वंशवाद लोकतंत्र के लिए घातक

Updated at : 14 Sep 2017 6:36 AM (IST)
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वंशवाद लोकतंत्र के लिए घातक

नीरजा चौधरी वरिष्ठ पत्रकार राहुल गांधी का यह कहना कि भारत में सभी पार्टियों में परिवारवाद है, सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं है. यह बयान उनकी अगंभीरता को ही दर्शाता है.क्योंकि, भारतीय राजनीति में जिस तरह से परिवारवाद जड़ें जमाये हुए है, उसके मद्देनजर ऐसी बात कहने का अर्थ है कि यह आपके लिए कोई […]

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नीरजा चौधरी

वरिष्ठ पत्रकार
राहुल गांधी का यह कहना कि भारत में सभी पार्टियों में परिवारवाद है, सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं है. यह बयान उनकी अगंभीरता को ही दर्शाता है.क्योंकि, भारतीय राजनीति में जिस तरह से परिवारवाद जड़ें जमाये हुए है, उसके मद्देनजर ऐसी बात कहने का अर्थ है कि यह आपके लिए कोई गंभीर बात नहीं है. राहुल का ऐसा कहना कांग्रेस पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है. राहुल की अगंभीरता यह भी है कि वे अक्सर छुट्टियां मनाने विदेश चले जाते हैं. देश में कई गंभीर मुद्दों पर बहस चल रही होती है, उस वक्त तो वे कुछ नहीं कहते, लेकिन ऐसे वक्त में गलतबयानी कर बैठते हैं, जब उसकी कोई जरूरत नहीं होती.
चूंकि कांग्रेस एक बड़ी और पुरानी पार्टी है और राहुल उसके उपाध्यक्ष हैं, इसलिए भी उनसे लोग यह उम्मीद लगाये रहते हैं कि वे कोई महत्वपूर्ण बात कहेंगे. लेकिन, राहुल इस स्थिति को नहीं समझ पाते और इसलिए उनका बयान मीडिया में चर्चा का विषय बन जाता है.
किसी भी लोकतंत्र में यह बहुत ही विचित्र ही नहीं, बल्कि गलत बात है कि कुछ ही परिवार मिलकर देश की राजनीति की दशा-दिशा तय करें या फिर वे ही सत्ता में बैठकर देश की दशा-दिशा को प्रभावित करें. यह इसलिए भी गलत बात है, क्योंकि परिवारवाद में योग्यता मायने नहीं रखती, परिवार का सदस्य होना मायने रखता है. इसका नुकसान यह होता है कि हमारी जनता को एक अयोग्य नेतृत्व मिलता है, जो अक्सर जनतांत्रिक नीतियों को बनाने के ऐतबार से बहुत कमजोर साबित होता है.
हालांकि, हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है कि बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से होते हुए भी कई शीर्ष राजनीतिक पदों पर लोग आते रहे हैं, चाहे वह राष्ट्रपति हों या फिर कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री. मायावती का उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना बहुत बड़ी बात थी, तो कलाम का राष्ट्रपति बनना उससे भी बड़ी बात थी.
ऐसा नहीं है कि राजनीति के प्रति राहुल गांधी ईमानदार नहीं हैं या वे कुछ करना नहीं चाहते हैं. अपनी ईमानदार राजनीति से वे बहुत कुछ करना चाहते हैं, लेकिन वे अपनी अगंभीर छवि के शिकार हैं. दरअसल, उनकी छवि ऐसी बन गयी है कि वे गंभीर राजनीति का परिचय नहीं देते हैं और इसीलिए ऐसे बयान देते रहते हैं.
हम सभी जानते हैं कि देश में करीब सभी पार्टियां परिवारवाद पर ही चल रही हैं. लेकिन, सवाल इसलिए राहुल गांधी से किया जाता है, क्योंकि वे एक पुरानी पार्टी के उपाध्यक्ष हैं और कांग्रेस पार्टी के महत्वपूर्ण फैसलों में राहुल का महत्वपूर्ण योगदान होता है. उनकी पार्टी विपक्ष की भूमिका में भी है.
