मर्केल फिर बनीं चांसलर, धुर दक्षिणपंथ की वापसी

Updated at : 27 Sep 2017 6:29 AM (IST)
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मर्केल फिर बनीं चांसलर, धुर दक्षिणपंथ की वापसी

जर्मनी के चुनाव नतीजों ने फिर इस सच को रेखांकित किया है कि वैश्विक संकट के मौजूदा दौर में धुर राष्ट्रवाद की चुनौती बनी हुई है. हालांकि, चांसलर मर्केल की सत्ता कायम है, पर उन्हें पिछले चुनाव से कम सीटें हासिल हुई हैं और नये सिरे से गठबंधन बनाने की कवायद करनी पड़ रही है. […]

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जर्मनी के चुनाव नतीजों ने फिर इस सच को रेखांकित किया है कि वैश्विक संकट के मौजूदा दौर में धुर राष्ट्रवाद की चुनौती बनी हुई है. हालांकि, चांसलर मर्केल की सत्ता कायम है, पर उन्हें पिछले चुनाव से कम सीटें हासिल हुई हैं और नये सिरे से गठबंधन बनाने की कवायद करनी पड़ रही है. चुनाव परिणाम के विश्लेषण के साथ आज का इन-डेप्थ…
पुष्परंजन
ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक
आंगेला मर्केल की राह आसान नहीं
इस समय जर्मनी में चांसलर आंगेला मर्केल की चौथी बार जीत से अधिक दक्षिणपंथी एएफडी (अल्टरनेटिव फ्यूर डॉयचलांड) का संसद में जाना महत्वपूर्ण हो गया है. इस्लाम और शरणार्थी विराेधी इस पार्टी को 2013 के संसदीय चुनाव में 4.7 प्रतिशत मत मिले थे. इतने मत से एएफडी को जर्मन संसद ‘बुंडेस्टाग’ में जाने का रास्ता नहीं मिल पाया था. मगर, इस बार मतदाताओं ने 13.3 फीसद वोट देकर ‘एएफडी’ को न सिर्फ संसद में जाने का गेट पास दे दिया, बल्कि सदन में इसकी हैसियत तीसरी सबसे बड़ी पार्टी की बतायी जा रही है.
एएफडी की जीत
दक्षिणपंथियों की इस जीत से शरणार्थी समर्थकों में दहशत है. ‘एएफडी’ के शैदाइयों ने शानदार प्रदर्शन के लिए बधाइयों की बौछार कर दी है. फ्रांस की उग्र दक्षिणपंथी नेता मारीन ल पेन ने ट्वीट किया, ‘यह यूरोपीय देशों की जागृति का प्रतीक है.’
दिलचस्प है कि शरणार्थी समर्थक और खासकर मुसलमान जितना दक्षिणपंथियों के आने से सहमे हुए हैं, उतना ही यहूदियों को लगता है कि नव-नाजीवादी दस्ते अब यूरोप भर में सक्रिय हो जायेंगे. यहूदी और मुसलमान, दो विपरीत ध्रुवों के लोग कूटनीति के केंद्र में आ चुकी दक्षिणपंथी पार्टी से इतना सहम सकते हैं, यह इस चुनाव परिणाम का सबसे रोचक पहलू है. ऐसा लगता है कि ‘एएफडी’ जर्मन संसद में लाखों की संख्या में आये शरणार्थियों के मामले को गरम रखेगी.
मुख्य दलों की स्थिति
जर्मन संसद ‘बुंडेस्टाग’ के वास्ते मर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) और उसकी गठबंधन साथी क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) को 246 सांसदों के साथ 34.7 प्रतिशत वोट मिले हैं. साल 2013 के चुनाव के बाद बने गठबंधन में जूनियर पार्टनर रही सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) को 21.6 फीसद मत मिले हैं.
अब एसपीडी ने फैसला कर लिया कि वह विपक्ष में बैठेगी. उसकी वजह एसपीडी की कमान थामे मार्टिन शुल्त्स हैं. यूरोपीय संसद के अध्यक्ष रह चुके शुल्त्स इतने ‘ओवरकांफिडेंस’ थे कि उन्होंने ऐलान कर दिया था कि इस बार चांसलर नहीं बना, तो ‘लीडर आॅफ द पार्टी’ भी नहीं रहूंगा.
