नेतृत्व की कला जानते थे जयपाल सिंह मुंडा

Updated at : 03 Jan 2018 8:03 AM (IST)
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नेतृत्व की कला जानते थे जयपाल सिंह मुंडा

अनुज कुमार सिन्हा जयपाल सिंह मुंडा (जन्म 3 जनवरी, 1903) जन्मजात (बाइबर्थ) लीडर थे. बचपन से जानते थे कि कैसे नेतृत्व किया जाता है, कैसे टीम-संगठन तैयार किया जाता है. संत पॉल स्कूल में हॉकी की कप्तानी से लेकर 1928 के आेलिंपिक में चाहे भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी का मामला हाे या फिर आदिवासी […]

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अनुज कुमार सिन्हा
जयपाल सिंह मुंडा (जन्म 3 जनवरी, 1903) जन्मजात (बाइबर्थ) लीडर थे. बचपन से जानते थे कि कैसे नेतृत्व किया जाता है, कैसे टीम-संगठन तैयार किया जाता है. संत पॉल स्कूल में हॉकी की कप्तानी से लेकर 1928 के आेलिंपिक में चाहे भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी का मामला हाे या फिर आदिवासी महासभा, झारखंड पार्टी की बात हाे या संविधान सभा-संसद में आदिवासी हिताें पर बहस की बात हाे, जयपाल सिंह कभी पीछे नहीं रहे.
शानदार वक्ता. शानदार नेतृत्व. हमेशा अपनी छाप छाेड़ी. दूरदर्शी थे आैर जानते थे कि कैसे समाज के सभी वर्गाें के लाेगाें काे साथ लेकर चलना हाेगा. भले ही उन्हें आदिवासी नेता माना जाता था लेकिन जब जरूरत पड़ी, उन्हाेंने इसमें लचीला रूख अपनाया था. उन्हें पता था कि अगर अलग झारखंड राज्य लेना है ताे इसमें आदिवासियाें आैर गैर-आदिवासियाें दाेनाें काे साथ-साथ आना हाेगा. यही कारण था कि उन्हाेंने आदिवासी महासभा का नाम बदल कर झारखंड पार्टी रखा था आैर इसे गैर-आदिवासियाें के लिए खाेल दिया.
भले ही आदिवासी महासभा का नाम 1949-50 में बदला गया था लेकिन इसकी झलक उन्हाेंने 1939 में ही दे दी थी. 20-21 जनवरी, 1939 काे पहली बार रांची में हरमू नदी के किनारे जयपाल सिंह ने सभा की थी जिसमें एक लाख से ज्यादा लाेगाें ने भाग लिया था. दरअसल पहली बार उन्हें आदिवासी महासभा का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया गया था. सभा सफल हुई थी. इसके बाद उन्हाेंने धन्यवाद पत्र जारी किया था. यह एक दूरदर्शी लीडर ही कर सकता है.
जयपाल सिंह ने लिखा था-गैर आदिवासी मित्राें काे भी मैं धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्हाेंने दूर के गांवाें से आये हुए लाेगाें की सुविधा का प्रबंध करने में हर तरह से हमारी सहायता की. पुलिसवालाें ने अपना काम यथाेचित रूप से किया. जमीनदाराें ने हमकाे लकड़ी आैर चावल दिया.
धनिकाें ने लाेगाें काे टिकने के लिए अपने बड़े-बड़े मकानाें काे दिया. हमारे कामाें के लिए गाड़ियां दी गयीं. म्युनिसपालिटी ने पानी आैर राेशनी का प्रबंध किया. हर तरह से हमलाेगाें ने रांची निवासियाें के सभी संप्रदायाें का सहयाेग पाया. ये वाक्य किसी आैर के नहीं, आज के नहीं बल्कि जयपाल सिंह के हैं, जाे उन्हाेंने 1939 में लिखा था. जयपाल सिंह के ये वाक्य संदेश देते हैं कि कैसे झारखंड आंदाेलन में सभी वर्गाें का याेगदान रहा है.
इसमें काेई दाे राय नहीं कि जयपाल सिंह एक बेहतरीन संगठनकर्ता थे. जानते थे कि कैसे संगठन तैयार हाेता है, एक-एक पैसा कैसे जमा किया जाता है ताकि आंदाेलन चल सके. आदिवासी महासभा के अध्यक्ष के नाते बैठक के बाद जयपाल सिंह गाड़ी से खूंटी, मुरहू, चाईबासा हाेते जमशेदपुर गये थे. जमशेदपुर में तीन बड़ी-बड़ी सभाएं हुई थीं.