इसलिए अगर राहुल से इस संबंध में सवाल किया गया, तो उन्हें लोकतंत्र में यकीन दिलानेवाला बयान देना चाहिए था, न कि परिवारवाद के बचाव में जवाब देना चाहिए था. राहुल गांधी से यह सवाल इसलिए भी किया गया है, क्योंकि केंद्र की सत्ता में कांग्रेस ही अरसे से बैठी रही है. हालांकि, अब यह स्थिति बदली है, लेकिन पार्टी के स्तर पर अब भी सोनिया गांधी के बाद राहुल को ही कांग्रेस की कमान सौंपने की बातें होती रही हैं, या फिर प्रियंका गांधी लाओ कांग्रेस बचाओ की बात होती रही है.
पिछले दिनों पटना के गांधी मैदान में लालू यादव ने एक बड़ी रैली की. उसमें मंच पर लालू के ही परिवार के सदस्य बैठे हुए थे.यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि राष्ट्रीय जनता दल में क्या कोई ऐसा नेता नहीं था, जो लालू के परिवार का न हो और फिर भी उस मंच पर लालू के बगल में बैठा नजर आये? पहली कतार में राजद के नेता नहीं थे, बल्कि लालू के परिवार के ही लोग थे. लालू खुद भी अपनी पार्टी के ऐसे नेताओं को मंच पर अपने साथ बिठा सकते थे, जो उनके परिवार के सदस्य नहीं हों. यह परिवारवाद ही है, जिसके चलते साल 2014 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के ही पांच पारिवारिक सदस्य सांसद बन पाये थे.
क्या उन पारिवारिक सदस्यों के अलावा पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं था, जिसे जनता चुनकर संसद में भेजती? दरअसल, यही वह प्रभाव है, जो जनता पर पड़ता है. वोट तो आम जनता को ही देना होता है, लेकिन जीत अगर एक परिवार के पांच सदस्यों की ही हो रही है, तो इसका अर्थ यही है कि आम जनता भी एक परिवार को ही अहमियत दी है, भले ही वे किसी प्रभाव में आकर ऐसा किये हों. यह परिवारवाद हमारी चुनावी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है.
पंजाब में बादल परिवार, कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला परिवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह परिवार, बिहार में लालू यादव परिवार, हरियाणा में हुडा परिवार, राजस्थान में सिंधिया परिवार, महाराष्ट्र में बाल ठाकरे परिवार, शरद पवार परिवार, दक्षिण के राज्यों में भी कुछ परिवार, यानि क्षेत्रीय पार्टियांे पर परिवारवाद हावी है.
अभी दो लोग इससे बचे हुए हैं- ममता बनर्जी और मायावती. लेकिन, अब इनके पारिवारिक सदस्यों के भी राजनीति की कमान संभालने की खबरें आ रही हैं और अगर ऐसा हुआ, तो फिर यह कहना मुश्किल होगा कि देश में एक भी पार्टी ऐसी नहीं, जहां परिवारवाद न हो.
हालांकि, केंद्र की सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी अभी तक इससे दूर है, लेकिन कुछ राज्यों में भाजपा नेताओं के बेटों के राजनीति में आने के बाद से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्षेत्रीय स्तर पर इसमें भी परिवारवाद आ जायेगा. अगर कोई अच्छा काम कर रहा है, तो उसे उसका राजनीतिक फायदा मिलना समझ में आता है, लेकिन अगर कोई किसी परिवार का सदस्य होने के नाते राजनीतिक फायदा उठा रहा है, तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.
भारत में अब युवाओं में राजनीतिक जागरूकता कुछ-कुछ बढ़ रही है. युवा अब राजनीति में आना चाहते हैं. ऐसे लोगों को राहुल गांधी का बयान अच्छा नहीं लगेगा और उन्हें हताश करनेवाला साबित होगा कि इस मामले में कुछ किया ही नहीं जा सकता है. राहुल को चाहिए कि वे युवाओं की राजनीतिक जागरूकता को समझें और ऐसे बयान देने के बजाय उन्हें आगे आने के लिए प्रेरित करें.
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
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