जब चतुर सोनरवा से गयी यारी छूट!

Updated at : 14 Jun 2014 5:48 AM (IST)
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जब चतुर सोनरवा से गयी यारी छूट!

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ।। वरिष्ठ साहित्यकार सरस्वती की उन पर विशेष कृपा थी. 1981 में जिस मैथिली महाकाव्य ‘अगस्त्यायनी’ पर उन्हें मात्र 39 वर्ष की आयु में केंद्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला था, वह मात्र दस-पंद्रह दिनों में उन्होंने लिख डाला था. यह सच है कि बिहार के अप्रतिम कवि-पत्रकार मरकडेय प्रवासी से […]

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।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र ।।

वरिष्ठ साहित्यकार

सरस्वती की उन पर विशेष कृपा थी. 1981 में जिस मैथिली महाकाव्य ‘अगस्त्यायनी’ पर उन्हें मात्र 39 वर्ष की आयु में केंद्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला था, वह मात्र दस-पंद्रह दिनों में उन्होंने लिख डाला था. यह सच है कि बिहार के अप्रतिम कवि-पत्रकार मरकडेय प्रवासी से मेरा कोई रिश्ता नहीं था, मगर यह भी सच है कि उनसे बढ़ कर मेरा कोई रिश्तेदार भी हिंदी-मैथिली जगत में नहीं हुआ. जब मैं उनसे पहली बार मिला था, तब महज 22 बरस का था.

सत्तर के दशक के प्रारंभिक वर्षो में एक कवि सम्मेलन में हम मिले थे. उनके स्नेहिल, अत्यंत विनम्र स्वभाव और प्रखर काव्य प्रतिभा ने मुङो प्रभावित किया. उनकी वे गीत-पंक्तियां थीं: ‘और चढ़ नीम पर/लता करैले की/तीतेपन की भी तो हद होगी.’ और ‘नाव को किनारा फिर एक बार दे मांझी/शायद इस घाट की रेतों से प्यार मिले.’

उन दिनों वे पटना के प्रमुख हिंदी दैनिक ‘आर्यावर्त’ के संपादकीय विभाग में कार्यरत थे. समाचार संपादन के अलावा रोज ‘चुटकुलानंद की चिट्ठी’ व्यंग्य-स्तंभ लिखते थे, जो पाठकों में अत्यंत लोकप्रिय था. इसके अलावा वे ‘मिथिला मिहिर’ मैथिली साप्ताहिक में (अब बंद) ‘झामलालक झामा’ और ‘माटि-पानि’ पत्रिका में ‘कहलनि गोनू झा’ स्तंभ नियमित रूप से लिखते थे. वे एक साथ कवि, पत्रकार, कथाकार, निबंधकार, व्यंग्यकार और वक्ता थे. उम्र में मुझसे सात साल बड़े थे, मगर हमारे बीच इतनी अंतरंगता हो गयी थी कि घरेलू मुद्दों से लेकर साहित्यिक प्रश्नों पर हम बेहिचक बात करते थे.

वे भारतीय संस्कृति के पोषक ही नहीं, उस पर गर्व करनेवाले साहित्यकार थे, जबकि बिहार में वह दौर साहित्य में भी कलम की जगह कुदाल और हंसिया-हथौड़ा चलाने का था. ऐसे माहौल में भी प्रवासी जी ने पटना के अग्रणी हिंदी-मैथिली कवि के रूप में अपनी खास पहचान बनायी थी. वे मैथिल जीवन-दर्शन ‘अंत: शाक्ता: बहि: शैवा: सभा मध्ये तु वैष्णवा:’ के अक्षरश: अनुयायी थे. एक ओर जहां वे विरोधियों के बीच रूद्रवतार थे, वहीं अपनी वैष्णवोचित विनम्रता के कारण छोटे से छोटे व्यक्ति को भी सर पर ऐसे उठा लेते थे कि वह अपने पांव जमीन पर रखना भूल जाता था. सीमित आय होने पर भी, यात्रओं में अपने सहयात्री का सारा व्यय उठा लेना उनका स्वभाव था, जिसका उचित-अनुचित लाभ उनके इर्द-गिर्द के चतुर कवि-कवयित्री अक्सर उठाया करते थे.

प्रवासी जी मेरे जनपद समस्तीपुर के ही गरुआर नामक गांव में पहली मई, 1942 को उत्पन्न हुए थे. हिंदी में एमए और बीएड करने के बाद वे कुछ दिनों तक एक हाइस्कूल में शिक्षक भी रहे, मगर उसमें जब मन नहीं रमा, तो पत्रकारिता करने लगे. इस प्रकार वे पटना के दरभंगा राज के हिंदी दैनिक पत्र आर्यावर्त में प्रविष्ट हुए और आखिरी सांस तक उसी की गिरी दीवार के नीचे चादर तान कर लेटे रहे. कई बार मैंने उन्हें टोका भी कि यह सामंतवादी महल जर्जर होकर गिरनेवाला है; आप निकल भागिये. वे चाहते तो किसी भी अखबार के संपादकीय विभाग की शोभा बढ़ा सकते थे, मगर आर्यावर्त कार्यालय और पटना नगर के प्रति अतिरिक्त मोह ने उन्हें कहीं जाने नहीं दिया.