इस बार ‘एसपीडी’ जैसी ऐतिहासिक पार्टी, मार्टिन शुल्त्स के नेतृत्व में नहीं उभर पायी. 1999 से 2004 तक गेरहार्ड श्रोएडर जब चांसलर थे, एसपीडी के अच्छे दिन थे.
साल 1875 में ‘एसपीडी’ एक मार्क्सवादी पार्टी के रूप में जर्मन राजनीति में नुमाया हुई थी. वर्ष 1925 में ‘हाइडेलबर्ग प्रोग्राम’ के बाद इस पार्टी के नेताओं ने लगातार वैचारिक बदलाव किये. ‘सोशल डेमोक्रेसी’ में पूंजीवाद, प्राइवेट ओनरशिप, मार्केट इकोनाॅमी का प्रवेश करते-कराते मार्क्सवाद की वैचारिक हवा इस पार्टी के पहियों से निकाल दी गयी. फिलवक्त, संसद में मार्टिन शुल्त्स के विकल्प की तलाश आरंभ है, क्योंकि जिस तरह से वे अपना वचन हार गये, पार्टी की ओर से नेता सदन होने का नैतिक अधिकार भी खो चुके हैं.
प्रमुख पार्टियों के साथ न आने के कारण
मगर, सत्ता की मलाई खाने के बदले एसपीडी ने विपक्ष में रहने का दांव क्यों खेला? उसकी कई सारी वजहें समझ में आती हैं. पहली वजह तो ये कि आंगेला मर्केल और मार्टिन शुल्त्स के बीच चुनावी बयानों के कारण छत्तीस के आंकड़े बन चुके थे.
ऐसे रिश्ते सदन में और सदन से बाहर मंत्रालय के स्तर पर सहज नहीं रह जाते. दूसरी, सबसे बड़ी वजह दक्षिणपंथी एएफडी को संसद में प्रमुख विपक्षी पार्टी होने देने से रोकना भी हो सकती है. ‘एसपीडी’ यदि गठबंधन में होती, तो दक्षिणपंथी ‘एएफडी’, प्रमुख विपक्षी की भूमिका में आ जाती. एसपीडी के 153 सांसद जीते हैं, और एएफडी के 94. अब चूंकि एएफडी को 13.3 फीसद वोट मिले हैं, और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) को 21.6 फीसद वोट मिले हैं, इसलिए सदन में एसपीडी प्रमुख विपक्षी के रूप में उभरेगी.
जर्मन राजनीति में उभरता एक और महिला चेहरा
पिछले दिनों एक बहस यह भी चली थी कि जर्मन राजनीति में महिलाओं की सहभागिता सिकुड़ती जा रही है. मगर, ऐसा कहते समय टीकाकार एएफडी की नेता फ्राउक पेट्रे को भूल जाते हैं. फ्राउक पेट्रे 4 जुलाई, 2015 को राजनीति की मुख्य धारा में आयीं, और देखते-देखते यूरोप की राजनीति में छा गयीं.
कम लोगों ने सोचा था कि जर्मनी के द्रेसदेन की रहने वाली फ्राउक पेट्रे उग्र दक्षिणपंथी सोच को इतनी जल्दी विस्तार देंगी और इस्राइल तक के लिए चिंता का सबब बन जायेंगी. फ्राउक पेट्रे की वजह से ‘निओ नाजी ग्रुप’ को खाद-पानी मिलने लगा है. पेट्रे को चाहने वाले अभी से कयास लगा रहे हैं कि मर्केल इस बार दो साल भी गठबंधन नहीं चला पायेंगी, और मध्यावधि चुनाव होंगे.
इन तमाम खुशफहमियों के बीच फ्राउक पेट्रे में ‘चांसलर मेटेरियल’ ढूंढा जा रहा है. अगर ऐसी बात है, तो जर्मन राजनीति में महिलाएं कहां से विलुप्त हो रही हैं?
