किस करवट बैठेगा गुजरात चुनाव

Updated at : 11 Dec 2017 6:44 AM (IST)
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किस करवट बैठेगा गुजरात चुनाव

आशुतोष चतुर्वेदी प्रधान संपादक, प्रभात खबर गुजरात विधानसभा चुनावों पर पूरे देश की निगाहें लगी हुईं हैं. नतीजे किस करवट बैठेंगे, इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस नेताओं की धड़कनें तेज हैं. वैसे तो हर विधानसभा चुनाव हर दल के लिए चुनौती होता है और सभी दल पूरी ताकत लगाकर उसे जीतने की कोशिश भी करते […]

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आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
गुजरात विधानसभा चुनावों पर पूरे देश की निगाहें लगी हुईं हैं. नतीजे किस करवट बैठेंगे, इसे लेकर भाजपा और कांग्रेस नेताओं की धड़कनें तेज हैं. वैसे तो हर विधानसभा चुनाव हर दल के लिए चुनौती होता है और सभी दल पूरी ताकत लगाकर उसे जीतने की कोशिश भी करते हैं. भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने इस चुनाव में अपने अस्त्रागार में से ऐसा कोई अस्त्र बाकी नहीं रखा है, जो न चला हो. मीडिया हर विधानसभा चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल बतायेगा. यह भी सेमीफाइनल है और आगामी 2018 के विधानसभा चुनाव भी सेमीफाइनल बताये जायेंगे. यह जुमला अब पुराना हो गया.
सांप-सीढ़ी के खेल से इसकी तुलना उपयुक्त होगी. बचपन में आपने यह खेल खेला होगा. 2019 से पहले का एक-एक विधानसभा चुनाव आपको लोकसभा चुनाव की ऊपरी सीढ़ी के नजदीक ले जाता है. यदि इस विधानसभा की सीढ़ी पर भाजपा और नरेंद्र मोदी सफलतापूर्वक चढ़ते गये, तो उनके लिए 2019 की लोकसभा की सीढ़ी बहुत आसान हो जायेगी.
गुजरात में असफलता उनकी राह मुश्किल बना देगी. गुजरात का एक और अहम पहलू है कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का घरेलू मामला है. गुजरात की जीत उनकी आन, बान और शान का सवाल है. लेकिन, लोगों की नाराजगी भाजपा पर भारी पड़ रही है. पहले चरण में पाटीदारों के इलाके में भारी मतदान की खबरों ने भाजपा नेताओं के माथे पर शिकन डाल दी है. पाटीदार भाजपा से नाराज चल रहे हैं. उनके नेता हार्दिक पटेल भाजपा के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार में जुटे हैं.
कुछ समय पहले तक भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत के बारे में कोई चर्चा तक नहीं कर रहा था. लेकिन दबी जुबान से ही सही, चर्चाएं शुरू हो गयीं हैं. कांग्रेस के लिए हार कोई नयी बात नहीं है. पार्टी कुछ समय से एक के बाद एक लगातार चुनाव हार रही है.
उनके लिए हार कोई बड़ा झटका नहीं है. लेकिन, जीत बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. यदि जीत हुई तो वह राहुल गांधी को स्थापित कर देगी, क्योंकि अभी तक वे उपहास के पात्र रहे हैं और ऐसा माना जा रहा था कि जनता उन्हें ठुकरा चुकी है. इस बार राहुल एक नये तेवर में नजर आ रहे हैं.
उनके भाषणों में जिन मारक मुद्दों और शब्दों का अभाव दिखता था, इस बार उसमें वह दिखाई दे रहा है. दूसरी ओर भाजपा की हार पार्टी के लिए बड़ा झटका होगी. भाजपा जीतती है, तो प्रधानमंत्री मोदी के विजय अभियान में वह एक और तमगा होगा. भाजपा के लिए चुनाव आन की लड़ाई जैसा है. वह इस राज्य में पिछले 22 साल से सत्ता में है और यहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी रहे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री तक का अपना सफर यहीं से तय किया है.
चुनावी सर्वेक्षणों ने तो धड़कनों को और तेज कर दिया है. हालांकि चुनाव सर्वेक्षण पूरी तरह से सही नहीं होते, वे केवल एक संकेत भर देते हैं. मैं एक चुनावी सर्वेक्षण का जिक्र करना चाहूंगा. एबीपी न्यूज-सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक वोट शेयर में कांग्रेस और भाजपा के बीच मुकाबला बराबरी पर है.