सरस्वती की उन पर विशेष कृपा थी. 1981 में जिस मैथिली महाकाव्य ‘अगस्त्यायनी’ पर उन्हें मात्र 39 वर्ष की आयु में केंद्रीय साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला था, वह मात्र दस-पंद्रह दिनों में उन्होंने लिख डाला था. किसी भी अवस्था में और किसी भी विधा में वे तुरंत लिख सकते थे. इतनी ऊर्जा और इतना अध्ययन था उन्हें. आकाशवाणी के पटना केंद्र के लिए नयी छंदोबद्ध कविता के लिए (चाहे वह हिंदी में हो या मैथिली में) वे अपने कंकड़बाग वाले घर से रिक्शा पर बैठने के बाद सोचना शुरू करते थे और केंद्र पर पहुंचने से पहले लिख डालते थे.

इस प्रकार, तनाव में लिखने का उन्हें अभ्यास हो गया था. उन्होंने हिंदी में ‘शंखध्वनि’, ‘कविता बोलती है’, ‘सूरज ने लिखा है’, जैसे काव्य-संग्रह दिये, जबकि मैथिली में तदर्थ कविताओं का संग्रह ‘एतदर्थ’ और गीत-नवगीत संग्रह ‘हम भेंटब’ के अलावा ‘अभियान’ और ‘हम कालिदास’ उपन्यास भी लिखे. ‘हम भेंटब’ गीत-संग्रह और ‘अगस्त्यायनी’ महाकाव्य उनकी विशिष्ट कृतियां हैं. मैथिली नवगीत के वे अग्रणी कवि माने जाते थे और कविता में तदर्थवाद के प्रवर्तक थे. उनके ढेरों निबंध, कहानियां, व्यंग्य-लेख आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों में दर्ज हैं, जिनका संकलन जरूरी है.

मुङो मैथिली में सतत लिखने की प्रेरणा वे अग्रज की तरह हमेशा देते रहे. संबंधों की प्रगाढ़ता के कारण मैं पटना में प्राय: उनके कंकड़बाग स्थित फ्लैट में ही आकर रहता था. वहीं मुखिया जी, बटुक भाई, बासुकीनाथ झा प्रभृति मैथिली के स्तंभ रहते थे, जिनके साथ सुबह-शाम बतकही कर अपार सुख मिलता था. मुङो रिक्शे पर बैठा कर पटना भर के साहित्यकारों से मिलवाना और अपने प्रिय रेस्तराओं के विभिन्न व्यंजनों से परिचित कराना उनकी खास कोशिश रहती थी. मैथिली के रचनाकारों के बीच मुङो प्रतिष्ठापित करने में उनका वत्सल प्रयास महत्वपूर्ण है. वैसे भी हम दोनों एक दूसरे को साढ़ू कहते थे और इस साढ़ूवाद को उन्होंने ‘मिथिला मिहिर’ के एक होली विशेषांक में ‘साढ़ूनाम केवलम्’ लिख कर सिद्ध भी कर दिया था.

जीवन के अंतिम दिनों में वे स्वास्थ्य और परिवार की चिंताओं से बुरी तरह ग्रस्त हो गये थे. अप्रैल, 2010 में उनके ही आमंत्रण पर मुङो बड़हिया कवि सम्मेलन में जाना पड़ा.

पटना के हनुमान नगर मुहल्ले के फ्लैट में जब वे मिले, तो पूरा चेहरा पीला और सूजन भरा था. सदाबहार मस्ती की जगह उदासी ने ले ली थी. उनके व्यक्तित्व का सहज पुरुषार्थ और विजय-विश्वास तिरोहित था. पटना से हम दोनों बड़हिया चले. रास्ते भर वे साहित्य, राजनीति और समाज में तेजी से बढ़ते क्षरण की चर्चा करते रहे. बीच में बाढ़ जिले का ‘रैली’ गांव पड़ा, जहां मुङो कई दशकों के बाद अपने जीवन-पथ-प्रदर्शक श्री शिवदानी शर्मा और उनके परिवार के दर्शन हुए.

शिवदानी जी जब रेवतीपुर(गाजीपुर) के संस्कृत महाविद्यालय में हमारे हिंदी शिक्षक थे, तब अक्सर कबीर का एक पद गाया करते थे-‘जब चतुर सोनरबा से गयी यारी छूट/गयी झुलनी टूट, गयी झुलनी टूट.’ बड़हिया में कवि सम्मेलन के बाद, महिला महाविद्यालय के अतिथिगृह में प्रवासी जी के साथ बीती वह आखिरी रात थी, जब हम दोनों ने स्मृतियों को खंगालते हुए भोर कर दी थी. उसके कुछ दिनों के बाद ही 13 जून, 2010 को उस चतुर सोनार से हमारी यारी टूट गयी और वे सचमुच प्रवासी हो गये. आज उनकी यह गीत-पंक्तियां याद आती हैं: जहिया जहिया हृदयहीनता/खटकत मोनक बाट पर/हम भेटब/इतिहास-नदी केर/चिक्कन-चुनमुन घाट पर.

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