राष्ट्रपति के लिए सियासी खेल

Updated at : 27 Jun 2017 6:18 AM (IST)
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राष्ट्रपति के लिए सियासी खेल

रशीद किदवई राजनीतिक टिप्पणीकार rasheedkidwai@gmail.com भारत में कोई भी चुनाव बिना जातिगत राजनीति के नहीं हो सकता है. राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों को देख कर तो यही लगता है. भारतीय राजनीति कब किस मोड़ पर रुक जाये, इसकी भविष्यवाणी भी कोई राजनीतिक पंडित नहीं कर सकता है. लेकिन, जिस तरह एनडीए के राष्ट्रपति पद के […]

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रशीद किदवई
राजनीतिक टिप्पणीकार
rasheedkidwai@gmail.com
भारत में कोई भी चुनाव बिना जातिगत राजनीति के नहीं हो सकता है. राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों को देख कर तो यही लगता है. भारतीय राजनीति कब किस मोड़ पर रुक जाये, इसकी भविष्यवाणी भी कोई राजनीतिक पंडित नहीं कर सकता है. लेकिन, जिस तरह एनडीए के राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद से मुकाबले के लिए विपक्ष ने मीरा कुमार को उतारा है, उससे तय हो गया कि राष्ट्रपति चुनाव में मुकाबला दलित-बनाम-दलित ही होगा.
विपक्ष ने उम्मीदवार के नाम की घोषणा करने में जिस तरह ढुलमुल रवैया अपनाया, उससे मीरा कुमार को वोटों में मामले में घाटा ही होगा. भले ही यह सुनिश्चित है कि रामनाथ कोविंद इस मुकाबले में जीते हुए प्रत्याशी हैं, लेकिन नीतीश कुमार और मायावती जैसे जो वोटर रामनाथ कोविंद को वोट करनेवाले हैं, वह शायद मीरा कुमार को वोट करते, यदि कांग्रेस अपना उम्मीदवार पहले घोषित कर देती. इसके पीछे शायद कांग्रेसी नेताओं का मत यह रहा होगा कि मोदी और शाह की जोड़ी आरएसएस से जुड़े ऐसे किसी व्यक्ति को उतारेगी, जिसका आडवाणी जैसे बड़े नेता से कद मिलता-जुलता होगा.
इसके विपरीत मोदी ने जातिगत राजनीति का कार्ड खेलते हुए रामनाथ कोविंद को उतार दिया. वहीं विपक्ष ऐसा नाम सोच ही नहीं पाया या फिर नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद होने से डॉ एमएस स्वामीनाथन जैसे उम्मीदवार को उतारने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, जो इस पद के लिए शायद सबसे योग्य उम्मीदवार होते. उनके नाम पर अन्य दल भी उसी तरह समर्थन करते जैसे पहले एपीजे अब्दुल कलाम का किया था. इसके लिए विपक्ष को एक रणनीति के तहत वरिष्ठ नेताओं जैसे- शरद यादव, शरद पवार, मनमोहन सिंह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की एक साझा राष्ट्रीय कमिटी गठित कर प्रचार-प्रसार करती, जिससे राष्ट्रपति पद के लिए एक ऐसा उम्मीदवार ढूंढा जा सकता था. लेकिन कांग्रेस और पूरा विपक्ष इसमें असफल हो गया.
अगर मीरा कुमार का चयन पहले हो जाता, तो नीतीश कुमार के लिए बिहार की बेटी का विरोध करना मुश्किल होता और विपक्ष की एकता बनी रहती. नीतीश ने कोविंद का समर्थन कर बड़ा राजनीतिक दांव खेला है, जो शायद उल्टा पड़े. मोदी और शाह की जोड़ी में नीतीश का फिट होना मुश्किल है.
इस समय लालू यादव व कांग्रेस बिहार में सरकार गिराने के पक्ष में नही हैं, लेकिन महागठबंधन मे एक दरार आ गयी है. भले ही यह कहना आसान हो कि जातिगत राजनीति से चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है. बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व रामनाथ कोविंद को राज्यपाल बना कर शायद इसी मंशा से भाजपा सरकार ने भेजा था कि दलित और महादलित की राजनीति में उसे फायदा होगा, लेकिन इसे नीतीश और लालू यादव के महागठबंधन ने धूमिल कर दी.
बात राष्ट्रपति के चुनाव पर की जा रही है, तो ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसके तहत सत्ताधारी दल ने राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर अपने फायदे के लिए जातिगत और धार्मिक समीकरण बैठाने की कोशिश की हो. उदाहरण के रूप में ज्ञानी जैल सिंह का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्हें सिखों के समर्थन के लिए राष्ट्रपति बनाया गया, लेकिन नतीजा सबको पता है कि उनके बाद ऑपरेशन ब्लू स्टार कैसे हुआ.
विपक्ष अभी भी राष्ट्रपति चुनाव से कुछ राजनीतिक लाभ उठा सकता है, भले ही वह वोटों की संख्या में बहुत पीछे हो. देश के ज्वलंत मुद्दे, जैसे- किसानों की समस्याएं, आर्थिक मंदी, कश्मीर की चिंताजनक स्थिति, विदेश नीति, बेरोजगारी, तथाकथित गौ-रक्षकों का आतंक और बीफ को लेकर हो रहे हमले, कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिस पर व्यापक बहस की आवश्कता है. विपक्ष को मीरा कुमार के प्रचार के लिए राष्ट्रीय स्तर का पैनल बनाना चाहिए, जो देशव्यापी स्तर पर इन मुद्दों को उठाये.
भले ही मुकाबला बिहार-बनाम-बिहार का हो, यानी बिहार की बेटी और बिहार के पूर्व राज्यपाल के बीच हो, लेकिन एनडीए जातिगत राजनीति के बल पर रामनाथ कोविंद को उत्तर प्रदेश का लाल बता रही हैं, तो दूसरी तरफ मीरा कुमार को कांग्रेसी और उनके सहयोगी दल बिहार की बेटी बता कर उनकी पृष्ठभूमि का उपयोग कर रहे हैं. मुकाबला रोचक होगा जब दलित-बनाम-दलित की राजनीति में पुरुष और महिला उम्मीदवार आमने-सामने होंगे और वोट देनेवाले हमारे जनप्रतिनिधि उनके लिए मतदान करेंगे. राष्ट्रपति जैसे गरिमामय पद के लिए जिस तरह राजनीति हो रही है, उसे देखते हुए मुनव्वर राणा का एक शेर याद आता है-
सियासत नफरतों का जख्म भरने ही नहीं देती
जहां भरने को होता है, वहां मक्खियां बैठ ही जाती हैं.
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