जीडीपी के मायने

Updated at : 06 Mar 2018 6:30 AM (IST)
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जीडीपी के मायने

कुछ दिन पहले आये वित्त वर्ष 2017-18 की तीसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के आंकड़ों का एक संकेत है कि चीन को पछाड़ते हुए भारत दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़नेवाली अर्थव्यवस्था बन गया है. अक्तूबर-दिसंबर, 2017 में जीडीपी की वृद्धि दर 7.2 फीसदी पर जा पहुंची है, जबकि चीन की दर […]

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कुछ दिन पहले आये वित्त वर्ष 2017-18 की तीसरी तिमाही के सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) के आंकड़ों का एक संकेत है कि चीन को पछाड़ते हुए भारत दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़नेवाली अर्थव्यवस्था बन गया है.
अक्तूबर-दिसंबर, 2017 में जीडीपी की वृद्धि दर 7.2 फीसदी पर जा पहुंची है, जबकि चीन की दर फिलहाल 6.8 फीसदी है. वृद्धि दर का सकारात्मक और तीव्रतर होना अर्थव्यवस्था के उभार का सूचक है. जीडीपी की बेहतरी यह भी बताती है कि निवेशकों का भरोसा बहाल है.
निवेश के बढ़ने से कंपनियों के लिए कारोबार बढ़ाने के अवसर पैदा होते हैं. बाजार में मांग और आपूर्ति का सिलसिला मजबूत होता है. जीडीपी में बढ़ोतरी के जरिये बेशक ऐसे अनुमान लगाये जा सकते हैं और यह एक हद तक जायज भी है, लेकिन सकारात्मक बात का एक संदर्भ होता है और उस संदर्भ पर गौर करना किसी आर्थिक संकेतक के निहितार्थों को समुचित रूप से समझने में मददगार होता है.
चीन की आर्थिक वृद्धि दर अभी भारत से कमतर है, परंतु चीनी अर्थव्यवस्था का कुल मोल फिलहाल 23 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ते हुए 2.25 ट्रिलियन डॉलर के मोल तक पहुंची है. लिहाजा, 6.8 फीसदी की वृद्धि दर से भी जितने समय में चीन अपनी अर्थव्यवस्था के मोल में 1,183 बिलियन डॉलर का इजाफा करेगा, उतने समय में भारत 7.2 फीसद की रफ्तार कायम रहते हुए भी तकरीबन 500 बिलियन डॉलर की ही बढ़त जोड़ सकेगा.
दूसरी बात जीडीपी में प्रति व्यक्ति हिस्सेदारी की है. इस लिहाज से चीन की अर्थव्यवस्था भारत की तुलना में पांच गुना ज्यादा बड़ी है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था 32 गुना. ध्यान रखने की एक बात यह भी है कि 1991 में भारत की जीडीपी का कुल मोल 275 बिलियन डॉलर था और साल 2017 में यह 2.25 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया.
विशेषज्ञों के अनुमान के मुताबिक, अगर आगे यह वृद्धि दर जारी रहती है, तब भी 2030 तक भारत 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन पायेगा, जो अमेरिका (19 ट्रलियन डॉलर) तथा चीन (23 ट्रिलियन डॉलर) से बहुत कम है. यह भी उल्लेखनीय है कि मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही की दर को राजस्व वसूली और सोना-चांदी की अधिक खरीद से भी उछाल मिला है.
जाहिर है, आर्थिक वृद्धि दर को देश के आम नागरिकों के जीवन-स्तर और आर्थिक स्थिति का सही संकेतक बनाने के लिए दो मोर्चों पर काम करना आवश्यक है. एक तो जीडीपी की अपेक्षित बढ़वार कायम रहनी चाहिए तथा दूसरे, जीडीपी में लोगों की हिस्सेदारी में इजाफा होना चाहिए.
चूंकि जीडीपी देश के हर आर्थिक व्यवहार को समाहित करता है, इसलिए यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जिन क्षेत्रों से अधिकाधिक लोगों को रोजगार मिलता हो तथा देश के विकास और समृद्धि को सीधे आधार मिलता हो, उनकी बढ़त पर सरकार और उद्योग जगत अपना ध्यान केंद्रित करें.
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