राष्ट्रीय सुरक्षा और विक्रमादित्य की सवारी

By Prabhat Khabar Digital Desk
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।। प्रमोद जोशी ।।

वरिष्ठ पत्रकार

भारत दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र आयातक है. कुछ साल पहले तक चीन था, पर उसने अपनी तकनीकी विकास और शस्त्र निर्यात करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया. आज चीन दुनिया का चौथा सबसे बड़ा शस्त्र निर्यातक है.

देश की सुरक्षा से जुड़ी तीन-चार खबरें एक साथ सामने आयी हैं. इस हफ्ते जम्मू-कश्मीर सीमा पर फिर से गोलीबारी हुई है. तीन हफ्ते पहले ही भारत में नयी सरकार ने काम शुरू किया है. शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का आगमन खास खबर थी. ऐसे में गोलीबारी का अर्थ क्या है? क्या यह संयोग रक्षा मंत्री अरुण जेटली की जम्मू-कश्मीर यात्र से जुड़ा हुआ था? हालांकि अरुण जेटली ने इस गोलीबारी को ज्यादा महत्व नहीं दिया.

शरीफ की दिल्ली-यात्र के ठीक पहले अफगानिस्तान में हेरात स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ था. उसके पीछे पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्करे-तैयबा का हाथ बताया गया था. लश्कर प्रमुख हाफीज सईद ने नवाज शरीफ को हिदायत दी थी कि वे दिल्ली की यात्र पर न जायें. एक हफ्ते पहले कराची हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमले के बाद सईद का आरोप था कि हमला मोदी सरकार ने कराया है, जबकि उसकी जिम्मेवारी तहरीके-पाकिस्तान के एक धड़े ने ली थी.

साफ है कि पाक में कोई ताकत ऐसी है, जो स्थितियां सामान्य नहीं होने देगी. चिंताजनक खबर दो रोज पहले की है कि अल-कायदा ने कश्मीर में जेहाद की घोषणा की है. संगठन के एक वीडियो में कहा गया है कि अब हम अफगानिस्तान के रास्ते कश्मीर में घुसेंगे. यह पहली बार है जब अल-कायदा ने कश्मीर का नाम लेकर ऐसी बात कही है. कहा जा रहा है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी होते ही पाकिस्तान में बैठी जेहादी ताकतें कश्मीर में नया अभियान शुरू करनेवाली हैं. दरअसल, तालिबान के पास धन और साधनों की इफरात है. यह बात संयुक्त राष्ट्र की एक रपट में कही गयी है. इन सारी बातों को देखते हुए देश की सुरक्षा के सवालों पर गौर करने की जरूरत है.

शनिवार को भारतीय नौसेना के सबसे बड़े विमानवाहक पोत आइएनएस विक्रमादित्य पर खड़े होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा के बाबत कुछ महत्वपूर्ण संदेश दिये हैं. नयी सरकार सुरक्षा को लेकर तेजी से सक्रिय हुई है. कहा जा सकता है कि यह सिर्फ प्रचारात्मक है, लेकिन विक्रमादित्य की सवारी केवल ‘फोटो अपॉरच्युनिटी’ से कुछ ज्यादा लगती है. मोदी ने एक मजबूत नौसेना की जरूरत को रेखांकित करते हुए समुद्री व्यापार-मार्गो की सुरक्षा का सवाल उठाया, पर ज्यादा महत्वपूर्ण बात सुरक्षा प्रौद्योगिकी के स्वदेशीकरण की कही.

उन्होंने परंपरागत भारतीय नीति से हटते हुए यह भी कहा कि हमें रक्षा सामग्री के निर्यात के बारे में भी सोचना चाहिए. यह एक महत्वपूर्ण नीतिगत वक्तव्य है. अब तक भारत शस्त्र निर्यात के खिलाफ रहा है. अफगानिस्तान ने हाल में कुछ हथियारों की जरूरत पेश की, तो भारत ने रूस से हथियार दिलवा कर उनके भुगतान की व्यवस्था की, पर सीधे हथियार नहीं दिये.

भारत इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र आयातक देश है. कुछ साल पहले तक चीन सबसे बड़ा शस्त्र आयातक होता था, पर उसने तकनीकी विकास और शस्त्र निर्यात करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया. आज चीन दुनिया का चौथा सबसे बड़ा शस्त्र निर्यातक है. सबसे अहम बात यह है कि वह पाकिस्तान का सबसे बड़ा रक्षा-साझीदार है.

