आरटीआई पर चिंता
Updated at : 07 Aug 2018 6:19 AM (IST)
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निजी डेटा सुरक्षा से जुड़े विधेयक के मसौदे के बाद सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के लिए भी स्थिति बदली है. मसौदे में न्यायाधीश श्रीकृष्ण समिति की सिफारिशों के अनुरूप डेटा सुरक्षा के उपाय सुझाये गये हैं. ऐसे में आरटीआई कानून में संशोधन करते हुए यह ध्यान रखना होगा कि इससे कानून कमजोर न हो. […]
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निजी डेटा सुरक्षा से जुड़े विधेयक के मसौदे के बाद सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के लिए भी स्थिति बदली है. मसौदे में न्यायाधीश श्रीकृष्ण समिति की सिफारिशों के अनुरूप डेटा सुरक्षा के उपाय सुझाये गये हैं. ऐसे में आरटीआई कानून में संशोधन करते हुए यह ध्यान रखना होगा कि इससे कानून कमजोर न हो.
आरटीआई की मूल भावना जनहित से जुड़ी सूचनाओं को सार्वजनिक करने पर है, जबकि प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य किसी डेटा की निजता को बचाये रखना है. सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यलु ने आशंका जतायी है कि आरटीआई कानून की धारा- आठ के एक खास हिस्से में बदलाव से इस कानून का उद्देश्य बाधित होगा. इस हिस्से में निजी किस्म की सूचनाओं की रक्षा की बात की गयी है, पर कुछ शर्तों के साथ.
आरटीआई के तहत मांगी गयी सूचना अगर निजी किस्म की हो और उसके खुलासे का सार्वजनिक जीवन की गतिविधियों से कोई मतलब न हो, तो ऐसी सूचना को सार्वजनिक नहीं करने का निर्णय लिया जा सकता है. इसमें यह भी जोड़ा गया है कि निजी किस्म की सूचना के खुलासे का रिश्ता लोकहित की बातों से है या नहीं, इसका निर्णय केंद्रीय या प्रादेशिक स्तर के सूचना अधिकारी या अपील प्राधिकरण ही करेंगे.
विधेयक के मसौदे में आरटीआई के इस विधान में संशोधन की व्यवस्था देते हुए कहा गया है कि कानून के तहत मांगी गयी सूचना अगर निजी किस्म की है और इसके खुलासे से संबंधित व्यक्ति को भारी नुकसान की आशंका हो तथा यह नुकसान लोकहित की तुलना में बड़ा हो, तो ऐसी सूचना को सार्वजनिक नहीं किया जायेगा. आचार्यलु का तर्क है कि प्रस्तावित संशोधन स्पष्ट नहीं है. लोकहित की बातों से किसी निजी किस्म की सूचना के खुलासे का रिश्ता है या नहीं, इस बाबत संबंधित सूचना अधिकारी की निर्णायक शक्ति के बारे में भी संशोधन में कुछ नहीं कहा गया है.
किसी कानून में कोई भी संशोधन व्यापक सलाह और चर्चा से होना चाहिए, लेकिन आरटीआई में संशोधन के निर्णय में इस प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ. इस स्थिति में सूचना आयुक्त और इस मसले से जुड़े नागरिक संगठनों की यह चिंता जायज है कि आरटीआई में प्रस्तावित संशोधन से कानून की ताकत कम होगी. अपने वजूद के एक दशक से ज्यादा का वक्त पूरा कर चुका आरटीआई कानून जनता के सशक्तीकरण का एक जरिया सिद्ध हुआ है. लोकहित से जुड़ी सार्वजनिक सूचनाओं के खुलासे की मांग करती आरटीआई की अर्जियों की तादाद हर साल बढ़ती गयी है.
इस कानून ने आम जनता को मजबूत बनाया है और जमीनी स्तर पर होनेवाले सार्वजनिक कामों की एक हद तक निगरानी रखना और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना संभव हो पाया है. कानून स्थायी नहीं होते. नयी जरूरतों के मद्देनजर संशोधन किये जाते हैं, ताकि कानून उपयोगी बना रहे. लेकिन, संशोधन कानून की मूल भावना की रक्षा के लिए ही होता है, यह बात आरटीआई के संशोधन में भी ख्याल रखी जानी चाहिए.
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