चढ़ वर्तमान की छाती पर!

Updated at : 15 May 2018 12:32 AM (IST)
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चढ़ वर्तमान की छाती पर!

सुरजीत सिंह, व्यंग्यकार surjeet.sur@gmail.com इतिहास उत्खनन हंगामा-दंगाखेज घटनाओं को देखते हुए समय आ गया है, देश के गले में हड्डी की तरह फंस चुके नारे ‘हमारा नेता कैसा हो’ से आगे बढ़कर ‘इतिहास हमारा कैसा हो’ का नारा बुलंद हो! क्योंकि नेता तो चाहे जैसा हो, वह चल निकलेगा और चलते रहने के लिए वह […]

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सुरजीत सिंह, व्यंग्यकार

surjeet.sur@gmail.com
इतिहास उत्खनन हंगामा-दंगाखेज घटनाओं को देखते हुए समय आ गया है, देश के गले में हड्डी की तरह फंस चुके नारे ‘हमारा नेता कैसा हो’ से आगे बढ़कर ‘इतिहास हमारा कैसा हो’ का नारा बुलंद हो! क्योंकि नेता तो चाहे जैसा हो, वह चल निकलेगा और चलते रहने के लिए वह रोज-रोज इतिहास के पन्ने ही फाड़ेगा. इतिहास के जर्द पन्नों पर रोशनी डालकर उसके रिफ्लेक्शन से अपना चेहरा चमकायेगा. शव साधना मेें यकीन करनेवाले देश में इसीलिए मुर्दे गहरे नहीं गाड़े जाते, उन्हें बात-बात पर उखाड़ना पड़ता है. वे एक नारे से उठकर बैठ जाते हैं- जो हुकुम मेरे आका!
वर्तमान का सारा भूत-भविष्य इतिहास में ही तलाशा जा रहा है. इसलिए नया नारा यह होना चाहिए कि ‘इतिहास हमारा कैसा हो’! बिलकुल हमारे जैसा हो. हमारे मनमुताबिक हो. उसकी अतीत के प्रति नहीं, वर्तमान के प्रति जवाबदेही होनी चाहिए. एक तरह से उसे टिश्यू पेपर की तरह होना चाहिए, जिससे वर्तमान का धूल-धूसरित चेहरा पोंछा जा सके.
आज वर्तमान की छाती पर पैर रखकर दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें गिराने पर आमादा हैं. हलचल से दीमक खाया इतिहास गिर पड़ता है. बाहर दंगे-फसाद और कर्फ्यू लग जाते हैं. ओह, बड़ा जोखिम है. जोखिम है, तभी बदलना जरूरी है! सियासत ऐसे जोखिम में ही अपनी खुराक ढूंढ़ती है.
इतिहास जैसा भी हो, मगर इतिहास जैसा कतई नहीं होना चाहिए. इतिहास की यही एक दिक्कत है, वह हर कोण से इतिहास जैसा लगता है. हमें जो चीज इतिहास जैसी लगती है, उसे हम वर्तमान जैसा बनाना चाहते हैं और जो वर्तमान है, उसे इतिहास बनाने पर आमादा हैं. काल्पनिक इतिहास के नाम पर वर्तमान को रौंदते हैं. एक अफवाह पर आंखों पर जातीय गौरव की पट्टी बांध इतिहास के गड्ढे में कूद जाते हैं. और फ्यूचर की ओर तो हमारी पीठ है.
वैसा इतिहास किस काम का, जिसे बदल ही ना पायें. इतिहास ऐसा हो, जो जिन्ना को कट्टर और सेक्यूलर दोनों घोषित करने की सहुलियत दे. इतिहास को घोषणापत्र जैसा होना चाहिए, जीतकर भूल जायें और भूलकर जीत जायें.
कायदे से इतिहास जीएसटी जैसा हो कि जिस राज्य में चुनाव हों, वहां हार की आशंका को देखते हुए कुछ चीजों पर टैक्स घटा दें. नेता यहां वोट मांगने जायें, तो अकबर को महान घोषित कर दें, वहां जायें, तो महाराणा प्रताप को विजेता घोषित कर दें. यानी जैसे लोग, वैसा इतिहास!
क्यों न रोज के झगड़े को देखते हुए फ्यूचर का इतिहास अभी से लिखा जाये! ना रहेगा इतिहास, ना होगा विवाद!
अभी यह मांग उठनी भी बाकी है, जब कोई पार्टी मांग करेगी कि आगे से जो भी इतिहास लिखा जाये, उसके पन्ने कोरे छोड़े जायें, ताकि फ्यूचर के वर्तमान के अनुरूप उसमें लिखा जा सके. वर्तमान की इतिहास विषयक उठा-पठक को देखते हुए एक नारा मेरे मन में भी कुलबुला रहा है- ‘चढ़ वर्तमान की छाती पर, इतिहास बदल दो जाति पर!’
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