टेक्निकल विकासवाले दंगे!
Updated at : 21 May 2018 6:51 AM (IST)
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आलोक पुराणिक वरिष्ठ व्यंग्यकार विकास विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता निबंध इस प्रकार है- विकास हो रहा है और तेजी से हो रहा है. पहले बेकार के मुद्दों पर दंगे-मारधाड़ होती थे, पर हाल में औरंगाबाद में हुए दंगे-मारधाड़ की वजह देश के बुनियादी ढांचे से जुड़ी मिली. पानी की सप्लाई […]
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आलोक पुराणिक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
विकास विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार विजेता निबंध इस प्रकार है-
विकास हो रहा है और तेजी से हो रहा है. पहले बेकार के मुद्दों पर दंगे-मारधाड़ होती थे, पर हाल में औरंगाबाद में हुए दंगे-मारधाड़ की वजह देश के बुनियादी ढांचे से जुड़ी मिली. पानी की सप्लाई को लेकर एक शहर में भीषण मारधाड़ हुई. इससे पता लगता है कि जनता में जागृति का भाव आ रहा है बेकार के मसलों पर मारधाड़ के बजाय पानी जैसे बुनियादी मुद्दों पर दंगे भड़क रहे हैं. जनता जागरूक हो रही है. इसे हम विकास मान सकते हैं. एक वक्त में लोग टीबी जैसी बैकवर्ड बीमारी से मरते थे. अब लाइफ स्टाइल बीमारियां जैसे डाइबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से हजारों लोग मर रहे हैं.
लाइफ स्टाइल वाली बीमारी से मरने का आशय है कि बंदे के पास खूब खाने पीने की रकम है, इसलिए लाइफ स्टाइल वाली स्टाइल में मर रहा है. पहले पोषक खाने के अभाव में बंदे टीबी से मरते थे. टीबी के बजाय लोग डाइबिटीज से मर रहे हैं, भले ही ज्यादा मर रहे हैं, पर इसे भी विकास में तेज गति का सूचक माना जा सकता है. डाइबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से मरनेवाले घनघोर विकास को रेखांकित करते हैं. बंदे में ब्लड है, चिंताएं हैं, तब ही तो हाई ब्लड प्रेशर होगा. गरीबों को कोई चिंता ना होती. चिंता अधिकाधिक कमाई करनेवालों को होती है.
पुराने जमाने में दादाजी नब्बे तक खेंच जाते थे. चिंता नहीं करते थे. दाल-रोटी खाकर मगन रहते थे. अब कार की नहीं ,बड़ी कार की चिंता होती है. अब मोबाइल फोन की नहीं, सबसे महंगेवाले मोबाइल की चिंता होती है. इसे ही विकास कह सकते हैं.
विकास के कई आयाम हैं. पहले भारत में महिलाएं सस्ते प्याज-आलू के लिए लड़ती थीं. फिर विकास आया तो टीवी सीरियलों से कनफर्म किया जा सकता है कि अब चौथे, पांचवें, आठवें दसवें लव अफेयर पर झगड़ा होता है.
इसे भी तेज विकास का संकेत समझा जा सकता है. दाल-रोटी की चिंता से पार हो चुका है भारत, चिंता अब सिर्फ अफेयरों की बची है. ऐसा तमाम टीवी सीरियल देखकर साफ होता है.
इन दिनों कई जगहों पर पार्किंग स्पेस के लिए सिर फूटने के समाचार आ रहे हैं. कार-आधिक्य ने विकास की स्पीड बढ़ा दी है. बिल्डिंग में जब पार्किंग स्पेस पर दंगा होने लगे, तो समझें -विकास भरपूर आ लिया है. पहले लोग दारु पीकर लड़ते थे.
विकास और उन्नति करेगा, तो एक दिन दंगे वाई-फाई की गुणवत्ता पर होंगे. अभी तो होता यह है कि जहां दंगे होते हैं, वहां इंटरनेट, वाई-फाई सब बंद कर दिया जाता है. एक दिन वह भी आयेगा जब जनता में इतनी जागृति फैल जायेगी कि वह श्रेष्ठ गुणवत्तावाले वाई-फाई के लिए दंगातुर हो उठेगी.
जनता इस बात पर दंगा करेगी कि जो स्पीड बतायी गयी थी, वह स्पीड वास्तव में इंटरनेट में आ नहीं रही है. वाई-फाई की गुणवत्ता के लिए जब नियमित दंगे होंगे, तब हम मान सकते हैं कि जनता के गहरे सरोकार अब तकनीकी विकास के साथ हो गये हैं.
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