भूले-बिसरे वीपी सिंह

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 02 Jul 2018 1:26 AM

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II आशुतोष चतुर्वेदी II प्रधान संपादक, प्रभात खबर ashutosh.chaturvedi @prabhatkhabar.in पच्चीस जून को पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म दिन गुजर गया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर तो छोड़िए, प्रदेश स्तर पर भी कोई चर्चा नहीं हुई. वीपी सिंह ही वह शख्स हैं, जो आरक्षण के विमर्श को भारतीय राजनीति के केंद्र में लाये थे. […]

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II आशुतोष चतुर्वेदी II
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi
@prabhatkhabar.in
पच्चीस जून को पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म दिन गुजर गया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर तो छोड़िए, प्रदेश स्तर पर भी कोई चर्चा नहीं हुई. वीपी सिंह ही वह शख्स हैं, जो आरक्षण के विमर्श को भारतीय राजनीति के केंद्र में लाये थे. जितने भी पिछड़े नेता हैं, उन्हें वीपी सिंह का शुक्रगुजार होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही पिछड़ों को भारतीय राजनीति में सम्मानजनक स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभायी थी.
यह विडंबना है कि जिस शख्स ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने जैसा महत्वपूर्ण फैसला लिया, पिछड़े उन्हें स्वीकार नहीं करते और सवर्ण तो उन्हें विलेन मानते ही हैं. वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार कर राजनीति की जो दिशा निर्धारित की थी, वह आज भी कायम है.
वीपी सिंह ने 15 अगस्त, 1990 को मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की थी. इससे देश की राजनीतिक में उथल-पुथल मच गयी थी.
इन सिफारिशों ने ही देश के वंचित तबकों के लिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता खोला था. मंडल सिफारिशें लागू होने के बाद पंचायतों से लेकर विधानसभाओं और संसद तक में स्थान आरक्षित हुए और सरकारी नौकरियों में भी वंचित तबके के लोगों को फायदा हुआ.
आज बाबा साहब भीम राव आंबेडकर की अनदेखी कोई राजनीतिक दल नहीं कर सकता है, लेकिन बाबा साहब को सम्मानित करने की शुरुआत वीपी सिंह के कार्यकाल में ही हुई थी. संसद के केंद्रीय कक्ष में तस्वीर लगाने से लेकर उन्हें भारत रत्न देने तक के फैसले इसी दौर में लिये गये.
जब मैं बीबीसी से जुड़ा था, तब मुझे उनसे अनेक बार लंबी बातचीत करने का मौका मिला. यह सन् 2005-06 की बात है. बीबीसी हिंदी सेवा ने तय किया कि कुछ विशिष्ट लोगों से बातचीत की जाए और उसे नियमित कॉलम के रूप में वेबसाइट पर पेश किया जाए.
इसमें वीपी सिंह से बातचीत का जिम्मा मुझे सौंपा गया. जब मैंने उनसे संपर्क किया, उस वक्त उन्हें हफ्ते में दो से तीन बार डायलिसिस के लिए अस्पताल जाना होता था. वीपी सिंह ने मुझे सुझाव दिया कि अस्पताल में डायलिसिस के दौरान आराम से लंबी बातचीत हो सकती है.
इसके बाद तो डायलिसिस के दिन मैं दिल्ली के अपोलो अस्पताल पहुंच जाता था. वह डायलिसिस के लिए विशेष रूम में लेटे मिलते, पैरों में पाइप फिट रहते, जिनसे मशीन के माध्यम से खून शरीर में आता-जाता नजर आता था. उनके बिस्तर के ऊपर एक लैपटॉप रखा मिलता, जिस पर वह खबरें और लेख पढ़ते मिलते. वह एक लंबा वक्तव्य देते थे. बीच-बीच में चंद सवाल होते और मैं इसे रिकॉर्ड कर लेता. इसे एक कॉलम की तरह पेश किया जाता था.
आजकल इमरजेंसी को लेकर काफी चर्चा चल रही है. उस दौरान वीपी सिंह से भी इस पर लंबी बातचीत हुई थी. उन्होंने कहा था- इंदिरा गांधी को गलत सलाह दी गयी थी. इमरजेंसी की जरूरत नहीं थी. अदालत ने उन्हें अयोग्य करार दे दिया.
