शिष्टाचार की प्रतिमूर्ति एनडी तिवारी

Updated at : 24 Oct 2018 6:31 AM (IST)
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शिष्टाचार की प्रतिमूर्ति एनडी तिवारी

आरके सिन्हा सांसद, राज्यसभा rkishore.sinha@sansad.nic.in उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कई बार मुख्यमंत्री रहे एवं भारत सरकार के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री जैसे पदों पर रहे पंडित नारायण दत्त तिवारी लगातार पांच दशकों से ज्यादा सेवा देनेवाले देश के मूर्धन्य राजनीतिज्ञ, विद्वान, चिंतक और प्रखर वक्ता थे. उनके देहावसान के साथ भारतीय राजनीति के […]

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आरके सिन्हा
सांसद, राज्यसभा
rkishore.sinha@sansad.nic.in
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कई बार मुख्यमंत्री रहे एवं भारत सरकार के वित्त मंत्री और विदेश मंत्री जैसे पदों पर रहे पंडित नारायण दत्त तिवारी लगातार पांच दशकों से ज्यादा सेवा देनेवाले देश के मूर्धन्य राजनीतिज्ञ, विद्वान, चिंतक और प्रखर वक्ता थे. उनके देहावसान के साथ भारतीय राजनीति के एक महान नक्षत्र का अवसान हो गया.
एनडी तिवारी के नाम से लोकप्रिय नारायण दत्त तिवारी को भारतीय राजनीति में यदि शिष्टाचार और शालीनता की प्रतिमूर्ति के रूप में जाना जाये, तो तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं होगी.
एनडी तिवारी को मैंने पिछले चालीस वर्षों के सानिध्य में विविध रूपों में देखा है. एक प्रखर राजनेता, एक समाजवादी चिंतक और विचारक, जेपी के निकट अनुयायी, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सत्ता कई बार संभालनेवाले कुशलतम प्रशासक, एक समझदार और संतुलित वित्त मंत्री, एक कुटिल और चतुर विदेश मंत्री एनडी तिवारी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत के मर्मज्ञ थे.
वे जितनी जिंदादिली से शेरो-शायरी करते थे, उतनी ही सौम्यता से वेदों की ऋचाएं और संस्कृत के सूक्तों का भी उपयुक्त स्थानों पर सटीक प्रयोग कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे. उनमें ही यह अद्भुत गुण था कि वे फुरसत में रहने पर आपके साथ घंटों बैठकर गप्पें भी लगा सकते थे और जरूरत पर वे मात्र पांच मिनट में पांच सौ की भीड़ को भी रुखसत कर सकते थे.
अस्सी के दशक में एनडी तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. मुझे पटना से किसी काम से लखनऊ जाना पड़ा. मैंने उन्हें फोन किया, तो उन्होंने मेरे ठहरने एवं गाड़ी की व्यवस्था करा दी. जब मैं अपने काम से निवृत्त हुआ, तब मैंने धन्यवाद करने के लिए उनको फोन किया और कहा, ‘भगवान्, मैं कल वापस पटना लौट जाऊंगा. आपको हृदय से धन्यवाद करना चाहता हूं.’
इस पर उन्होंने कहा कि, ‘ऐसे कैसे लौट जायेंगे? कल सुबह जलपान करने मुख्यमंत्री कोठी पर आइए.’ जब मैं वहां पहुंचा, तो लगभग 400 लोगों की भीड़ लॉन में थी. मैं वहां अपना परिचय दे ही रहा था कि वे कोठी से बाहर निकले और मुझे देखकर कहा, ‘आइए, मैं पांच मिनट में लोगों को निबटा लूं’. वे सभी से हाथ जोड़कर मिल रहे थे और कुछ बातें भी कर रहे थे. उनके हाथों से विनम्रतापूर्वक कागज लेकर सहयोगियों को आवश्यक कार्रवाई के लिए दे रहे थे. फिर वे मुझे अंदर जलपान के लिए ले गये.
