भारत और इस्राइल संबंध

Updated at : 06 Jul 2017 6:25 AM (IST)
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भारत और इस्राइल संबंध

पुष्पेश पंत वरिष्ठ स्तंभकार तेल अवीव में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इस्राइली सरकार के सदर बेंजामिन नेतन्याहू की मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विश्लेषण करनेवालों को असाधारण रूप से चौकन्ना किया है. यह अभूतपूर्व और ऐतिहासिक समझे जाने योग्य सिर्फ इसलिए नहीं, क्योंकि कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री पहली बार उस देश की धरती […]

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पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
तेल अवीव में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इस्राइली सरकार के सदर बेंजामिन नेतन्याहू की मुलाकात ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विश्लेषण करनेवालों को असाधारण रूप से चौकन्ना किया है. यह अभूतपूर्व और ऐतिहासिक समझे जाने योग्य सिर्फ इसलिए नहीं, क्योंकि कोई भी भारतीय प्रधानमंत्री पहली बार उस देश की धरती पर कदम रख रहा है, वरन् इसके द्वारा शायद भारत अपनी विदेश नीति में एक बड़े बुनियादी बदलाव की घोषणा कर रहा है.
आजादी के बाद से आज तक भले ही भारत ने धर्म के आधार पर गठित यहूदी राज्य को मान्यता दे दी थी, राजदूत के स्तर पर राजनयिक संबंध 1992 में नरसिम्हा राव के कार्यकाल में ही स्थापित हो सके. भारत पारंपरिक रूप से फिलिस्तीनियों का समर्थक रहा है और शेष पश्चिम एशिया में भी हम इस्राइल के मुकाबले रण में डटे अरब देशों का ही समर्थन करते आये हैं. हालांकि, इस नीति को आंतरिक राजनीति के चुनावी गणित के साथ जोड़ कर देखना पूरी तरह जायज नहीं है.
कहीं न कहीं भारत और इस्राइल संबंधों को पाकिस्तान की तरफ से सामरिक संकट प्रभावित करता रहा है. इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि परदे के पीछे लगातार संवाद जारी रहा है और संवेदनशील मुद्दों पर सामरिक सहकार भी होता रहा है. आज भी आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में इस्राइल की अहमियत हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण समझी जा रही है. निश्चय ही इस समझौते के ब्यौरे सार्वजनिक नहीं किये जा सकते, पर इनके निशाने पर पाकिस्तान में पनाह ले पनपनेवाले दहशतगर्द ही होंगे.
इसके अलावा यह सोचना भी प्रामाणिक है कि हाल के महीनों में इस्राइल भारत को सैनिक साज-सामान बेचनेवाले देशों में अग्रगण्य बन रहा है. जो कुछ हमें अमेरिका या यूरोप से नहीं हासिल होता, वह इस्राइल देने को तत्पर है. हथियारों से लैस चालक रहित ड्रोन इसका सिर्फ एक उदाहरण है. परमाणु ऊर्जा से लेकर अंतरिक्ष अन्वेषण तक सामरिक शोध के क्षेत्र में भारत तथा इस्राइल के बीच सार्थक सहयोग की असीम संभावनाएं जगजाहिर हैं. जैसा नेतन्याहू ने कहा भी, ‘इस दोस्ती के मुकाम सितारों के आगे- आसमानों से परे भी हो सकते हैं! उन्होंने यह चुटकी भी ली- बड़ी देर कर दी मेहरबां दोस्त आते-आते!
कृषि और गैरपारंपरिक ऊर्जा के विकास में भी इस्राइल का अनुभव भारत के काम आ सकता है. कुछ सौदे एवं समझौते इन विषयों को प्राथमिकता देनेवाले हैं. चिकित्सा, औषधि निर्माण, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, बायोटेक, यानी हर उस उदीयमान उद्योग में जहां भारतीय अपनी क्षमता बढ़ाना चाहते हैं, इस्राइल हमारे लिए पूरक नजर आता है, प्रतिद्वंद्वी नहीं.
इस सबके बावजूद हमें यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि हर जगह इन दो देशों के राष्ट्रीय हितों में शत-प्रतिशत संयोग या सन्निपात होता रहेगा. मसलन, ईरान के मामले में मतभेद बने रहने की ही अधिक संभावना है.
यह सोचना भी बचपना ही कहा जा सकता है कि इस्राइल और भारत को करीब आते देख चीन बौखला जायेगा. खुद चीन के रिश्ते इस्राइल के साथ बहुत अच्छे हैं और अार्थिक संबंध भी बड़े पैमाने पर निरापद हैं.
यह आशंका भी निर्मूल नहीं कि अति उत्साही भगवा ध्वज धारक इस्राइल की दोस्ती का प्रचार कुछ इस अंदाज में करने लगेंगे, जिससे लगे कि बस उसी तर्ज पर भारत में भी हिंदू धर्म और संस्कृति की प्राचीन बुनियाद पर निकट भविष्य में ही भव्य भवन का निर्माण होने जा रहा है. इस्राइल का सपना पूरा करनेवालों में जीयोनवादी कट्टरपंथी भी रहे हैं और कभी वंशनाशक नाजी नस्लवादियों का शिकार रहे यहूदियों ने भी फिलिस्तीनियों और अरबों के साथ अमानवीय व्यवहार किया है. पलक झपकते इस इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता.
अंत में यह जोड़ने की और जोर देकर दोहराने की जरूरत है कि लाभ-लागत का आकलन करने का वक्त किसी भी राजकीय दौरे के दो-चार दिन बाद नहीं हो सकता. यह बात भी कबूल करने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए कि मोदी जी बरसों पहले बोई फसल काट रहे हैं. पर, जिस बात का पूरा श्रेय उन्हें दिया जाना चाहिए, वह भारतीय विदेशी और राजनय को पाखंड से छुटकारा दिलाना है.
नरसिम्हा राव तो छोड़िये, इस्राइल का समर्थन करनेवाले अटल बिहारी वाजपेयी भी यह साहसिक पहल नहीं कर सके थे. यह संतोष का विषय है कि नेतन्याहू ने दो टूक यह कहा है कि भारत और इस्राइल के रिश्तों को उभयपक्षीय कसौटी में ही कस कर परखें. क्षेत्रीय या वैश्विक समीकरणों को एक साथ संतुलित करने के चक्कर में न पड़ें. हां, भारत यदि इस्राइल और उसके बैरियों के बीच तनाव घटाने में सहायक होता है, तो वह इस संभावना का स्वागत करेगा.
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