असाधारण चुनावी वर्ष का आगाज

Updated at : 09 Jan 2018 7:14 AM (IST)
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असाधारण चुनावी वर्ष का आगाज

योगेंद्र यादव संयोजक, स्वराज अभियान वर्ष 2018 चुनावी वर्ष होने जा रहा है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस वर्ष विधानसभा चुनावों के दो चक्र होनेवाले हैं, बल्कि वर्ष के अंत तक वक्त से पहले लोकसभा चुनाव भी कराये जा सकते हैं. इस वर्ष का बजट भाषण चुनावी भाषण होगा, आर्थिक सर्वेक्षण तथा सभी आर्थिक आंकड़े […]

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योगेंद्र यादव
संयोजक, स्वराज अभियान
वर्ष 2018 चुनावी वर्ष होने जा रहा है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस वर्ष विधानसभा चुनावों के दो चक्र होनेवाले हैं, बल्कि वर्ष के अंत तक वक्त से पहले लोकसभा चुनाव भी कराये जा सकते हैं. इस वर्ष का बजट भाषण चुनावी भाषण होगा, आर्थिक सर्वेक्षण तथा सभी आर्थिक आंकड़े चुनावी चश्मे से देखे जायेंगे और मॉनसून की फुहारों की माप भी चुनावों पर ही असर डालेंगी. चीन और पाकिस्तान की सीमाओं की घटनाएं भी सत्तापक्ष के काम आयेंगी.
अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी किसके हक में गया, इसकी बजाय इसलिए अहम होगा कि वह चुनावी गणित में कितना हेरफेर कर सकेगा. असम में राष्ट्रीय नागरिकता पंजी से संबद्ध संकट केवल मानवीय त्रासदी के लिए नहीं, बल्कि इसलिए जाना जायेगा कि इस राज्य से बाहर वह कितना चुनावी फायदा पहुंचा सकेगा.
इस वर्ष का चुनावी बुखार कुछ अलग किस्म का है, अंशतः इसलिए कि वर्तमान सत्तापक्ष सामान्यतः हमेशा ही इससे पीड़ित रहता है. उसके लिए कोई भी चीज केवल तभी और उसी हद तक मतलब रखती है, जिस हद तक चुनावी आईने में वह अपना अक्स उभार सकती है. हर छोटे-बड़े चुनावी चक्र में प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत व्यस्तता का यही सबब है.
यह चुनावी वर्ष इसलिए भी असाधारण होने जा रहा है, क्योंकि दांव पर असंभव-सी बड़ी चीजें लगी हैं.यह न सिर्फ मोदी के लिए दूसरे कार्यकाल अथवा भारत के सियासी नक्शे पर भाजपा के मुकम्मल दबदबे की कोशिशों के नतीजे देगा, यह न केवल राहुल अथवा कांग्रेस का भविष्यलेख ही बांच डालेगा, यह न केवल क्षेत्रीय गठबंधनों के युग की समाप्ति अथवा उनका सातत्य तय कर देगा, बल्कि यह भारतीय गणतंत्र का भविष्य भी निर्धारित करेगा. मोदी-काल के आगाज के साथ ही हमारे गणतंत्र की बुनियाद पर अत्यंत प्रतिबद्ध प्रहार प्रारंभ हो गये.
कांग्रेस शासन के दौरान पहले ही सीमित कर दिये गये सभी स्वायत्त संस्थान अब आपातकाल के बाद सर्वाधिक बौने कर दिये गये हैं. मीडिया, खासकर टेलीविजन तो अब शासक दल की विस्तारित भुजाओं जैसी भूमिका में पहुंच गये हैं. विविधता तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के संरक्षण हेतु संवैधानिक प्रतिबद्धता को मजाक बना दिया गया है. इनमें से कुछ क्षतियां तो ऐसी हैं, जिनकी भरपाई भी संभव नहीं हो सकेगी.
इस निजाम के लिए एक और कार्यकाल तो इन तत्वों को हमारी शासन व्यवस्था में बद्धमूल ही कर डालेगा. इस तरह यह वर्ष सिर्फ एक चुनावी दौड़ के मजे लेने का नहीं, वरन भारत के भविष्य को बनते-बिगड़ते हुए देखने का वर्ष भी होगा. इस वर्ष की अधिकतर सियासी अटकलें इन बिंदुओं के गिर्द घूमेंगी कि चुनाव कब होंगे, कैसे गठबंधन बनेंगे और क्या भाजपा के विरुद्ध एक महागठबंधन आकार ले सकेगा? इनकी बजाय हमें इस पर गौर करना चाहिए कि वे वास्तविक मुद्दे क्या हैं, जिन पर यह मुकाबला केंद्रित होगा.
फिलहाल, हमें इतना ही पता है कि यह दौड़ उतनी इकतरफा नहीं है, जितनी यह गुजरात चुनाव के पूर्व नजर आती थी. हम यह कह सकते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में शासक दल की परेशानी गुजरात तक ही सीमित नहीं है.
भाजपा को अन्य विधानसभाओं के चुनावों में गुजरात से भी अधिक मुश्किलें झेलनी होंगी. कांग्रेस कर्नाटक को भी हिमाचल जैसी आसानी से उसे नहीं सौंपेंगी. मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में भाजपा का कोई जनाधार नहीं रहने की वजह से वहां उसकी सफलताएं दूर की कौड़ी ही होंगी. उसे राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में सत्ता विरोध की गुजरात से तीव्रतर भावनाओं का सामना करना होगा.
इसलिए उसके लिए आगे की राह इतनी आसान भी नहीं है. पर परिणाम प्रतिपक्ष की स्थिति पर निर्भर है. यह कहना उचित होगा कि देश को पिछले साढ़े तीन साल में कुछ मामूली किस्म के मोदी-विरोध और संसद में रस्मी शोरगुल के अलावा विपक्ष में कोई सारतत्व नहीं दिखा है.
यह कहना उचित ही होगा कि मुख्य विपक्षी पार्टी अब तक कोई सुसंगत दृष्टि अथवा विश्वसनीय चेहरे को आगे करने में विफल ही रही है. क्या हमें जमीन पर अब भी कोई संजीदा विपक्ष नजर आयेगा या वह एक बार फिर से उन्हीं पुरानी थकी-हारी व्यूह-रचनाओं के सहारे सुर्खियां बटोरने की फिराक में रहेगा? यूपी में सपा-बसपा के, ओड़िशा में कांग्रेस तथा बीजद के, तमिलनाडु में कांग्रेस एवं डीएमके के गठबंधनों के साथ ही बिहार में नीतीश की विपक्ष-वापसी चुनावी समीकरणों में मूलभूत बदलाव ला सकती है.
इस चुनाव में दांव पर सिर्फ प्रधानमंत्री पद ही नहीं, पूरा गणतंत्र ही लगा है. यदि विपक्ष एक विश्वसनीय विकल्प देने में सफल रहता है, तो अपना नुकसान कम करने हेतु मोदी यह चुनाव पहले लाने को बाध्य होंगे, वरना वे अपने पूरे कार्यकाल तक बने रहेंगे. उनमें यह समझने की बुद्धिमत्ता है कि शासन के चार वर्षों के अंत में उनके पास मतदाताओं को, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाने को कुछ भी खास नहीं है.
हालांकि, वे अभी भी अपने किसी प्रतिद्वंद्वी से अधिक लोकप्रिय हैं, पर वे यह जानते हैं कि यह एक भुरभुरी दौलत है. गुजरात चुनाव ने यह बता दिया है कि एक गंभीर चुनौती मिलने पर वे संप्रदायवाद तथा आक्रामक राष्ट्रवाद का सहारा लेंगे.
इसलिए अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदलने के बाद यदि हम कुछ भूले-बिसरे मस्जिद/ मंदिर विवाद को उभरता या कुछ मामूली सीमा विवाद को टेली-युद्ध में बदलता देखें, तो इस पर अचरज नहीं होना चाहिए. ऐसे में विपक्ष उदारवादी/धर्मनिरपेक्ष बातों या जातिगत गठजोड़ से उसका मुकाबला करेगा, जिनका मतदाताओं पर अब कोई विशेष असर पड़ता नहीं दिखता.
अलबत्ता किसान आंदोलन या युवा विरोध मोदी के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर सकते हैं. वर्ष 2017 ने ग्रामीण संकट को किसान आंदोलन में बदलते देखा है. इस साल किसान आंदोलनों की आपसी समन्वय क्षमता कसौटी पर चढ़ेगी.
इस चुनावी वर्ष में अंतिम समीकरण सरल ही है. यह या तो कृषि संकट और युवा अशांति के रूप में सामने आयेगा अथवा सांप्रदायिक अशांति के रूप में. यह जिस दिशा में झुकेगा, उसी से चुनावी नतीजे और आगामी कुछ वक्त के लिए भारत की भवितव्यता तय होगी.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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