किसानों की पदयात्रा
Updated at : 13 Mar 2018 6:51 AM (IST)
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देश की वित्तीय राजधानी मुंबई फिलहाल किसानों और आदिवासियों की मांगों की धमक महसूस कर रही है. अखिल भारतीय किसान सभा की अगुवाई में छह मार्च को हजारों की तादाद में किसान महाराष्ट्र के नासिक और आसपास के इलाकों से निकले और दो सौ किलोमीटर पैदल चलकर रविवार की रात मुंबई पहुंचे. राज्य की विपक्षी […]
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देश की वित्तीय राजधानी मुंबई फिलहाल किसानों और आदिवासियों की मांगों की धमक महसूस कर रही है. अखिल भारतीय किसान सभा की अगुवाई में छह मार्च को हजारों की तादाद में किसान महाराष्ट्र के नासिक और आसपास के इलाकों से निकले और दो सौ किलोमीटर पैदल चलकर रविवार की रात मुंबई पहुंचे. राज्य की विपक्षी पार्टियों और सिविल सोसाइटी ने किसानों की मांगों का समर्थन किया है.
सरकार ने शुरुआती टालमटोल के बाद कई मांगों को मान लिया है और बाकी पर गंभीरता से विचार का आश्वासन दिया है. आंदोलनकारी किसानों ने कर्ज माफी, उपज का लाभकारी मूल्य और फसल बीमा की कारगर व्यवस्था जैसी बरसों से चली आ रही समस्याओं तथा जंगल की जमीन के पट्टे जैसी मांगों को लेकर यह मार्च निकाला है. लेकिन, ये मुद्दे महाराष्ट्र के एक जिले तक सीमित नहीं हैं.
कई राज्यों में किसान बेहतर मूल्य तथा कर्जमाफी के लिए आवाज उठा रहे हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था का एक कड़वा सच यह है कि ज्यादातर आबादी जीविका के लिए किसानी और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है, लेकिन कुल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में कृषि तथा संबंधित गतिविधियों का योगदान लगातार कम होता जा रहा है.
उदारीकरण के दौर में खेतिहर आबादी की आमदनी अन्य पेशेवर तबकों की तुलना में बड़ी धीमी गति से बढ़ रही है. खेती घाटे का सौदा बन गयी है और ज्यादातर किसान परिवार जीविका का कोई अन्य विकल्प मौजूद न होने की मजबूरी में ही खेती में लगे हैं. यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि देश के अधिकतर किसान सीमांत किसान हैं, यानी उनकी जोत बहुत अधिक नहीं है.
सरकारी कर्ज मिलने की मुश्किलों के कारण अक्सर उन्हें भारी सूद पर महाजनों से उधार लेना पड़ता है. किसान की इच्छा होती है कि वह उपज को जल्दी बेचकर नकदी जुटा ले. ऐसे में वह खुले बाजार का मोहताज होता है. समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और भंडारण की लचर व्यवस्था उसकी बेचारगी को और बढ़ा देती है. यही पैटर्न देश के अलग-अलग हिस्सों में है.
स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर साल लगभग 12 हजार किसान अपनी जान दे देते हैं. भारत के करीब नौ करोड़ खेतिहर परिवारों में से करीब 70 फीसदी परिवार कमाई से अधिक उपज पर खर्च कर देते हैं. बीते एक दशक में कृषि क्षेत्र में बजट आवंटन में बढ़ोतरी तो हुई है, पर उसका लाभ किसानों के बजाय कृषि उत्पादों के कारोबार को मिल रहा है. मुंबई की जुटान किसान असंतोष का एक संकेत भर है.
सरकार को तुरंत ही किसानों को फौरी राहत देने तथा उपज के उचित दाम पर ध्यान देना चाहिए. बजट के प्रावधानों को कागजों से उतारकर खेतों और मंडियों तक ले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इसके साथ ही, कृषि संकट के दीर्घकालिक समाधान के लिए विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों के आधार पर तथा किसानों से सलाह-सुझाव लेकर ठोस नीतिगत पहल करनी चाहिए.
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