भीमा कोरेगांव का प्रतीक

Updated at : 12 Jan 2018 7:30 AM (IST)
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भीमा कोरेगांव का प्रतीक

डॉ अनुज लुगुन सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया दासता से मुक्ति के पूर्वज के रूप में स्पार्टाकस को याद किया जाता है. रोमन साम्राज्य की महानता के नीचे दासों की सिसकियां दबी हुई थी. गौरव, वैभव और विस्तार शासक की चाबुक और दासों की पीठ पर टिकी थी. यह ऐसी नृशंसता थी, जो […]

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डॉ अनुज लुगुन

सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया

दासता से मुक्ति के पूर्वज के रूप में स्पार्टाकस को याद किया जाता है. रोमन साम्राज्य की महानता के नीचे दासों की सिसकियां दबी हुई थी. गौरव, वैभव और विस्तार शासक की चाबुक और दासों की पीठ पर टिकी थी.

यह ऐसी नृशंसता थी, जो लोगों को दिखती तो थी, लेकिन उन्हें पीड़ा के बजाय उससे सुख मिलता था. समाज, कानून और उसकी मान्यताएं ‘ग्लैडिएटर’ की मौत पर उत्सव मनाते थे. स्पार्टाकस ने विद्रोह की जो नींव डाली, वह दुनियाभर में मुक्ति का अप्रतिम उदाहरण बना. इससे संदेश मिला कि मनुष्यता किसी वर्ग या समुदाय की जागीर नहीं, बल्कि हर मनुष्य का हक है. यह सिर्फ रोमन साम्राज्य की बात नहीं है, दुनियाभर में दासता की कहानियां हैं. हर समाज में उसके विरुद्ध संघर्ष का इतिहास है. इस साल एक जनवरी, 1818 की घटना के 200 वर्ष पूरे हुए. इस घटना का संदर्भ भी दासता की मुक्ति से जुड़ा हुआ है.

इस साल एक जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में उपद्रव हुए. वहां प्रति वर्ष लाखों की संख्या में दलित समुदाय के लोग एकत्रित होते हैं और पेशवा के विरुद्ध हुई लड़ाई के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं.

इस लड़ाई में एक ओर पेशवा और उसकी विशाल सेना थी और दूसरी ओर अंग्रजों की तरफ से महार रेजीमेंट के पांच सौ महार सैनिक थे. इस घटना को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने दिया. दलित जागरण के साथ इस घटना का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बढ़ता गया. घटना के 200 वर्ष पूरे होने पर इस साल फिर से बड़ी संख्या में दलित समुदाय के लोग वहां जुटे थे. लेकिन इस बार एक अन्य समुदाय ने कार्यक्रम पर आपत्ति दर्ज करते हुए उसे बाधित करने की कोशिश की, जिससे उपद्रव की स्थिति पैदा हुई.

भीमा कोरेगांव की घटना को राष्ट्रीय आंदोलन की नजर से देखें, तो यह देसी पेशवा और विदेशी अंग्रेजों की लड़ाई है. अंग्रेज शासन के लिए मराठों को पराजित करना जरूरी था, क्योंकि उनकी राजनीतिक शक्ति बहुत थी. दलित वैचारिकी इस घटना का अलग ऐतिहासिक पाठ तैयार करती है, जिसका सांस्कृतिक निहितार्थ है. छत्रपति शाहूजी महाराज के बाद मराठा साम्राज्य में पेशवाओं की पकड़ मजबूत हो रही थी और आगे चलकर पेशवा निर्णायक हो गये.

उनके शासन में दलितों की अपमानजनक सामाजिक स्थिति थी. गले में हड्डी या कटोरा डाल कर रखना और कमर में झाड़ू बांध कर चलना जैसे नियम मानवीय गरिमा के खिलाफ थे. ऐसे में उस समाज और शासन के विरुद्ध विद्रोह स्वाभाविक था. दलित विचारक पेशवा शासन को ब्राह्मणवादी शासन मानते हैं, जिसमें अछूतों की स्थिति दासता की स्थिति थी. ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले दलित मुक्ति के रेडिकल वैचारिक सूत्रधार बने. आगे चलकर आंबेडकर इसके मजबूत स्तंभ बने और उन्होंने दलितों की दासता की मुक्ति के रूप में हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म को अपनाया. इसलिए दलितों को भीमा कोरेगांव का संघर्ष मुक्ति का वैकल्पिक आहट प्रतीत होता है.

चूंकि, हिंदुत्ववादी शक्तियां पेशवाई को हिंदू शासन के गौरव के रूप में व्याख्यायित करती हैं. उन्हें लगता है कि मराठों ने मुस्लिम शासकों को चुनौती देकर हिंदू मन को आत्मसम्मान दिया.

वे उस गौरव को पुनर्जीवित करना चाहते हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि भीमा कोरेगांव की घटना उनके लिए स्वीकार्य नहीं होगी. यही वजह है कि इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को ‘एंटी-नेशनल’ कह कर प्रचारित भी किया गया. उधर इसकी प्रतिक्रिया में युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने उन्हें ‘नव-पेशवा’ कह कर संबोधित किया, जो फिर से मनुवादी शासन चाहते हैं.

दलित भीमा कोरेगांव की लड़ाई को अंग्रेजों की जीत के रूप में नहीं देखते. यह तो उनके लिए पेशवाओं की हार और उनके अत्याचार के विरुद्ध दलितों के शौर्य और आत्मसम्मान का प्रतीक है.

यह हिंदू वर्ण-व्यवस्था की जटिलता का परिणाम है. वर्ण क्रम में सबसे पददलित जातियां ऊपर के वर्णों से अपनी मुक्ति चाहती हैं. वे समता और न्याय चाहती हैं. सबसे पहले बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था से विद्रोह किया था. आधुनिक समय में ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, बाबासाहेब, पेरियार आदि ने उसे वैचारिक आधार दिया. यह विचारधारा वर्ण-व्यवस्था से पोषित ब्राह्मणवाद का मुखर विरोध करती है.

सवाल यह है कि कथित ऊंची जातियों या शासकों के वर्चस्व के इतिहास को अपना गौरव माना जाये, जिसमें शूद्रों या आम जन के प्रति दासता का व्यवहार है? या, आमजन के विद्रोह को मुक्ति का पैगाम माना जाये, जिन्होंने मनुष्यता की सीमा का विस्तार किया? मानव समाज के इतिहास में ऐसे कई स्वाभाविक सवाल हैं.

रोमन साम्राज्य की महानता का गान हो या स्पार्टाकस की शहादत को मुक्ति का प्रतीक मानें? गोरों की श्रेष्ठता की व्यवस्था को स्वीकार करें, या उसके विरुद्ध संघर्ष करनेवाले अश्वेतों के साथ खड़े हों? ये सभी शासक वर्गों द्वारा खड़ी की गयी जटिलताएं हैं. सत्ता हमेशा जनता को विभाजित करके ही शासन करती है.

वह एक समूह को मनुष्य होने के दर्जे से नीचे रखती है, ताकि उसके श्रम का शोषण वैधानिक हो. हमारा उद्यम यह होना चाहिए कि हम वर्चस्ववादी मूल्यों और विचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए जनवादी समाज का निर्माण करें.

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