पाकिस्तान में ही नहीं, चीन तो श्रीलंका, म्यांमार, बांग्लादेश, नेपाल और मालदीव जैसे देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है. बहरहाल, मोदी सरकार के सामने रक्षा को लेकर बड़ी चुनौतियां हैं. इनमें सबसे बड़ी चुनौती है सेना के आधुनिकीकरण को पूरा करना. शस्त्र प्रणालियां पुरानी पड़ चुकी हैं. अब नेटवर्क सेंट्रिक युद्ध का जमाना है.

नयी सरकार को मीडियम मल्टी रोल लड़ाकू विमानों के सौदे को अंतिम रूप देना है. 2011 में भारत ने तय किया था कि हम फ्रांसीसी विमान रफेल खरीदेंगे और उसका देश में उत्पादन भी करेंगे, लेकिन वह समझौता अब तक लटका हुआ है. तीनों सेनाओं के लिए कई प्रकार के हेलीकॉप्टरों की खरीद अटकी पड़ी है. विक्रमादित्य की कोटि के दूसरे विमानवाहक पोत के काम में तेजी लाने की जरूरत है. अरिहंत श्रेणी की परमाणु शक्ति चालित पनडुब्बी को पूरी तरह सक्रिय होना है. इसके साथ दो और पनडुब्बियों के निर्माण-कार्य में तेजी लाने की जरूरत है. रक्षा तकनीक में स्वदेशीकरण का रास्ता साफ करना है, जिसके लिए कुछ बड़े फैसले करने होंगे. जैसे, रक्षा क्षेत्र में सौ फीसदी विदेशी पूंजी निवेश.

हाल में सरकार ने रक्षा परियोजनाओं को तेजी से मंजूर करने के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति में तेजी लाने का फैसला किया है. चीनी सीमा पर लगभग छह हजार किलोमीटर लंबी सड़कों का निर्माण-कार्य इंतजार कर रहा है. चूंकि रक्षा सौदों और इस प्रकार के निर्माण-कार्यो के साथ कई प्रकार के विवाद भी जुड़े होते हैं, इसलिए फैसलों में देरी होती है. यह देरी एक प्रशासनिक दोष है. इस हफ्ते रूसी उप प्रधानमंत्री दिमित्री रोगोजिन भारत की यात्र पर आ रहे हैं. प्रधानमंत्री नौसेनाध्यक्ष और थलसेनाध्यक्ष के साथ लंबे विचार-विमर्श कर चुके हैं. जल्द ही वे तीनों सेना प्रमुखों के साथ भी बैठक करने जा रहे हैं. इसी दौरान चीनी सीमा पर एक नयी स्ट्राइक कोर तैनात करने के बारे में कुछ बड़े फैसले भी होनेवाले हैं. इन सब बातों को जोड़ कर देखें, तो विक्रमादित्य के मंच से मोदी का आह्वान एक नये ताकतवर भारत का आह्वान है.

भारत इस क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. उसकी जिम्मेवारी बनती है कि यहां का नेतृत्व वह संभाले. ऐसा नहीं हुआ तो चीन इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर लेगा. हमें चीन के साथ भी दोस्ताना रिश्ते बनाने हैं, पर क्षेत्र की सुरक्षा की जिम्मेवारी हमारी है. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से इस हफ्ते घटनाक्रम काफी सरगर्म रहा. पिछले रविवार को भारत आये चीनी विदेश मंत्री यांग यी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात की. इसके पहले प्रधानमंत्री मोदी की चीनी प्रधानमंत्री के साथ टेलीफोन पर बातचीत हुई थी. उधर, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने भी मोदी से बात की. चीन और जापान के बीच इन दिनों तनाव है.

भारत की इस तनाव में भूमिका नहीं है, पर दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के साथ तेल की खोज को लेकर चीन के साथ टकराव का अंदेशा है. चीनी राष्ट्रपति के विशेष दूत यांग के साथ सीमा विवाद और व्यापार असंतुलन घटाने समेत द्विपक्षीय संबंधों के हर मुद्दे पर बात हुई. पर नत्थी वीजा के मामले में चीन का अपने रुख पर कायम रहना भारत के लिए चिंता का विषय है. शायद इसीलिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने चीनी विदेश मंत्री से साफ स्वरों में कहा कि हम ‘एक चीन’ स्वीकार करते हैं, तो चीन को भी ‘एक भारत’ की मर्यादा स्वीकार करनी चाहिए. विदेश नीति अपनी जगह है, पर देश अपनी सैनिक शक्ति की उपेक्षा नहीं कर सकता.

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