‘निर्मल भारत अभियान’ का सच!

Updated at : 06 Jun 2014 5:13 AM (IST)
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‘निर्मल भारत अभियान’ का सच!

।। विजय विद्रोही।। (कार्यकारी संपादक, एबीपी न्यूज) उत्तर प्रदेश में औसतन रोज बलात्कार की दस घटनाएं होती हैं. इसमें से 60-65 फीसदी खुले में शौच गयीं महिलाओं के साथ होती है. यह कहना है यूपी पुलिस में एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) के आइजी आशीष गुप्ता का. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट भी कहती है कि खुले […]

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।। विजय विद्रोही।।

(कार्यकारी संपादक, एबीपी न्यूज)

उत्तर प्रदेश में औसतन रोज बलात्कार की दस घटनाएं होती हैं. इसमें से 60-65 फीसदी खुले में शौच गयीं महिलाओं के साथ होती है. यह कहना है यूपी पुलिस में एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) के आइजी आशीष गुप्ता का. एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट भी कहती है कि खुले में शौच से जहां बीमारियां फैलने का अंदेशा होता है, वहीं महिलाओं-बच्चियों के साथ यौन हिंसा की आशंका भी बढ़ जाती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में आज भी साठ करोड़ लोग खुले में शौच जाते हैं, जिसमें आधी संख्या महिलाओं की है.

यूपी के बदायूं में दो नाबालिग लड़कियों के साथ बलात्कार और फिर हत्या तब हुई, जब रात आठ बजे के करीब वे खुले में शौच के लिए गयी थीं. इटावा और कौशांबी में भी लड़कियों के साथ बलात्कार ऐसे ही समय हुआ. बदायूं की गरीब और पिछड़े दलित वर्ग की महिलाओं का भी कहना है कि शौच के लिए जाते-आते समय उनके साथ छेड़छाड़ की सबसे ज्यादा घटनाएं होती हैं. स्कूलों में लड़कियों के अलग शौचालय नहीं होने से ज्यादातर लड़कियां पढ़ाई अधूरी ही छोड़ देती हैं. नरेंद्र मोदी ने चुनावों के दौरान यह मुद्दा उठाया था. उन्होंने ‘पहले शौचालय, फिर देवालय’ का नारा दिया था, जिस पर साधू समाज ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. तब के केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने ‘निर्मल भारत अभियान’ पर बहुत जोर दिया था. यूपी की इन घटनाओं के बाद मोदी और जयराम के बयान तथा उनकी चिंता सबको याद आ रही है. यही हाल बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और आंध्र प्रदेश का भी है, जहां खुले में शौच जाने के चलते काफी महिलाएं यौन हिंसा की शिकार होती हैं.

भारत में खुले में शौच की प्रवृत्ति को रोकने और घर के ही कोने में शौचालय बनवाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए 1999 से ही ‘निर्मल भारत अभियान’ चलाया जा रहा है. जयराम रमेश ने इस क्षेत्र में व्यापक काम भी किया. यहां तक कि अदाकारा विद्या बालन को इस अभियान का ब्रांड एम्बेसडर भी बनाया. केंद्र सरकार ने ऐसे विज्ञापन भी बनवाये, जिसमें घर में शौचालय बनानेवालों की पहल को सराहा गया था. यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश में ऐसे गांव भी हैं, जहां लोग शादी के लिए लड़की देने से कतराते हैं, क्योंकि वहां महिलाओं को खुले में शौच जाना पड़ता है. मध्य प्रदेश से एक लड़की ने उस घर में शादी करने से इनकार कर दिया था, जहां शौचालय नहीं था. उस लड़की की कहानी को बड़े पैमाने पर प्रचारित-प्रसारित किया गया था, ताकि अन्य लड़कियां भी घर में शौचालय बनवाने को अपनी शादी से जोड़ें.

निर्मल भारत अभियान का मकसद स्कूल, आंगनबाड़ी के साथ घरों में शौचालय बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करना है. साथ ही 2017 तक खुले में शौच को पूरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य है. इसके तहत केंद्र शौचालय बनाने के लिए 70 फीसदी रकम देता है. राज्य सरकारों को 20 प्रतिशत रकम जुटानी पड़ती है और इसका लाभ उठानेवाले परिवार को बाकी की 10 फीसदी का इंतजाम करना पड़ता है. बीपीएल परिवार को केंद्र 3200 रुपये देता है, राज्य 1400 रुपये देता है. पहाड़ी व दुर्गम क्षेत्रों के लिए यह राशि 3700 और 1400 रुपये है. इसे मनरेगा से जोड़ा गया है. कुछ महीने पहले ही यह रकम बढ़ा कर करीब दस हजार रुपये प्रति शौचालय कर दी गयी है. परंतु पैसा-प्रचार-प्रसार के बाद भी यह योजना उतनी तेजी से आगे नहीं बढ़ सकी है, जैसी उम्मीद थी. केंद्र सरकार का दावा है कि देश की 43 फीसदी आबादी ही शौचालय से वंचित है, पर सुलभ शौचालय योजना चलानेवाले डॉ बिंदेश्वर पाठक का कहना है कि देश की सिर्फ 30 फीसदी आबादी को ही शौचालय सुलभ हो सका है.

यूपी पुलिस के अधिकारी बता रहे हैं कि 60 फीसदी रेप खुले में शौच जानेवाली महिलाओं के साथ होते हैं और बदायूं में भी ऐसा ही हुआ. लड़कियां महादलित परिवार से थीं. लेकिन भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़े कहते हैं कि बदायूं में तो निर्मल भारत अभियान के तहत अभूतपूर्व काम हुआ है. 31 मई को अपडेट की गयी मंत्रलय की वेबसाइट में बताया गया है कि बदायूं में बीपीएल के लिए 1,07,603 शौचालय बनने थे और बने 1,07,719. इसी तरह स्कूलों में 4,860 और आंगनबाड़ी केंद्रों में 1,615 शौचालय बनने थे. दोनों ही जगह लक्ष्य सौ फीसदी हासिल कर लिया गया. एपीएल के लिए जरूर दो लाख के करीब शौचालय बनने थे, लेकिन सिर्फ सवा लाख ही बन पाये. केंद्र द्वारा जारी राशि का 88 प्रतिशत खर्च कर दिया गया. अब अगर यह आंकड़ा सच है, तो नाबालिग लड़कियों के बीपीएल परिवार में भी शौचालय होना चाहिए था और उन्हें खुले में जाने की जरूरत नहीं थी. अगर यह आंकड़ा सच है, तो पुलिस झूठ बोल रही है. पुलिस अपनी लापरवाही का दोष शौचालयों के न होने पर मढ़ रही है. अगर आंकड़े झूठ हैं, तो फिर निर्मल भारत अभियान की पोल खुलती दिख रही है.

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