कांग्रेस को 43 प्रतिशत और भाजपा को भी 43 प्रतिशत वोट शेयर मिलने का अनुमान जताया गया है. यह सर्वेक्षण समान वोट शेयर पर भाजपा को बहुमत दिला रहा है, जबकि कांग्रेस उसके आसपास रहेगी. सीएसडीएस के पिछले सर्वे में एक रुख तो स्पष्ट है कि भाजपा का वोट प्रतिशत लगातार गिरता गया है. सीटों की बात करें तो यहां कांग्रेस के लिए एक उम्मीद जगी है. एबीपी न्यूज के अंतिम ओपिनियन पोल में कांग्रेस को 82 और भाजपा को 95 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है. लेकिन, हम सब यह जानते हैं कि ऐसे मतदाता, जो अंतिम समय में तय करते हैं कि उन्हें कहां वोट डालना है, वे नतीजों पर असर डालते हैं.
यह सही है कि भाजपा लंबे अरसे से गुजरात में सत्ता में रही है. संगठन के तौर पर कांग्रेस उससे बहुत कमजोर है. लेकिन, भाजपा से पाटीदार नाराज हैं, किसानों में नाराजगी है और जीएसटी को लेकर एक बड़ा व्यापारी वर्ग भी नाराज है.
लेकिन, देखना होगा कि यह नाराजगी क्या असंतोष में बदली है यानी मतदाता जब यह सोचने लगे कि इन्हें तो हराना है और इस बात की परवाह न करे कि विपक्ष का उम्मीदवार कैसा है. नाराजगी में मतदाता या तो वोट देने नहीं जाता और जाता भी है तो इस बात को कोसते हुए कि विपक्षी उम्मीदवार उपयुक्त नहीं है और वोट उसी पार्टी को डाल देता है. मीडिया की विभिन्न रिपोर्टों पर गौर करें तो गुजरात में कहीं-कहीं नाराजगी असंतोष की हद तक नजर आती है, लेकिन यह व्यापक है, ऐसा प्रमाण नहीं है.
पिछले कई चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विकास के उनके वादे पर लोगों ने वोट किया है. लेकिन, इस बार चुनाव के मुद्दों पर नजर डालें तो शुरुआत विकास के मुद्दे से हुई थी. फिर ‘विकास पगला गया’ और उसके बाद ‘विकास धार्मिक हो गया’. ‘विकास’ जमा नहीं तो इस मुद्दे को ही छोड़ दिया गया और उसकी जगह भावनात्मक मुद्दों ने ले ली.
दिलचस्प है कि विकास के मुद्दे पर भाजपा रक्षात्मक नजर आयी. पहला चरण समाप्त होते होते चुनाव सीडी, आरक्षण, राम मंदिर, तीन तलाक से होता हुआ, मणिशंकर अय्यर के ‘नीच’ और सलमान निजामी तक जा पहुंचा. गुजरात के चुनाव में इस बार बहुत दिलचस्प बातें देखने को आयीं. कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों से दूरी बनाते हुए नरम हिंदुत्व की राह पकड़ी और राहुल गांधी हर छोटे-बड़े मंदिर में मत्था टेकते नजर आये, जबकि यह भाजपा का कार्यक्षेत्र रहा है. कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों की तरफदारी करने का आरोप लगता रहा है.
लेकिन, कांग्रेस ने इस बार उनसे दूरी बनाये रखी, जिसके कारण भाजपा को उसे इस मुद्दे पर घेरने का मौका ही नहीं मिला. दिलचस्प है कि इन चुनावों में मुस्लिम वोट बैंक कोई मुद्दा नहीं है. उनकी कोई बात नहीं कर रहा. लेकिन, 182 सीटों में से 21 पर इस समुदाय का प्रभाव है. सोशल मीडिया में भाजपा का पलड़ा हमेशा भारी रहता था, पर इस बार ऐसा नहीं दिख रहा है. कांग्रेस भी सोशल मीडिया में उतनी ही सक्रिय है. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल की जनसभाओं में उमड़ी भीड़ ने भी भाजपा को चिंतित किया है. समय-समय पर उनकी सीडी भी आती रही, लेकिन लगता नहीं कि उसने चुनाव को बहुत प्रभावित किया.
हालांकि वे इस पूरे चुनाव में चर्चा का केंद्र रहे. कांग्रेस ने आरक्षण, किसानों की नाराजगी, जीएसटी और नोटबंदी के मुद्दे उठाने की कोशिश की, वहीं भाजपा मुद्दों के अलावा अपने मजबूत संगठन के जरिये बूथ लेवल पर काम कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह प्रदेश में सक्रिय हैं. सघन प्रचार और ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में जा सकता है.
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