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चुनाव आयोग की साख का सवाल

Updated at : 30 May 2018 6:02 AM (IST)
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चुनाव आयोग की साख का सवाल

II नवीन जोशी II वरिष्ठ पत्रकार naveengjoshi@gmail.com बीते सोमवार देश के दस राज्यों में चार लोकसभा और दस विधानसभा सीटों के उप-चुनाव के लिए मतदान समाप्त होते-होते सोशल मीडिया पर दिग्गज राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर नामी लेखकों-पत्रकारों की तीखी टिप्पणियां चुनाव आयोग पर बरसने लगीं. किसी ने इस संवैधानिक संस्था का मजाक बनाया, तो कोई […]

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II नवीन जोशी II
वरिष्ठ पत्रकार
naveengjoshi@gmail.com
बीते सोमवार देश के दस राज्यों में चार लोकसभा और दस विधानसभा सीटों के उप-चुनाव के लिए मतदान समाप्त होते-होते सोशल मीडिया पर दिग्गज राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर नामी लेखकों-पत्रकारों की तीखी टिप्पणियां चुनाव आयोग पर बरसने लगीं. किसी ने इस संवैधानिक संस्था का मजाक बनाया, तो कोई उसे ज्यादा जिम्मेदार और जवाबदेह होने की सलाह देने लगा. विपक्षी दल तो दिनभर साजिश के आरोप लगाते ही रहे.
लगभग सभी राज्यों में कई मतदान केंद्रों से दिनभर इवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) के गड़बड़ होने की शिकायतें आती रही थीं.
कहीं इवीएम ने काम नहीं किया, तो कहीं उसके साथ लगी वह मशीन (वीवीपीएटी) ठप हो गयी, जिसमें छपी पर्ची से मतदाता अपना वोट सही जगह पड़ने की पुष्टि करता है. कहीं-कहीं इन मशीनों को बदलने में डेढ़-दो घंटे भी लगे. मतदाता लाइन लगाये इंतजार करते रहे. विपक्षी दलों से लेकर सत्तारूढ़ भाजपा तक ने चुनाव आयोग से शिकायत की.
शाम को आयोग की ओर से बयान आया कि राजनीतिक दल शिकायत को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहे हैं. कहीं-कहीं इवीएम और वीवीपीएटी मशीनें खराब हुईं, जिन्हें बदल दिया गया. पर्याप्त संख्या में वैकल्पिक मशीनें रखी रहती हैं. भीषण गर्मी, मतदान कर्मियों की अनुभवहीनता और लापरवाही को आयोग ने मशीनें खराब होने का कारण बताया.
ट्विटर पर आयोग को इसी बयान के कारण हमले झेलने पड़े. यह सचमुच हास्यास्पद बयान था. हमारे देश में अब तक ज्यादातर चुनाव मार्च से जून तक होते रहे हैं, जो भीषण गर्मी के महीने होते हैं. 2019 का आम चुनाव भी समय से पहले नहीं हुआ, तो अप्रैल-मई में ही होगा.
क्या गर्मी वास्तव में मशीनों के खराब होने का कारण है? मतदान कर्मियों की अनुभवहीनता के लिए भी स्वयं आयोग ही जिम्मेदार ठहरता है. इवीएम से चुनाव कराते काफी समय बीत चुका और वीवीपीएटी मशीनें भी नयी नहीं रहीं. बहरहाल, 2019 के आम चुनाव से पहले के ये महत्वपूर्ण उप-चुनाव विपक्षी एकता बनाम भाजपा की चर्चा की बजाय चुनाव आयोग तथा इवीएम का विवाद बनकर रह गये.
हारे हुए प्रत्याशी और दल अक्सर इवीएम में गड़बड़ी की शिकायत करते हैं. 2009 के आम चुनाव में पराजय के बाद भाजपा ने इवीएम की बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की थी. कई दलों ने भी उसके सुर में सुर मिलाया था.
2014 में भाजपा की भारी जीत के बाद से कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दल भाजपा और आयोग पर इवीएम से छेड़छाड़ के आरोप लगाते रहे हैं. यहां तक कहा गया कि इवीएम में कोई भी बटन दबाने पर वोट भाजपा को ही जाता है. तब चुनाव आयोग ने दलों को चुनौती दी थी कि वे इवीएम से छेड़छाड़ करके दिखाएं.
इवीएम से किसी तरह की छेड़छाड़ के कोई सबूत आज तक नहीं मिले हैं. आखिर है तो टेक्नोलॉजी ही, इसलिए माना जाता है कि कहीं दो-एक मशीनों में छेड़छाड़ संभव हो सकती है. विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े पैमाने पर ऐसा असंभव है.
