एयर इंडिया का निजीकरण

Updated at : 30 Jun 2017 6:21 AM (IST)
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एयर इंडिया का निजीकरण

सरकार ने कर्ज में डूबी एयर इंडिया और उसकी पांच सहायक कंपनियों के निजीकरण के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है. वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में पैनल इस उड़ान सेवा के बेचे जाने की प्रक्रियाएं तय करेगा. इसे यह भी निर्णय लेना है कि सौ फीसदी बेचना है या फिर सरकारी हिस्सेदारी भी […]

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सरकार ने कर्ज में डूबी एयर इंडिया और उसकी पांच सहायक कंपनियों के निजीकरण के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है. वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में पैनल इस उड़ान सेवा के बेचे जाने की प्रक्रियाएं तय करेगा. इसे यह भी निर्णय लेना है कि सौ फीसदी बेचना है या फिर सरकारी हिस्सेदारी भी रखनी है.

नीति आयोग और वित्त मंत्रालय इसे पूरा बेचने के पक्ष में हैं, जबकि नागरिक उड्डयन मंत्रालय की राय है कि परिसंपत्तियों और सहायक कंपनियों को बेच कर 30 हजार करोड़ रुपये जुटाये जायें. एयर इंडिया पर 52 हजार करोड़ रुपये से अधिक कर्ज है और फिलहाल इसका कामकाज 2012 में तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा दी गयी 30 हजार करोड़ की सहायता से चलाया जा रहा है. एयर इंडिया के पास 118 विमान हैं, जिनमें 43 बड़े जहाज शामिल हैं. इनमें 77 का मालिकाना कंपनी के पास है.

इस सेवा के तहत 41 अंतरराष्ट्रीय तथा 72 घरेलू उड़ानें हैं. घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में एयर इंडिया की हिस्सेदारी क्रमशः 14 और 17 फीसदी है तथा दुनियाभर में इसकी संपत्ति भी मौजूद है. सरकार का मानना है कि इसमें और निवेश के बजाये इसे सक्षम हाथों में बेच दिया जाये और बची राशि का इस्तेमाल सामाजिक क्षेत्र में किया जाये. सरकार ने यह भी भरोसा दिलाया है कि एयर इंडिया के करीब 12 हजार और सहायक कंपनियों के 19 हजार से ज्यादा कर्मचारियों के हितों का पूरा ख्याल रखा जायेगा.

संबद्ध कर्मचारी संगठन एयर इंडिया को बेचने की जगह 30 हजार करोड़ रुपये के कर्ज माफ करने का सुझाव दे रहे हैं. अनेक जानकारों का मानना है कि एयर इंडिया के निजीकरण की राह आसान नहीं होगी, क्योंकि 52 हजार करोड़ की देनदारी संभावित निवेशकों के लिए बड़ी चिंता की बात हो सकती है. वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने इंडियन एयरलाइंस का 51 फीसदी और एयर इंडिया का 60 फीसदी हिस्सा बेचने का निर्णय लिया था, पर इसे वापस ले लिया गया था.

वर्ष 2007 में दोनों के विलय के बाद भी घाटा कम नहीं हो सका, पर यूपीए ने 2012 में निजीकरण के विकल्प को किनारे रखते हुए 30 हजार करोड़ का कर्ज देकर एयर इंडिया के कायाकल्प की योजना बनायी थी. इसके दिन बहुरने की उम्मीद बेहद कम है. बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा में टिकने के लिए सक्षम प्रबंधन और पर्याप्त पूंजी चाहिए. अब देखना यह है कि पैनल किस हिसाब से निजीकरण की प्रक्रिया को आगे ले जाता है. उम्मीद है कि एयर इंडिया के कर्मचारियों के हितों का समुचित ध्यान रखते हुए सरकार आगे बढ़ेगी.

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