वाम के उभार से सबक

Updated at : 26 Jun 2017 6:38 AM (IST)
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वाम के उभार से सबक

प्रसेनजीत बोस अर्थशास्त्री boseprasenjit@gmail.com इस माह की शुरुआत में ब्रिटेन में संपन्न आकस्मिक संसदीय चुनावों में लेबर पार्टी के प्रभावशाली प्रदर्शन ने पूरे विश्व में वामपंथ समर्थकों को नये उत्साह से भर दिया. जेरेमी कॉर्बिन की इस पार्टी को 2015 के चुनावों से 10 प्रतिशत इजाफे के साथ कुल मतों का 40 प्रतिशत हिस्सा मिला, […]

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प्रसेनजीत बोस

अर्थशास्त्री

boseprasenjit@gmail.com

इस माह की शुरुआत में ब्रिटेन में संपन्न आकस्मिक संसदीय चुनावों में लेबर पार्टी के प्रभावशाली प्रदर्शन ने पूरे विश्व में वामपंथ समर्थकों को नये उत्साह से भर दिया. जेरेमी कॉर्बिन की इस पार्टी को 2015 के चुनावों से 10 प्रतिशत इजाफे के साथ कुल मतों का 40 प्रतिशत हिस्सा मिला, जिससे पार्टी की संसदीय सीटों में 30 की बढ़ोतरी हो गयी.

हालांकि, लेबर पार्टी संसद में बहुमत हासिल नहीं कर सकी, पर थेरेसा मे की कंजर्वेटिव पार्टी की सीटें कम कर उसे कमजोर जरूर कर दिया. सत्तासीन पार्टी का भी मत प्रतिशत 37 से 42 हो गया, लेकिन लेबर पार्टी को मिले युवाओं के समर्थन ने भविष्य में आगे जाने की उम्मीदें जगा दी हैं. इसका श्रेय कॉर्बिन के प्रेरणादायी नेतृत्व के अतिरिक्त लेबर घोषणापत्र को भी दिया जाना चाहिए, जिसका ‘बहुतों के लिए, न कि केवल कुछ के लिए’ शीर्षक ही उसका मजमून साफ कर देता है.

तीन दशकों के दौरान पूरे विश्व की सामाजिक लोकतांत्रिक पार्टियों में सिद्धांतों तथा वित्तपोषण से जुड़े भ्रष्ट आचरण की वजह से आयी खामियों में सुधार लाने और आधारभूत मूल्यों पर पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए चली लहर की झलक अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के गत प्राथमिक चुनावों में भी देखने को मिली थी. तब वहां के स्वतंत्र सीनेटर बर्नी सैंडर्स की मुहिम को खासा समर्थन मिला था. हालांकि, नतीजों में वे हिलरी क्लिंटन से पिछड़ गये, पर आय असमानता तथा वाल स्ट्रीट की गलत करतूतों के विरुद्ध उनके अभियान ने न केवल युवाओं में स्फूर्ति का संचार किया, बल्कि ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ की इस हवा ने परिवर्तन की लहर को जन्म दिया. लेबर पार्टी की सफलता से इसने ब्रिटेन को भी अपने आगोश में समेट लिया.

ऐसा नहीं कि यह बदलाव सिर्फ अमेरिका-इंगलैंड तक ही सीमित रह गया हो. अप्रैल, 2017 में संपन्न फ्रांस चुनावों में भी इसका असर दिखा, जब जॉन लिक मेलन्शों द्वारा 2008 में सोशलिस्ट पार्टी से किनारा कर गठित एक नयी पार्टी पिछले चुनावों में प्राप्त 11 प्रतिशत मतों से आगे बढ़ कर इस बार 19.5 प्रतिशत मत हासिल कर चौथे स्थान पर रही और एक बार फिर इसका श्रेय युवाओं के नाम ही गया.

परिवर्तन की इस लहर ने फ्रांस में समाजवादी विचारधारा की स्थापित पार्टी की गिरावट को अमेरिका और इंगलैंड की भांति भीतर से दुरुस्त करने की कवायद न कर एक नये लोकतांत्रिक-समाजवादी विकल्प की ही तलाश कर ली. इन विकसित देशों में वाम विचारधारा को लेकर हुई उत्साहजनक प्रगतिशीलता में तो सभी देशों के लिए, मगर खासतौर पर भारत के लिए उपयोगी संदेश निहित हैं, जहां एक दशक से वाम पक्ष अधोन्मुख रहा है.

पहला, वाम को नव-उदारवाद के भ्रष्टाचारी असर से राह विलग कर वित्तीय पूंजी, विशालकाय कॉरपोरेशनों तथा उनके हितों का पोषण करते राज्य की आलोचना में सीधा-सच्चा रुख अख्तियार करना होगा. दूसरा, वाम द्वारा आंदोलन खड़े करने और तृणमूल स्तर पर सक्रियता की आधारभूमि तैयार करने की आवश्यकता है, न कि दक्षिणपंथ की मुखालफत के नाम पर यथास्थितिवादी संसदवाद के पोषण पर लगे रहने की. धुर दक्षिणपंथ स्वयं ही प्रतिक्रियावादी आंदोलन है और इसका मुकाबला लोकप्रिय जन समर्थन सृजित करने के गंभीर प्रयासों के बगैर सिर्फ संसदीय रणनीतियों से नहीं किया जा सकता.

तीसरा, इसे सैद्धांतिक हठधर्मिता छोड़ खुद में युवाओं की आकांक्षाओं का अक्स उकेरना होगा. इसके लिए उन्हें बीसवीं सदी के अधिनायकवादी और केंद्रीकृत रूप से संचालित शासन पद्धति के मोह का परित्याग कर समाजवाद का एक लोकतांत्रिक एवं सहभागी स्वरूप विकसित करना होगा. इसका एक निहितार्थ यह भी है कि उन्हें वाम के उस पुराने पड़ चुके सांगठनिक ढांचे को तिलांजलि देकर स्वयं के अंदर विचारों की विविधता तथा पहलकदमियों को प्रोत्साहन प्रदान करने की प्रणाली विकसित करनी होगी, जो हर मतभेद का गला घोंट यथास्थितिवादी निष्प्रभावी शक्तियों का ही पोषण किया करता है. यदि नये विचारों को भीतर से ही पनपने न दिया जाये, यह स्वाभाविक है कि तब वे बाहर ही विकसित होंगे. भारत में वाम नेतृत्व की उम्र को उजागर कर युवाओं से उसके कट जाने के मुद्दे उठाये जाते रहे हैं.

गौरतलब है कि जहां बर्नी सैंडर्स की अवस्था 75 वर्ष है, वहीं जेरेमी कॉर्बिन 68 के और जॉन लिक मेलन्शों 65 वर्षों के हैं. उनके देश के युवाओं के लिए सही सियासत करनेवाले खरी शख्सीयतों की उम्र की बजाय उनके चरित्र और विचारों की अहमियत कहीं अधिक है और इसकी कोई वजह नहीं कि भारतीय युवा नवीन वाम विचारों की एक नूतन लहर का प्रत्युत्तर देने में अपने वैश्विक बंधुओं से किंचित भी पीछे रहेंगे.

(अनुवाद: विजय नंदन)

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