अब तीन तलाक की बाजी

Updated at : 11 Jan 2018 8:00 AM (IST)
विज्ञापन
अब तीन तलाक की बाजी

नवीन जोशी वरिष्ठ पत्रकार नोटबंदी का फैसला गंभीर आर्थिक दुष्प्रभावों के बावजूद राजनैतिक रूप से नरेंद्र मोदी यानी भाजपा के पक्ष में रहा. क्या उसी तरह एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को आपराधिक कानून बनाने का मोदी सरकार का फैसला, इस वर्ष के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव में राजनैतिक फायदा पहुंचायेगा? […]

विज्ञापन
नवीन जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
नोटबंदी का फैसला गंभीर आर्थिक दुष्प्रभावों के बावजूद राजनैतिक रूप से नरेंद्र मोदी यानी भाजपा के पक्ष में रहा. क्या उसी तरह एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को आपराधिक कानून बनाने का मोदी सरकार का फैसला, इस वर्ष के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव में राजनैतिक फायदा पहुंचायेगा? मोदी प्रभावशाली वक्तृता से जनता को यह समझाने में सफल रहे कि हजार और पांच सौ रुपये के नोटों का चलन बंद करने का फैसला कालेधन पर रोक लगाने और अमीरों व भ्रष्ट लोगों के खिलाफ बड़ी लड़ाई है. क्या तीन तलाक विरोधी विधेयक के जरिये मोदी सरकार अपने को मुस्लिम महिलाओं का उद्धारक साबित करने में सफल होगी?
कोशिश पुरजोर है, और पहला दौर भाजपा के पक्ष में जाता दिखा है. विपक्ष, खासकर कांग्रेस की गति ‘सांप- छछूंदर केरी’ है, उगलते बने न निगलते. वह प्रकट रूप में विधेयक के समर्थन में दिख रही है, लेकिन इसे उलझाये रख कर भाजपा को मुस्लिम महिलाओं का हितैषी बनने का श्रेय नहीं देना चाहती. लोकसभा में कांग्रेस ने शांत रहकर विधेयक को पारित हो जाने दिया. राज्यसभा में उसने विधेयक के कतिपय प्रावधानों के विरोध में बहस जरूर की, लेकिन अपना स्वर विधेयक-समर्थक ही रखा. भाजपा अब प्रचार कर रही है कि कांग्रेस ने राज्यसभा में विधेयक पारित नहीं होने दिया.
ध्रुवीकरण की राजनीति
धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति का यह चरम दौर है. मुस्लिम महिलाओं या समग्र रूप में देश की महिलाओं की स्थिति की चिंता किसी को नहीं है. सभी दल राजनीति और वोट बैंक को ध्यान में रख कर चाल चल रहे हैं. भाजपा संघ के निर्देशन में हिंदूवादी एजेंडे पर अब आक्रामक रवैया अपनाने लगी है. वह हिंदू समाज को साफ संदेश दे रही है कि कांग्रेस तथा अन्य क्षेत्रीय दलों की तरह मुस्लिम तुष्टीकरण नहीं करनेवाली, बल्कि ‘साहसिक’ फैसले लेकर मुस्लिम महिलाओं को सशक्त बनाना चाहती है. इससे हिंदू वोट बैंक मजबूत होने के साथ ही मुस्लिम महिलाओं का भी समर्थन हासिल हो सकेगा. कांग्रेस समेत अन्य दलों की अब तक की ‘मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति’ की हिंदू-प्रतिक्रिया भाजपा की राजनीति की मजबूत आधार-भूमि बनी है.
विडंबना है कि मुस्लिम महिलाओं क्या, सभी महिलाओं की समानता और सम्मान दांव पर है. तीन तलाक विरोधी विधेयक को ही लें. मुस्लिम महिलाओं को इस जलालत से उबारता दिखने वाला यह विधेयक जितना सख्त आपाराधिक कानून बननेवाला है, वह व्यापक बहस की मांग करता है. कई विद्वानों की विधेयक के प्रावधानों पर राय है कि इसके कानून बन जाने पर यह तलाकशुदा महिलाओं की जिंदगी दूभर ही करेगा. इसकी आड़ में मुस्लिम-उत्पीड़न की संभावना बढ़ जायेगी, वगैरह.
विचार-विमर्श से किनारा
