मस्ती का माध्यम नहीं हैं महिलाएं

Updated at : 17 Jun 2014 6:55 AM (IST)
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मस्ती का माध्यम नहीं हैं महिलाएं

।। रजनीश आनंद ।। प्रभात खबर, रांची हमारे जैसे नौकरीपेशा लोगों की परेशानी यह है कि हमारे पास समय नहीं है. हमेशा समय बचाने की उधेड़बुन में लगी रहती हूं. एक दिन मैं ऑफिस से निकली और ऑटो का इंतजार करने लगी. तभी एक ऑटो मेरे सामने आकर रुका. मैं अंदर नजर डाले बगैर किनारे […]

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।। रजनीश आनंद ।।

प्रभात खबर, रांची

हमारे जैसे नौकरीपेशा लोगों की परेशानी यह है कि हमारे पास समय नहीं है. हमेशा समय बचाने की उधेड़बुन में लगी रहती हूं. एक दिन मैं ऑफिस से निकली और ऑटो का इंतजार करने लगी. तभी एक ऑटो मेरे सामने आकर रुका. मैं अंदर नजर डाले बगैर किनारे की सीट पर बैठ गयी. तभी मेरे कानों में एक आवाज पड़ी, अरे प्रीतिया के साथ जो हुआ, अच्छा हुआ, .. अरे जब तक ऐश करना था, तो नेस वाडिया और जब कोई और मिल गया होगा, तो यौन उत्पीड़न का आरोप.

मैंने उस ओर देखा, 18-20 साल के युवक थे. पांच-छह लड़के अभिनेत्री प्रीति जिंटा और उनके पूर्व ब्वॉयफ्रेंड के मामले पर चर्चा कर रहे थे. तभी, दूसरे लड़के ने कहा, ज्यादा मत बोल महिला सशक्तीकरण का जमाना है, जस्टिस वर्मा ने तो हमारी वो हालत कर दी है कि यदि किसी लड़की को हम घूर दें और वह शिकायत कर दे, तो हमें जेल की हवा खानी पड़ेगी, तो होश में रहो. उसकी बात पर सभी जोर से हंस पड़े. उनकी बातों को सुन कर मुङो बहुत निराशा हुई. कहां मैं यह सोचती थी कि आज का युवा नया सोचता है और नया करता है, लेकिन नहीं नारियों के मामले में वह आज भी लकीर का फकीर है.

इच्छा हुई कि मैं कुछ जवाब दूं, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया. उनकी बातें मन को बहुत बेचैन कर रही थीं, पर उन्हें इसका कोई भान नहीं था, या यूं कहें कि उन्हें इसकी चिंता ही नहीं थी कि वे एक महिला के सामने ऐसी बातचीत कर रहे हैं. तब तक मेरी मंजिल आ गयी और मैं ऑटो से उतर कर घर की ओर हो ली, पर उन लड़कों की बातें कानों में गूंज रही थीं. तभी आवाज आयी, अरे मोहतरमा ऐसी भी क्या बेरुखी कि हमारी ओर ध्यान ही नहीं. मैंने देखा सामने मेरे प्रिय मित्र शर्मा खड़े थे. उन्हें देख कर मुङो राहत मिली. उन्होंने कहा, क्या बात है बुझी-बुझी सी हैं?

वर्क प्रेशर ज्यादा है क्या? या फिर किसी से पंगा ले लिया? शर्मा जी मेरे चेहरे के भाव आसानी से पढ़ते हैं, सो झूठ बोलने की बजाय मैंने उन्हें पूरा वाकया बताया. मेरी बातों को सुन कर शर्माजी ने ढांढ़स बंधाया. अरे जानें, दीजिए न मैडम. दुनिया में सभी ऐसे नहीं हैं, अच्छे लोग भी हैं. मैंने उन्हें रोका, नहीं शर्माजी युवाओं की सोच इतनी उलझी है कि वे जिस युवती से रिश्ता बनाते हैं उसे अपनी संपत्ति समझ लेते हैं. दुर्भाग्य यह कि अगर रिश्ता न बने, तो वे हैवानियत की हद पार कर जाते हैं. यूपी में हालिया घटनाएं इसका सबूत देती हैं. क्या होगा इस देश का? मेरे सवाल पर शर्माजी ने टोका, आप पत्रकार हैं, आप ही बतायें कि मीडिया टॉप सेक्सी हीरोइनें, टॉप सेक्सी कारपोरेट महिलाएं और अब तो टॉप सेक्सी महिला पत्रकार की जानकारी आखिर किन मूल्यों को ध्यान में रख कर दे रहा है? क्या ऐसी खबरें युवाओं को भ्रमित नहीं करतीं. ऐसे में किस तरह के समाज की कल्पना आप कर सकती हैं. बतायें? शर्माजी के सवाल ने मुङो निरुत्तर कर दिया और मैं चुपचाप घर की ओर बढ़ गयी.

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