यदि वह फिर चुनाव लड़तीं, तो भारी मतों से जीततीं और वह सबसे अच्छा जवाब होता. हम छह महीने बाद यह महसूस करने लगे थे कि गलत हो रहा है. पहले सब चीजें सुधरने लगी थीं. ट्रेने समय पर चलने लगीं थीं और बाबू लोग दफ्तर समय पर आने लगे थे, लेकिन नेताओं की गिरफ्तारियां हमें ठीक नहीं लगीं.
मैं उस वक्त इंदिरा सरकार में वाणिज्य उपमंत्री था. इस दौरान नसबंदी को लेकर ज्यादतियां हुईं. जब इमरजेंसी हटी और चुनाव में हम गये, तो वोटर कहते थे कि पहले अपनी नसबंदी करा लो, फिर हमसे वोट मांगो. इमरजेंसी हटाने के तुरंत बाद चुनाव हुए और लोगों ने अपना गुस्सा निकाला.
इंडिया इज इंदिरा जैसी बातें कहनेवाले लोग इंदिराजी की हार के बाद रातोंरात बदल गये. हार के बाद मैं इंदिराजी से मिला था और कहा था कि जनता में गुस्सा था, उसने थप्पड़ मारा है, सजा दी है, लेकिन उसने दिल से नहीं निकाला है.
तीसरे मोर्चे की भी आजकल चर्चा जोर शोरों से है. वीपी सिंह ने बातचीत में कहा था कि जमीनी स्तर पर तीसरे मोर्चे की हमेशा संभावना रही है. काफी वोटर हैं, जो एक नयी धारा चाहते हैं.
जब उड़ीसा में जनता दल का अधिवेशन हुआ था, तब हमने कहा था कि हम कांग्रेस को मिटाना नहीं चाहते हैं, क्योंकि राजनीति के दो पक्ष हैं- एक सत्ता पक्ष और दूसरा विपक्ष. राजनीति में एक समय आता है, जब विपक्ष ही सत्ता पक्ष का स्थान लेता है. मेरा मॉडल था कि जनता दल भी मजबूत रहे और कांग्रेस भी मजबूत रहे. जब मैंने यह बात जनता दल के अधिवेशन में कही, तो कई समाजवादियों को पसंद नहीं आयी, क्योंकि उन्हें कांग्रेस से एलर्जी रहती है.
मेरा मानना था कि कांग्रेस गायब हो जाए, यह देश के लिए अच्छा नहीं है. दोनों पक्ष- सत्ता पक्ष और विपक्ष धर्मनिरपेक्ष होने चाहिए. सैद्धांतिक रूप से भले ही मैं तीसरे मोर्चे के पक्ष में हूं, लेकिन मेरा मानना है कि बहुत अर्से बाद यूपीए बना है. भले ही तीसरा मोर्चा गठित करना संभव हो, लेकिन फिलहाल व्यावहारिक रूप में इसकी जरूरत नहीं है. मेरा मानना है कि यूपीए अगर किसी वजह से अस्थिर हुआ, तो भाजपा बड़ी ताकत के साथ सत्ता में आयेगी.
नेता अक्सर अपने स्वास्थ्य को लेकर कुछ नहीं बोलते, लेकिन वीपी सिंह अपने स्वास्थ्य पर खुलकर बोले थे. उन्होंने कहा था- जिंदगी पूरी हो गयी लगती है. अब मैं एक दिन जिंदगी की लड़ाई लड़ता हूं और दूसरे दिन जनता के लिए. यह काफी अर्से से चल रहा है. लेकिन जो बीमारियां हैं, उनकी दवा नहीं है. मैं मानता हूँ कि जनता की दुआ से सब काम चल रहा है. मेरी एक तो किडनी ने काम करना बंद कर दिया है.
दूसरा मुझे मल्टीपल मायलोमा है, जो एक प्रकार का कैंसर है. पिछले साल इसकी कीमोथैरिपी भी हुई. इसका कोई इलाज नहीं है. किडनी ट्रांसप्लांट की बात भी हुई, लेकिन डॉक्टरों ने मना कर दिया. अब हफ्ते में तीन दिन डायलिसिस होता है. इस प्रक्रिया में पूरा दिन निकल जाता है. बीच में, मैं गुरिल्ला वारफेयर करता हूं. हम जानते हैं कि बहुत दिन नहीं हैं.
इन बचे हुए दिनों में मुंह लटका के बैठ जाएं, तो जो बचा है, वह भी गया. मैं अपना समय पेंटिंग में भी लगाता हूं. सबसे बड़ी बात है कि जिस बात में परिवर्तन नहीं हो सकता, उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, लेकिन ऐसा भी नहीं कि उससे मैं कम लड़ता हूं या फिर उससे हार मान ली हो. मानसिक रूप से जब दुख नहीं रह गया, तो फिर कैसी बीमारी.
उनके ये शब्द आज भी मुझे याद हैं- जब तक हैं, तब तक हैं. जब वक्त आयेगा, तो देखेंगे. इस उम्र में तो बोरिया बिस्तर बांधे रखना चाहिए.
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