जलपान के बाद बोले, ‘और कोई काम हो तो बताइए.’ मैंने कहा रहने की व्यवस्था करवा दी, अब ज्यादा कुछ नहीं चाहिए. वे मुझसे उम्र में बहुत बड़े थे, लेकिन व्यवहार मित्रवत करते थे. उनकी सहजता ही थी कि वे मुझे छोड़ने पोर्टिको तक आये. हाथ जोड़कर कहा, ‘कृपा दृष्टि बनाये रखियेगा.’
जब वे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हुए, तो एक दिन एक फोन आया और कहा गया कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री जी बात करना चाहते हैं. नमस्कार आदि के बाद तिवारी जी ने कहा कि, ‘सिन्हा साहब, मैं शाम को आपके यहां चाय पीने आ रहा हूं.’ मैंने कहा ‘नहीं, नहीं, मैं ही आपके पास आ जाता हूं.
आप क्यों कष्ट करेंगे.’ उन्होंने कहा, ‘मैंने सुना है कि भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा जी आपके यहां आ रहे हैं, तो मैंने सोचा कि क्यों न चाय पीने आ जाएं.’ शाम को मेरी कोठी के ड्राइंग रूम में चाय पर उन्होंने ऋषिकेश में एम्स स्थापित करने का प्रस्ताव स्वास्थ्य मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा जी से स्वीकृत करवा लिया.
ड्राइंग रूम में मेरा और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का एक चित्र लगा हुआ था. उसे वे टकटकी लगाकर देखते रहे. जब वे गाड़ी में बैठने लगे, तो फिर गाड़ी से उतरकर मुझे गले लगा लिया और कहा, ‘सिन्हा साहब, मैं गलत जगह पर हूं, फिर भी हूं तो जेपी का चेला ही न?’ मैंने कहा कि गलत जगह पर क्यों हैं आप? तो वे हंसने लगे.
साल 2004 में मेरे बेटे की शादी थी. बरात ऋषिकेश जानेवाली थी. एक होटल से बरात को चलकर एक काॅलेज के ग्राउंड में जाना था. दूल्हे की गाड़ी में मेरे बेटे ऋतुराज के साथ उसके ताऊजी (डाॅ जोशी) साथ पीछे बैठे थे और मैं आगे बैठा था. जब बारात लगभग पहुंचने ही वाली थी, तो एक पुलिस आॅफिसर ने खिड़की पर दस्तक दी. मेरे पूछने पर उसने कहा कि मुख्यमंत्री जी पीछे-पीछे पैदल चल रहे हैं.
तब मैंने गाड़ी रोककर तिवारी जी को कहा कि मान्यवर आप गाड़ी में बैठिये. मैंने बेटे को कहा तुम आगे बैठ जाओ. दोनों ताऊजी पीछे बैठ जायेंगे. वे गाड़ी में जोशीजी के साथ बैठ गये और मैं गाड़ी के साथ पैदल चलने लगा. यह थी तिवारी जी की शालीनता. बरात लगने के बाद वे देर रात घंटों तक जोशीजी, डॉ निशंक, भगत सिंह कोशियारी और पटना व दिल्ली से आये भाजपा नेताओं के साथ गप्पें लगाते रहे.
एक बात का अफसोस मुझे ही नहीं, बल्कि हजारों सच्चे कांग्रेसी मित्रों को भी रह ही जायेगा कि यदि इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी की जगह पर तिवारी जी प्रधानमंत्री हुए होते, तो देश की तस्वीर कुछ अलग ही होती.
कांग्रेस में उत्तराखंड से दो ऐसे बड़े नेता पैदा हुए, जो प्रधानमंत्री पद के लिए सक्षम और उपयुक्त थे. एक पंडित नारायण दत्त तिवारी और दूसरे हेमवंती नंदन बहुगुणा. लेकिन, दोनों को ही इंदिराजी ने आगे बढ़ने नहीं दिया. क्योंकि, इंदिरा गांधी को हमेशा इस बात का डर सताता रहता था कि एनडी तिवारी या बहुगुणाजी को मौका मिला, तो जनता शायद उन्हें ज्यादा पसंद करेगी और वे दोनों ‘नेहरू-गांधी परिवार’ के लिए एक स्थायी खतरा बन जायेंगे.
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