यह अलग विषय है कि फ्राउक पेट्रे ने पहले प्रेस कांफ्रेस में बम फोड़ दिया कि संसद में वह पार्टी का नेतृत्व नहीं करेंगी, बल्कि अपने चुनावी क्षेत्र सैक्सनी की आवाज सदन में बुलंद करती रहेंगी. पेट्रे ने यह घोषणा कर सबको हैरान कर दिया था. इसके पीछे क्या रणनीति हो सकती है? इस पर कयास लगने शुरू हैं.
मर्केल के भविष्य पर संकट
वोट प्रतिशत की दृष्टि से देखें, तो इस चुनाव परिणाम से सत्ताधारी सीडीयू-सीएसयू को 8.7 प्रतिशत का, और एसपीडी को पांच प्रतिशत मतों का नुकसान हुआ है. आंगेला मर्केल भले ही चौथी बार चांसलर बन जायें, मगर पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व के ‘पुअर परफाॅरमेंस’ पर सवाल उठेंगे ही.
संभव है, ‘सीडीयू’ आगे की रणनीति के वास्ते वैसे चेहरे की तलाश शुरू करे, जिसमें मर्केल से बड़ी लकीर खींच पाने की काबिलियत हो. मर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) और उसकी गठबंधन साथी क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू) को 246 सीटें इस चुनाव में हासिल हुई हैं.
630 सदस्यीय जर्मन संसद ‘बुंडेस्टाग’ में यह संख्या सरकार बनाने के वास्ते काफी नहीं है. पिछली सरकार में पार्टनर एसपीडी के 153 सांसद यदि एक बार फिर गठबंधन में शामिल हो जाते, तो सरकार बनाने में मर्केल को कोई मुश्किल नहीं होती.
मर्केल को अब एफडीपी के 80 सांसदों और ग्रीन के 67 सांसदों को मिलकर गठबंधन चलाने का विकल्प दिख रहा है. जर्मनी में इसे ‘जमैका गठबंधन’ कहते हैं. जमैका के राष्ट्रीय ध्वज का रंग हरा, पीला और काला है. काला रंग सत्ताधारी सीडीयू-सीएसयू गठबंधन का प्रतीक है, हरा ग्रीन पार्टी के लिए, और पीला रंग उदारवादी एफडीपी (फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी) के लिए है.
यों, अक्तूबर, 2009 में जर्मनी के छोटे से प्रांत जारलैंड में जमैका गठबंधन बना था, जो जनवरी, 2012 आते-आते बिखर गया. वजह, एफडीपी के अंदरूनी झगड़े थे. इसी साल गर्मियों में जर्मनी का एक और प्रांत श्लैषविष होलस्टाइन में जमैका गठबंधन की सरकार बनी है. फिलहाल तो यह चल रही है. मगर, पहली बार राष्ट्रीय स्तर जमैका गठजोड़ का प्रयास मर्केल कर रही हैं. उसके टिकाऊ रहने पर सवाल होते रहेंगे.
मुख्य बात चांसलर मर्केल की इस चौथी पारी पर आकर टिक जाती है. ट्रंप विरोधी अक्स के कारण मर्केल पूरे यूरोप में दमदार नेता मानी जाती थीं. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों से मर्केल के तार इतने मिले कि यूरोपीय संघ में फ्रांको-जर्मन धुरी बना डाली. अब क्या यह धुरी कमजोर पड़ जायेगी?
भारत के लिए दुविधा?
भारत को जर्मन चुनाव से क्या सबक लेना चाहिए? क्या भारत की दक्षिणपंथी राजनीति में एएफडी (अल्टरनेटिव फ्यूर डाॅयचलांड) की जीत से उत्साह का संचार होता है? ऐसे कुछेक सवाल हैं.
भारतीय नेतृत्व के लिए यह पसोपेश की स्थिति है. जर्मन दक्षिणपंथियों की विजय पर उल्लास मनाते हैं, तो अरियल शेरोन को बुरा लग सकता है. मगर, फिर रोहिंग्या पर जो लाइन सरकार ने ली है, वह जर्मनी दक्षिणपंथियों और फ्रांस की नेता मारीन ल पेन को पसंद आती है. कूटनीति का यह अजीब सा घालमेल है!
