ओ नेता, कल आना!
Updated at : 26 Oct 2018 6:14 AM (IST)
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डॉ सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार drsureshkant@gmail.com पिछले दिनों एक फिल्म आयी ‘स्त्री’, जिसमें स्त्री का एक नया ही रूप देखने को मिलता है. उसमें स्त्री ‘चुड़ैल’ को कहा गया है. पुरुषों द्वारा अपमानित होकर गांव की एक स्त्री ‘स्त्री’ बन जाती है और गांव के पुरुषों को ‘धोने’ लगती है. अब चूंकि वे पुरुष किसी […]
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डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
drsureshkant@gmail.com
पिछले दिनों एक फिल्म आयी ‘स्त्री’, जिसमें स्त्री का एक नया ही रूप देखने को मिलता है. उसमें स्त्री ‘चुड़ैल’ को कहा गया है. पुरुषों द्वारा अपमानित होकर गांव की एक स्त्री ‘स्त्री’ बन जाती है और गांव के पुरुषों को ‘धोने’ लगती है. अब चूंकि वे पुरुष किसी औरत के पति, भाई, बेटे वगैरह भी होते हैं, अत: पुरुषों के साथ-साथ गांव की अन्य स्त्रियां, मतलब सामान्य औरतें, भी परेशान हो जाती हैं और इस तरह गांव में कोहराम मच जाता है.
किसी ओझा वगैरह से पूछकर गांववाले इसका तोड़ निकालते हैं कि अपने-अपने घर के बाहर ‘ओ स्त्री, कल आना’ लिखवा लेते हैं. ‘स्त्री’ न केवल पढ़ी-लिखी है, बल्कि इतनी नैतिकतावादी भी है कि जिस घर के बाहर ‘ओ स्त्री, कल आना’ लिखा होता है, उसमें नहीं जाती और इस तरह वह घर ‘स्त्री’ के कहर से बच जाता है.
लेकिन, स्त्री इसका हल यह निकालती है कि एक युवक को आविष्ट कर उससे घरों के बाहर लिखी कल आने की इबारत मिटवाने लगती है और वह फिर पूरी शिद्दत से पुरुष-धुलाई कार्यक्रम संपन्न करने लगती है और तब तक नहीं रुकती, जब तक कि गांववाले उसकी मूर्ति बनाकर पूजा नहीं करने लगते.
औरतों के साथ दुर्व्यवहार आम बात रही है. मर्द उनके साथ खुद दुर्व्यवहार नहीं करते, बल्कि उन्होंने औरतों को भी औरतों के खिलाफ खड़ा कर दिया. लड़की पैदा होने पर सास नामक औरत ही बहू नामक औरत का जीना हराम करती है.
तुलसी तक को लिखना पड़ा- ‘सोहे न नारि नारि के रूपा, पन्नगारि यह नीति अनूपा!’ दूसरे, आज भी यह दुर्व्यवहार जारी है, जिसका पता घरेलू हिंसा और यौन शोषण की खबरों से चलता है. तीसरे, पुरुष तब तक बाज नहीं आता, जब तक स्त्री उसे मजा नहीं चखा देती. और चौथे, देवी कहे जानेभर से स्त्री पुरुषों को माफ कर देती है. मुझे तो काली और दुर्गा की मूर्ति-पूजा भी कुछ ऐसा ही संकेत देती लगती है!
फिल्म में जिस तरह गांववाले चुड़ैल से परेशान रहते हैं, हकीकत में जनता भी नेताओं से परेशान रहती है. नेता भी जनता पर ‘स्त्री’ से कम कहर नहीं ढाते.
चाहे वह रावण-दहन के अवसर पर दर्शकों के ट्रेन से कट-मरने का मामला हो या हिंदू-मुस्लिम दंगों में लड़-मरने का. महंगाई, बेरोजगारी से वे जनता को अलग त्रस्त रखते हैं. रुपये की कीमत और नेताओं की विश्वसनीयता गिरने में एक-दूसरे से होड़ है और दुर्भाग्य से आज इसमें वे भी शामिल हैं, जो पहले दूसरों के बारे में ऐसा कहा करते थे. अंतरराष्ट्रीय मंच पर गिरने के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें बिहारी के इस दोहे की याद दिलाती हैं- ‘ज्यों-ज्यों बूड़ै श्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होय.’
चुनाव आ रहे हैं और यही नेता वोट मांगने के लिए फिर जनता के पास आनेवाले हैं. सोचता हूं, सबके घरों के बाहर लिखवा दूं- ‘ओ नेता, कल आना!’ हालांकि, लगता नहीं कि नेताओं पर इसका कुछ असर होगा. उलटे वे इसे भी अपनी उपलब्धि बनाकर पेश कर देंगे कि देखो, समोसे-पकौड़े की तरह हमने लोगों के लिए यह भी एक रोजगार पैदा किया.
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