चूंकि मशीनें हैं, इसलिए वे कभी अचानक काम करना बंद कर सकती हैं. उन्हें संचालित करनेवाले इंसान हैं, इसलिए उनसे भी गड़बड़ी हो सकती है. इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है. ज्यादा गड़बड़ी पर पुनर्मतदान की व्यवस्था है ही. इसलिए कोई कारण नहीं होना चाहिए कि इवीएम और आयोग को निशाने पर रखा जाये.
निर्वाचन आयोग की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष मतदान कराये. मतदान केंद्रों पर कब्जे, मतपेटियों की लूट तथा फर्जी एवं खून-खराबे वाले मतदान के दौर से हम आगे निकल आये हैं.
टीएन शेषन ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहते आम मतदाता के बीच आयोग की जो साख स्थापित की और जिसे उनके बाद के कई आयुक्तों ने बरकरार रखा, उसे बढ़ाने में इवीएम का योगदान निर्विवाद रहा है. भारत जैसे बड़े देश में बैलेट पेपर की ओर वापस जाना बुद्धिमानी नहीं है. इवीएम की विश्वसनीयता के लिए उसकी तकनीकी श्रेष्ठता और मतदान कर्मियों के बेहतर प्रशिक्षण पर ध्यान देना होगा.
निर्वाचन तंत्र की साख बनी रहे, यह सुनिश्चित करना वर्तमान निर्वाचन आयुक्तों की जिम्मेदारी है. उन्हें सतर्क रहना चाहिए कि उनके किसी बयान या निर्णय से इस संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर आंच न आये. दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय में ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे आयोग की तरफ उंगलियां उठी हैं.
बाढ़ राहत के नाम पर गुजरात विधानसभा चुनावों की तारीख की घोषणा को टालना, कर्नाटक चुनाव की तारीख का लीक हो जाना, जैसे कुछ प्रकरण आयोग की प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं रहे.
विपक्षी दलों की इस प्रवृत्ति की भी निंदा की जानी चाहिए कि वे बिना सोचे-समझे फौरन सत्तापक्ष के लाभार्थ इवीएम से छेड़-छाड़ का आरोप लगाने लगते हैं.
ऐसा करके न केवल वे चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा को धूमिल करते हैं, वरन जनता के मन में इवीएम के प्रति अनावश्यक संदेह पैदा करते हैं. इवीएम के साथ वीवीपीएटी मशीनें इसी संदेह को दूर करने के लिए लगायी जा रही हैं. 2013 में एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इन मशीनों को लगाने का निर्देश दिया था, ताकि मतदाता आश्वस्त हो सके कि उसका वोट सही जगह गया है.
आगामी आम चुनाव इस दृष्टि से और भी महत्वपूर्ण है कि भारी बहुमत से केंद्र की सत्ता में विराजमान भाजपा के खिलाफ विपक्ष एकजुट होने की कोशिशों में लगा है. उत्तर प्रदेश के उप-चुनावों के बाद कर्नाटक के नाटक ने विपक्षी एकता की संभावना बढ़ा दी है. मुकाबले के लिए भाजपा और भी जोर-शोर से तैयार हो रही है. जाहिर है कि संग्राम घनघोर होगा.
आरोप-प्रत्यारोपों में निजी और अनपेक्षित हमले अभी से शुरू हो चुके हैं. चुनावी युद्ध में मर्यादा का उल्लंघन हमारे यहां होता रहता है. पूरी आशंका है कि इस बार कुछ और सीमाएं ध्वस्त होंगी. पहले से ही घायल हमारे लोकतंत्र की कड़ी परीक्षा तय है.
ऐसे में अत्यावश्यक है कि संवैधानिक प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता यथासंभव बनी रहे. कर्नाटक के ताजा मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश हमारे विश्वास की रक्षा करनेवाला साबित हुआ. चुनाव आयोग से भी ऐसे ही राहत के झोंकों की आशा है.
मतदान तंत्र की चुस्ती, चौकसी और आश्वस्तिदायक भूमिका अनिवार्य है. इवीएम की गड़बड़ियां न्यूनतम हों, शिकायतों पर त्वरित विश्वास बहाली वाली कार्रवाई हो, न्याय हो ही नहीं, होता हुआ भी दिखे, यह चुनाव आयोग को सुनिश्चित करना होगा.
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