इलाज या ठगी!

Updated at : 04 Dec 2017 6:18 AM (IST)
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इलाज या ठगी!

बेंगलुरु में चिकित्सा जांच के कुछ केंद्रों पर आयकर विभाग की छापेमारी में करोड़ों की संपत्ति मिली है और ऐसे दस्तावेज बरामद हुए हैं, जो बताते हैं कि चिकित्सकों और जांच केंद्रों की मिलीभगत से मरीजों को लूटा जा रहा है. पूरे देश में इलाज के नाम पर ठगी का यह कारोबार चल रहा है. […]

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बेंगलुरु में चिकित्सा जांच के कुछ केंद्रों पर आयकर विभाग की छापेमारी में करोड़ों की संपत्ति मिली है और ऐसे दस्तावेज बरामद हुए हैं, जो बताते हैं कि चिकित्सकों और जांच केंद्रों की मिलीभगत से मरीजों को लूटा जा रहा है. पूरे देश में इलाज के नाम पर ठगी का यह कारोबार चल रहा है. सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी और संसाधनों के अभाव में मरीजों को मजबूरन निजी डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है.
रोगी चिकित्सक पर निर्भर होता है और उसे यह भरोसा रहता है कि डॉक्टर रोग का समुचित उपचार कर सकेंगे. कभी ऐसी भी मान्यता थी कि चिकित्सक इस धरती पर ईश्वर का अवतार होता है और उसकी वजह से हमें नया जीवन मिलता है, पर यह बहुत दुखद है कि इलाज करने का काम धीरे-धीरे सेवा से येन-केन प्रकारेण धन कमाने के कारोबार में बदलता चला गया. रोग को ठीक से समझने के बहाने डॉक्टर अनाप-शनाप जांच लिख देते हैं और मरीज को जांच केंद्रों पर भारी-भरकम पैसे खर्च कर रिपोर्ट लेनी पड़ती है. इस कमाई का एक बड़ा हिस्सा डॉक्टरों की जेब में जाता है.
बेंगलुरु के छापे से पता चला है कि जांच की रकम से 20 से 40 फीसदी तक कमीशन डॉक्टरों को मिलता है. इस अवैध और अनैतिक लेन-देन को छुपाने के लिए दी गयी धन-राशि को ‘मार्केटिंग’ और ‘प्रोफेशनल फीस’ के रूप में दिखाया जाता है. इस कारोबार के ताने-बाने का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि जिन सात जांच केंद्रों पर छापेमारी हुई है, उनमें से हर केंद्र ने डॉक्टरों की सलाह पर हुई जांच से सौ करोड़ से अधिक कमाया है. एक केंद्र ने तो दो सौ करोड़ की आमदनी की है.
बीते दिनों कुछ बड़े निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों से लाखों रुपये वसूलने की खबरें आयीं. केंद्र और राज्यों की सरकारों को निजी स्वास्थ्य सेवाओं के नियमन और निगरानी की दुरुस्त व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि मरीजों को फर्जी जांच, दवाओं और सामान के नाम पर लूटे जाने से बचाया जा सके. जब कोई व्यक्ति चिकित्सक होने की अर्हता प्राप्त करता है, तो उसे एक शपथ लेनी होती है कि वह अपने कौशल का नैतिक उपयोग करेगा और रोगी का उपचार उसकी प्राथमिकता होगी.
लेकिन, अफसोस की बात है कि आज डॉक्टर या अस्पताल होने का मतलब रोगी का आर्थिक शोषण करना भर रह गया है. इस कमाई के लालच का ही यह नतीजा है कि लोग डोनेशन के नाम पर लाखों रुपये की रिश्वत देकर अपने बच्चों का दाखिला मेडिकल कॉलेजों में कराते हैं.
बेंगलुरु के मामले ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि हमारे देश की चिकित्सा व्यवस्था कई स्तरों पर बिगड़ी हुई है और उसे बेहतर बनाने की जरूरत है, अन्यथा मरीज डॉक्टरों के झांसे में आकर दोहन का शिकार होते रहेंगे.
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