उन्हें फूलाें की मालाआें से लाद दिया गया था. जयपाल सिंह का क्रेज कितना था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें पहनायी गयी मालाआें काे जब नीलाम किया गया, उससे उन दिनाें 600 रुपये मिले थे. उन दिनाें यह बहुत बड़ी राशि थी जिससे आंदाेलन काे आगे बढ़ाने में मदद मिली थी.
एेसी बात नहीं कि जयपाल सिंह राताे-रात मरांग गाेमके बन गये. इसके लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा आैर उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. कई बार उनकी उपेक्षा की गयी. अॉक्सफाेर्ड में जब थे आैर आइसीएस की तैयारी कर रहे थे ताे भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बना दिया गया. उनकी कप्तानी में पहली बार 1928 आेलिंपिक में भारत चैंपियन बना.
बगैर अनुमति के आइसीएस (प्राेबेजनर) ने हॉकी खेली थी, इसके लिए उन्हें एक साल आैर प्रशिक्षण करने काे कहा गया. जयपाल सिंह काे यह स्वीकार्य नहीं था आैर उन्हाेंने आइसीएस बनना स्वीकार नहीं किया. आेलिंपिक चैंपियन के कप्तान के नाते उनका नाम ताे हर काेई जानता था लेकिन राजेंद्र प्रसाद (जाे बाद में राष्ट्रपति बने) यह नहीं जानते थे कि जयपाल सिंह उन्हीं के राज्य (तब बिहार था) के हैं.
दरअसल भारत लाैटने के बाद वे राजकुमार कॉलेज, रायपुर में कार्यरत थे. वहीं से 11 जून, 1938 काे (तब वे झारखंड आंदाेलन से नहीं जुड़े थे) जयपाल सिंह ने राजेंद्र बाबू काे पत्र लिखा था आैर कहा था कि उन्हें उनके गृहप्रांत में नाैकरी दिलाने में मदद करें. जयपाल सिंह ने यह भी लिखा था कि वे हाल ही में ब्रिटिश वेस्ट अफ्रीका से लाैटे हैं आैर शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं. काेई भी प्रशासनिक पद पर वे काम कर सकते हैं.
इस पत्र के पाने के बाद राजेंद्र बाबू काे पहली बार मालूम हुआ कि जयपाल सिंह उन्हीं के प्रांत यानी बिहार के रहनेवाले हैं. 20 जून , 1938 काे राजेंद्र बाबू ने जयपाल सिंह काे पत्र का जवाब भी भेजा था आैर कहा था कि पत्र पाकर व यह जानकर बहुत खुशी हुई कि आप मेरेे गृह प्रांत के हैं. उन्हाेंने लिखा कि मैं आपकी सेवा लेना चाहता हूं लेकिन समझ नहीं पा रहा हूं कि कैसे आैर कहां आपका उपयाेग किया जाये. अपने बारे में आैर अपने राज्य से आपके संबंध के बारे में आैर बतायें. इसके बाद राजेंद्र बाबू ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री काे पत्र लिख कर उपयुक्त नाैकरी देने के लिए कहा था. इसके बाद ताे दाेनाें में काफी पत्राचार हुआ.
इसके कुछ ही महीनाें बाद यानी जनवरी 1939 में जयपाल सिंह आदिवासी आंदाेलन में पूरे ताैर पर सक्रिय हाे गये. कांग्रेस ने जयपाल सिंह काे कई आश्वासन दिये थे लेकिन पूरा नहीं किया. इससे जयपाल सिंह नाराज थे. 14 मई 1939 काे जयपाल सिंह ने राजेंद्र बाबू काे पत्र लिख कर साफ कर दिया कि उनके कहने के बावजूद बिहार मिनिस्ट्री उनका उपयाेग नहीं कर रही है. एक साल से बार-बार यही कहा जा रहा है कि आपकी (जयपाल सिंह की) सेवा ली जायेगी लेकिन वादा पूरा नहीं किया गया है. उपेक्षित किया जा रहा है.
जयपाल सिंह ने यहां तक लिख दिया कि जब उनके साथ बिहार मिनिस्ट्री ऐसा व्यवहार कर रही है ताे छाेटानागपुर के गरीब आदिवासियाें के साथ उसका क्या रवैया है, यह समझा जा सकता है. इसके बाद जयपाल सिंह पूरे ताैर पर आंदाेलन काे आगे बढ़ाने में जुट गये. देश जब आजाद हाे गया आैर जब चुनाव हुए ताे उन्हीं की पार्टी (झारखंड पार्टी) बिहार में प्रमुख विपक्षी दल के रूप में सामने आयी. जयपाल सिंह द्वारा बनायी गयी बुनियाद ही बाद में झारखंड आंदाेलन काे आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुई. अंतत: झारखंड राज्य बन पाया.
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