जर्मन संसद में 1950 के दशक के बाद सात पार्टियां पहली बार प्रवेश कर रही हैं. वोटों के हिसाब से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के नियम को कायम रखने के कारण इस बार संसद में कुल 709 सदस्य होंगे. इससे पहले 1994 में सर्वाधिक 672 सदस्य संसद में थे. वर्ष 1994 में पहली संसद में 482 सीटें थीं.
इस बार सीटों का दलगत बंटवारा
लेफ्ट 69
ग्रीन67
एसपीडी 153
एफडीपी 80
एएफडी 94
सीडीयू/सीएसयू 246
यूरोप और शेष विश्व के लिए मायने
– डेनिएल वोकर, राजनयिक, स्विट्जरलैंड
ब्रे क्जिट और डोनाल्ड ट्रंप के बाद राष्ट्रवादी अनुदारवाद से लड़ने की जिम्मेदारी अब जर्मनी के पास आयी है. यह उम्मीद करना कि ‘संत आंगेला’ अकेले यह कर लेंगी, हकीकत से परे था. जर्मनी अभी महाशक्ति बनने से बहुत दूर है और ऐसा सिर्फ उसके आकार या आबादी के कारण ही नहीं, बल्कि उसकी चाह के कारण भी है. अगर कोई पश्चिमी दुनिया की ओर से झंडा बुलंद कर सकता है, तो वह यूरोपीय संघ ही है. पश्चिमी दुनिया में अभी भी अप्रवासन समस्या से अधिक एक वादा है, वहां सीमा सुरक्षा के समान ही मानवीय सिद्धांतों को तरजीह दी जाती है, और वहां धरती के बिगड़ते स्वास्थ्य का मुद्दा बहुत प्रमुख है.
पोलैंड और हंगरी के अनुदारवादी सरकारों जैसे अवरोध के बावजूद यूरोपीय संघ के पास चुनौती का सामना करने का शानदार अवसर है. पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत भी दिख रहे हैं. यहां तक कि यूनान में भी निवेशकों का भरोसा बढ़ा है.
जर्मन चुनाव के विश्लेषण से पता चलता है कि धुर दक्षिणपंथी एएफडी को गरीबों ने नहीं, बल्कि उन लोगों का वोट अधिक मिला है, जो आप्रवासियों के आने और देश के भविष्य पर उनके असर को लेकर बहुत डरे हुए हैं. यह भी ध्यान में रखना होगा कि इस पार्टी को सबसे ज्यादा वोट पूर्वी जर्मनी के हिस्से से मिले हैं. इससे पता चलता है कि एकाधिकारवादी शासन के दौर में नष्ट सिविल सोसाइटी को फिर से उठ खड़ा होने में काफी वक्त लगता है.
आनेवाले दिनों में जब भी यूरोपीय संघ एकता के साथ पश्चिमी विश्व का नेतृत्व करने के लिए उठ खड़ा होगा, तो शेष विश्व से भी उसे सहयोग की आवश्यकता होगी, खासकर अमेरिका में ट्रंप के बने रहने तक. यह कहना कि इक्कीसवीं सदी का निरंतर ‘पूर्वीकरण’ होता जायेगा, निःसंदेह सही है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि पश्चिमी लोकतंत्रों को कई मोर्चों पर नयी वैश्विक जिम्मेदारियां उठानी होंगी.
इनमें प्रमुख हैं- सीमाओं की सुरक्षा के साथ सीरियाई शरणार्थियों के हिस्से को स्वीकार करना, यह उदाहरण स्थापित करना कि अमेरिकी उपस्थिति और चीनी आक्रामकता के साथ संतुलन बनाया जा सकता है, और यह भी दिखाना कि अमेरिका के बिना ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप समझौते को यूरोपीय संघ के साथ न सिर्फ जोड़ा जा सकता है, बल्कि यह आर्थिक के साथ एक त्वरित राजनीतिक आवश्यकता भी है.
(द इंटरप्रेटर में छपे लेख का संपादित-अनुदित हिस्सा. साभार)
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