सामान्य परंपरा रही है कि किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के निजी कानूनों में परिवर्तन से पहले उस समुदाय में व्यापक बहस करायी जाये. भाजपा ने ऐसा कुछ नहीं किया. सर्वोच्च न्यायालय के बहुमत वाले निर्णय की अनदेखी कर वह अल्पमत वाले निर्णय को ले उड़ी. पांच में से तीन जजों का फैसला है कि एक बार में तीन तलाक न केवल इस्लाम विरोधी है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 व 15 के अंतर्गत गैर-कानूनी है. इस फैसले के बाद कानून बनाने की जरूरत नहीं थी. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अपने आप में कानून है. भाजपा नेताओं ने अपनी शुरुआती प्रतिक्रिया में कहा भी था कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैर-कानूनी घोषित कर दिया है.
भाजपा ने पैंतरा बदल दिया. उन्हें सुप्रीम कोर्ट के अल्पमत वाले फैसले में अपने राजनैतिक लाभ का सूत्र दिखायी दिया. दो न्यायाधीशों का मत था कि तीन तलाक गैर-कानूनी तो है, लेकिन सरकार को चाहिए कि वह इसके लिए छह मास में एक कानून बनाये. बस, भाजपा सरकार फटाफट विधेयक बना लायी. उसने मुस्लिम विद्वानों, कानूनविदों और समाज के प्रबुद्ध लोगों से सलाह-मशविरा करना भी जरूरी नहीं समझा.
चुनावी मुद्दा बनाया था
याद कीजिए कि उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन तलाक से ‘मुस्लिम बहनों’ का जीवन नारकीय होने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था.
गोरक्षा की आड़ में मुसलमानों की हत्याओं पर चुप लगा जानेवाले मोदी तीन तलाक के मुद्दे पर खूब बोलते थे. यह अचानक नहीं हुआ था. ‘सर्वेक्षण’ कर यह बताया गया कि मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी बुराई तीन तलाक प्रथा है. सर्वेक्षण करनेवालों को मुसलमानों की गरीबी, अशिक्षा और उनका हाशिये पर धकेला जाना नजर नहीं आया. सायरा बानो का मामला अदालत में था ही. बड़ी चतुराई से तीन तलाक को भाजपा ने चुनावी मुद्दा बनाया लिया.
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने कांग्रेस की बहुतेरी कमजोरियों का खूब लाभ उठाया है. वर्ष 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मुस्लिम नेताओं और धर्म-गुरुओं के दबाव में शाहबानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला संसद से पलटवाया न होता, तो आज भाजपा को यह मौका न मिलता. आज मोदी ने सायरा बानो के मामले में कोर्ट के फैसले को अपना बड़ा राजनैतिक हथियार बना लिया है.
मुसलमानों का हर हाल में पक्ष लेती रही कांग्रेस की दिक्कत आज यह है कि मोदी की लोकप्रियता की काट के लिए उसे उदार हिंदुत्व का सहारा चाहिए, तो मुसलमानों का समर्थन भी. यही हाल यूपी में सपा से लेकर बंगाल में ममता बनर्जी तक का है. भाजपा अपने हिंदू आधार को व्यापक बनाते हुए मुसलमानों, खासकर महिलाओं का समर्थन पाने का दांव चल रही है.
राजनीति के इन दांव-पेचों में कई जरूरी मुद्दे भुलाये जा रहे हैं. मीडिया भी इस खेल में आपादमस्तक डूबा है. बाजी तीन तलाक की है. चालें चली जा रही हैं. महिलाओं का वास्तविक हित बहस के केंद्र से बाहर है. तलाक-ए-बिद्दत जुल्म है. वह बंद होना चाहिए, लेकिन क्या प्रस्तावित कानून इसका सही और सर्वोत्तम उपाय है? इसके दुष्परिणाम क्या-क्या हो सकते हैं? राजनीति की बिसात में जरूरी सवाल खो गये हैं.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola