इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर

Updated at : 05 Jan 2018 7:13 AM (IST)
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इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर

देश की प्रगति और समृद्धि के लिए विभिन्न स्तरों पर इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार बेहतर करना होता है. इस दिशा में बड़ी पहल करते हुए आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमिटी ने 12 हजार करोड़ से अधिक की लागत की परियोजनाओं को मंजूरी दी है. इसमें जोजीला दर्रे में 14 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण भी शामिल […]

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देश की प्रगति और समृद्धि के लिए विभिन्न स्तरों पर इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार बेहतर करना होता है. इस दिशा में बड़ी पहल करते हुए आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमिटी ने 12 हजार करोड़ से अधिक की लागत की परियोजनाओं को मंजूरी दी है. इसमें जोजीला दर्रे में 14 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण भी शामिल है, जिसके पूरा होने के बाद श्रीनगर, कारगिल और लेह के बीच पूरे साल यातायात संचालित हो सकेगा. अभी इन इलाकों के बीच दिसंबर से अप्रैल के बीच परिवहन ठप रहता है. सीमा और अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक होने के कारण इस सुरंग से सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी. सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती उन अधूरी परियोजनाओं को पूरा करना है, जो विभिन्न स्तरों पर हैं.
इस तरह की देरी से न सिर्फ लागत में इजाफा होता है, बल्कि परियोजना का फायदा भी समय से नहीं मिल पाता. बंदरगाहों से जुड़ी 20 हजार करोड़ की लटकी परियोजनाओं की राह की बाधाएं दूर करने के लिए एक पैनल गठित करना भी स्वागतयोग्य कदम है. सरकारी स्वामित्व के 12 बड़े बंदरगाहों में सरकारी और निजी क्षेत्र के सहयोग से बननेवाली 12 परियोजनाएं रुकी पड़ी हैं. आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाने तथा आयात-निर्यात को बेहतर करने के लिए समुद्री व्यापार को गति देना जरूरी है. इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर इन फैसलों से निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा.
लंबित परियोजनाओं की संख्या बढ़ने के कारण नये निवेशों में बहुत गिरावट आयी है और उसकी दर 13 सालों में सबसे कम है. बीते दिसंबर की तिमाही में भारतीय कंपनियों ने 77 हजार करोड़ लागत की नयी परियोजनाओं की घोषणा की है. पिछले सितंबर की तिमाही में लंबित पड़ी परियोजनाओं की लागत 13.22 खरब तक जा पहुंची है, जो कि कुल जारी परियोजनाओं की लागत का 13 फीसदी से अधिक है.
लागत की यह बढ़त बीते छह तिमाहियों से बदस्तूर जारी है. ऐसे में कैबिनेट कमिटी के दो फैसले बहुत अहम हैं. सरकारी निवेश और दिलचस्पी से निजी क्षेत्र को भी उत्साह मिलेगा. लंबित परियोजनाओं में दो-तिहाई से अधिक निजी क्षेत्र का फंसा हुआ है. देरी के कारणों में भूमि अधिग्रहण, पर्यावरण-संबंधी मंजूरी, ईंधन व कच्चे माल की समस्या तथा धन की कमी मुख्य हैं. इस समस्या का एक सिरा बैंकों के फंसे हुए कर्जों से भी जुड़ता है.
कई कर्जदार ऐसे हैं, जो लंबित परियोजनाओं के कारण नये कर्ज नहीं ले पा रहे हैं और न ही पुराने को चुकाने का उनके पास कोई उपाय है. इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं रोजगार का भी विशेष जरिया होती हैं. सरकार द्वारा मंजूर ताजा परियोजनाएं और निर्णय सड़क और बंदरगाह से संबद्ध हैं तथा अर्थव्यवस्था को आधार देने में यातायात बहुत अहम होता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार और निजी क्षेत्र के मिले-जुले प्रयासों से इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर संजाल खड़ा किया जा सकेगा तथा आर्थिक विकास को गति दी जा सकेगी.
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