मोबाइली वादों की मौज

Updated at : 04 Dec 2017 6:18 AM (IST)
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मोबाइली वादों की मौज

आलोक पुराणिक व्यंग्यकार दोपहर के ठीक बारह बजे उस फोन की बुकिंग शुरू हो जायेगी, वह इश्तिहार बता रहा है. बुकिंग करायें, जीवन सफल बनायें.टोन कुछ इस तरह का है कि फलां शुभ मुहूर्त में गंगा-स्नान शुरू हो जायेगा. जो मुहूर्त से चूक जायेगा, उसे पुण्य की प्राप्ति ना होगी. तो आयें बुक करायें, जीवन […]

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आलोक पुराणिक
व्यंग्यकार
दोपहर के ठीक बारह बजे उस फोन की बुकिंग शुरू हो जायेगी, वह इश्तिहार बता रहा है. बुकिंग करायें, जीवन सफल बनायें.टोन कुछ इस तरह का है कि फलां शुभ मुहूर्त में गंगा-स्नान शुरू हो जायेगा. जो मुहूर्त से चूक जायेगा, उसे पुण्य की प्राप्ति ना होगी. तो आयें बुक करायें, जीवन सफल बनायें.मोबाइल की बुकिंग विकट के खेल हैं.
लोग राजनीति के प्रति सदाशयता न दिखाते, नेताओं के भाषण याद रखते हैं, वादे याद रखते हैं. मोबाइल वालों के वादे भूल जाते हैं. कुछ समय पहले आया था कि एक मोबाइली इश्तिहार कि 251 रुपये में बुक कराओ मोबाइल फोन. अब लोग भूल गये इस वादे को. नेता को पकड़ लेते हैं कि वादे किये थे कि इतने मकान बनाओगे, इतने रोजगार दोगे, तो दो रोजगार, दो मकान.
मोबाइली वादे करना भी एक विकट धांसू रोजगार है. जो इसे ठीक-ठाक कर ले, उसकी मौज रहती है.कई नेता हैं, जो अपने क्षेत्र में वादे करते हैं, जब उनके बारे में जवाब-तलब होने लगे, तो वो क्षेत्र ही बदल लेते हैं. आगरा वाले तलाशते हैं उन्हें, तो वो गाजियाबाद में नये वादे कर रहे होते हैं. मुरादाबाद वाले तलाशते हैं उन्हें, तो वो टोंक में नये वादे कर रहे होते हैं. नेता मोबाइल हो जाता है.
मोबाइली वादों से रोजगार मिलता ही नहीं, पक्का भी रहता है. एक मोबाइल ने घोषणा की कि आज रात बारह बजे से अलां मोबाइल फलां स्टोरों पर मिलना शुरू हो जायेगा.
लाइन लग लेती है. मुहूर्त छूट न जाये. गरीब देशों में लाइन लगती है सस्ते गेहूं के लिए, अमीर देशों में लाइन लगती है महंगे मोबाइलों के लिए. विकास की परिभाषा यही है कि जिस देश में लाख के मोबाइल के लिए लाइन लगने लगे, समझ लेना चाहिए कि विकास मच गया है.
बुरी तरह, फुल जोरदारी से मच गया है. और अगर सस्ते गेहूं की लाइन और महंगे मोबाइल की लाइन एक जैसी ही लंबी हों, तो समझ लेना चाहिए कि मुल्क एक तरफ तो मंगलयान युग में दाखिल हो लिया है, पर दूसरी तरफ आदिमानव युग ही चल रहा है. दरअसल, यही चल भी रहा है. आदिमानव से भौंचक्के होकर कई लोग लाख के मोबाइल को देखते हैं. एक साथ आदिमानव युग और मंगलयान युग चले, तो इसे अनेकता में एकता भी कहा जा सकता है.
खैर, लाख रुपये का फोन लाइन में लगकर हासिल करने के बाद कोई बंदा दूसरे को दिखाये और बदले में वह बंदा उसे ठीक वही मोबाइल दिखाकर बताया जाये कि अमेरिका से मैंने मंगा लिया, दोस्त आ रहा था, तो समझना चाहिए कि विकास ग्लोबल हो गया है. ग्लोबल माहौल में किसी का लोकल स्टेटस सुरक्षित नहीं है.
तो विकास इतना ग्लोबल हो गया कि अब लाख के मोबाइल से स्टेटस मिलना पक्का नहीं है. अब मोबाइली स्टेटस इंपोर्ट होता है सीधे यूएस से. जैसे मोबाइली नेता इंपोर्ट हो जाते हैं, मुरादाबाद से टोंक तक.
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