे. अंगरेजी अखबार ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह 5,800 करोड़ के प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य घाटी में लौटने के लिए कश्मीरी पंडितों को प्रोत्साहित करना है. लेकिन, इससे दोनों समुदायों के बीच दूरियां और बढ़ेंगी और संघर्ष की स्थिति पैदा होगी.

कश्मीरी पंडितों के घाटी में लौटने की प्रक्रिया से पहले सभी संबद्ध पक्षों को भरोसे में लेना जरूरी है. बहुसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ इस मुद्दे पर विचार-विमर्श के बिना पंडितों को अलग-थलग बस्तियों में रखने से उनके लौट कर आने का उद्देश्य पूरा नहीं होगा. जैसा कि सरकार की ओर से आ रहे बयानों में कहा जा रहा है, निर्धारित मोहल्लों में बंदूकधारी सुरक्षाकर्मियों को तैनात कर उन्हें सुरक्षा तो प्रदान की जा सकती है, लेकिन असली भरोसा और सुरक्षा की भावना उनके पुराने पड़ोसियों से ही मिल सकती है.

नयी दिल्ली की नयी सरकार द्वारा कश्मीर की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना और उन्हें प्राथमिकताओं में नहीं जोड़ना चिंताजनक स्थिति है. जम्मू में मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में कश्मीर मुद्दे के समाधान के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सूत्र ‘जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत’ को दुहराया था. वाजपेयी ने न सिर्फ पाकिस्तान के साथ बेहतर संबंधों के लिए बढ़-चढ़ कर कोशिशें की थीं, बल्कि पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ मिल कर परस्पर भरोसा बहाल करने के प्रयासों के आधार पर मेल-जोल, शांति और संवेदना के लिए ठोस बुनियाद रखी थी. उन्होंने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ भी बातचीत की थी. हालांकि, तब उसका कोई उल्लेखनीय नतीजा नहीं निकल सका था.

कश्मीर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोई रूप-रेखा नहीं होने का एक और प्रमाण उनके विश्वस्त सहयोगी व रक्षा मंत्री अरुण जेटली के 15 जून के बयान से मिलता है, जिसमें सेना के विशेषाधिकारों की समाप्ति पर टाल-मटोल के साथ उन्होंने कहा था कि सिर्फ उन्हीं लोगों से बात होगी, जो भारतीय संविधान और संप्रभुता के अंतर्गत काम करने को तैयार हैं. इसका सीधा मतलब है कि भारत सरकार घाटी में जमीनी असंतोष को मानने के लिए तैयार नहीं है. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय 2002 में अरुण जेटली कश्मीर में भारत सरकार की ओर से वार्ताकार रह चुके हैं और नेशनल कॉन्फ्रेंस से अधिकारों के बंटवारे पर चरचा भी कर चुके हैं.

भारतीय संविधान के दायरे में बातचीत या ऐसी मांगों से अब तक कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकल सका है. जम्मू-कश्मीर विधानसभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से पारित स्वायत्तता प्रस्ताव का अस्वीकार इस बात का प्रमाण है कि किस तरह से केंद्र सरकार ने उन्हीं संस्थाओं को अनदेखा किया है, जिन्हें वह मजबूत करना चाहती है. भाजपा ने विशेष राज्य का दर्जा देनेवाले अनुच्छेद 370 को हटाने की मांग की है. ऐसे में राज्य को कुछ और अधिक देने का प्रश्न ही नहीं उठता है.

नरेंद्र मोदी को किसी समुदाय-विशेष पर ध्यान न देकर सभी पक्षों व पहलुओं को मद्देनजर रखना चाहिए. 2008 से बंद अलगाववादियों से बिना शर्त बातचीत शुरू होनी चाहिए. कैदियों के बारे में सहानुभूतिपूर्वक विचार हो. राज्य की आर्थिक बेहतरी के लिए कदम उठाये जायें. सरकारों के रवैये से युवा नाराज हैं. उम्मीद है कि मोदी अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार कर कश्मीर पर उसके बाह्य व आंतरिक आयामों के साथ ध्यान देंगे. उन्हें दिखाना है कि उनकी नीतियां सिर्फ वोट-बैंक के लिए नहीं हैं, बल्कि जमीनी हकीकत पर आधारित हैं.

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