राष्ट्रपति का आह्वान

Updated at : 03 Jul 2017 6:24 AM (IST)
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राष्ट्रपति का आह्वान

पिछले कुछ अरसे से देश के अलग-अलग हिस्सों में गौरक्षा के नाम पर हिंसक भीड़ द्वारा हमले की लगातार घटनाओं से क्षुब्ध होकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि जब उन्माद इस हद तक बढ़ जाये, अतार्किक और अनियंत्रित हो जाये, तब नागरिकों को देश के बुनियादी मूल्यों को बचाने के लिए सचेत और […]

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पिछले कुछ अरसे से देश के अलग-अलग हिस्सों में गौरक्षा के नाम पर हिंसक भीड़ द्वारा हमले की लगातार घटनाओं से क्षुब्ध होकर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि जब उन्माद इस हद तक बढ़ जाये, अतार्किक और अनियंत्रित हो जाये, तब नागरिकों को देश के बुनियादी मूल्यों को बचाने के लिए सचेत और सजग हो जाना चाहिए. देश के प्रथम नागरिक ने लोगों से ठहरकर आत्मचिंतन का आह्वान किया है. कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि गौरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा स्वीकार्य नहीं है. लेकिन यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उन्मादी भीड़ ठिठकने का नाम नहीं ले रही है.

यह भी बहुत चिंताजनक है कि शक और अफवाह के बहाने ऐसे हमलों की घटनाएं देश के कई भागों में घटी है, जिनमें शहर भी हैं और गांव भी. सांप्रदायिक और जातिगत आधार पर भी हिंसा और तनाव की खबरें भी लगभग रोजमर्रा की बात हो गयी हैं. इन प्रवृत्तियों पर ठोस नकेल कसने में सरकारी और प्रशासनिक अमले की असफलता तथा राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर समुचित सक्रियता का अभाव भी बहुत अफसोसनाक है.

राष्ट्रपति ने आगाह किया है कि यदि आज हमने मुस्तैदी नहीं दिखायी, तो आनेवाली पीढ़ियां हमसे जवाब तलब करेंगी कि हमने क्या किया था और क्या नहीं. विविधताओं से समृद्ध यह देश संवैधानिक आदर्शों और नीतियों से संचालित होना चाहिए, न कि घृणा और द्वेष की खतरनाक सोच से निर्देशित भीड़ की हिंसा से. हत्यारी भीड़ के ये हमले महज उन लोगों पर नहीं हो रहे हैं, जिन्हें सीधे निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि यह पूरे देश की एकता और अखंडता को तोड़ने का षड्यंत्र है. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत कई गणमान्य लोगों के निवेदन को समझते हुए हमें आज यह प्रश्न पूछना है कि क्या भय और भेदभाव के रास्ते पर चल कर हम देश के सर्वांगीण विकास के सपने को फलीभूत कर सकेंगे. क्या संकीर्ण और आततायी वैचारिकी एक सुखी भविष्य का आधार तैयार कर सकती है? अगर इस हिंसक माहौल को अमन-चैन में नहीं बदला गया, तो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रनिर्माताओं के त्याग और प्रयास नाकाम साबित होंगे.

ऐसे में न सिर्फ हम अपने आनेवाले कल से हाथ धो बैठेंगे, बल्कि अपने इतिहास और संस्कृति की उत्कृष्टताओं को भी खो देंगे. हमें व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर सक्रिय होकर ऐसे तत्वों का विरोध करना होगा जो देश के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा हैं. हमें सरकारों पर भी निरंतर दबाव बनाना होगा कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वाह उचित ढंग से करें और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें.

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