शिशुओं को बचायें

जनवरी में बजट को लेकर जोर पकड़ती चर्चाओं के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री ने विकास नीति के लिहाज से बड़ी मानीखेज टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि देश के ज्यादातर लोग आज भी खेती पर निर्भर हैं, ऐसे में अगर कृषि क्षेत्र को आर्थिक वृद्धि का लाभ नहीं मिलता है, तो उसे उचित तथा […]
जनवरी में बजट को लेकर जोर पकड़ती चर्चाओं के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री ने विकास नीति के लिहाज से बड़ी मानीखेज टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि देश के ज्यादातर लोग आज भी खेती पर निर्भर हैं, ऐसे में अगर कृषि क्षेत्र को आर्थिक वृद्धि का लाभ नहीं मिलता है, तो उसे उचित तथा समान विकास नहीं कह सकते हैं.
इस टिप्पणी का विस्तार करते हुए कहा जा सकता है कि आर्थिक बढ़त सामाजिक विकास में परिणत होकर ही तर्कसंगत कहला सकती है. समृद्धि से व्यक्ति और समाज की योग्यता और क्षमता में बढ़ोतरी होनी चाहिए, क्योंकि इस बढ़त और विकास से ही लोकतंत्र में व्यक्ति के लिए बेहतर स्थितियां तैयार हो सकती हैं. लेकिन सामाजिक विकास के सूचकांकों पर गौर करें, तो भारत कुछ मामलों में अपने पड़ोसी बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल से भी पीछे नजर आता है.
मिसाल के तौर पर नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को लिया जा सकता है. संयुक्त राष्ट्रसंघ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर नवजात शिशुओं की मृत्यु दर 25 है यानी 1000 शिशुओं में 25 शिशु अपने जन्म के 28 दिन के भीतर काल-कवलित होने को अभिशप्त हैं. बांग्लादेश में यह दर 20.1 और श्रीलंका में 5.3 है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में हर साल छह लाख नवजात शिशु जन्म के एक माह के भीतर मौत के शिकार होते हैं. यह वैश्विक स्तर पर नवजात शिशुओं की मृत्यु का एक चौथाई हिस्सा है.
ऐसा नहीं है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में कमी के सरकारी प्रयासों का कोई असर नहीं हुआ है. साल 1990 के दशक में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर प्रति हजार जीवित शिशुओं के जन्म पर 52 थी. साल 2013 में यह घटकर 28 पर आयी और अब इसमें कुछ और कमी आयी है. लेकिन, शिशुओं की मृत्यु दर में कमी अपेक्षा या सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (एमडीजी) के अनुकूल नहीं है.
जन्म के कुछ ही समय के भीतर शिशुओं के मरने की दर का ऊंचा होना कई स्थितियों की ओर संकेत करता है. भारत में अस्पताली प्रसव की तादाद अभी तुलनात्मक रूप से कम है. जहां तक माताओं की सेहत का सवाल है, ज्यादातर माताओं को गर्भावस्था में जरूरी पोषण नहीं मिल पाता है और न ही प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा को समुचित चिकित्सीय देखभाल उपलब्ध होती है. अस्पताली प्रसव को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने वित्तीय सहायता देने की योजना चलायी है,परंतु अन्य कई नीतियों की तरह इसका क्रियान्वयन लचर है.
देश में हर जगह इस योजना की कामयाबी एक-सी नहीं है. कम उम्र में ब्याह और मां बनना भी शिशु मृत्यु दर के अधिक होने की एक वजह है. सामाजिक विकास के मद में पर्याप्त सरकारी खर्च तथा बुनियादी सुविधाओं के आधारभूत ढांचे के विस्तार की सख्त जरूरत है, ताकि भारत दुनिया में ‘सबसे ज्यादा नवजात शिशुओं की मृत्यु वाला देश’ कहलाने के कलंक से बच सके.
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