मंदी की आशंका

भाषा में छेड़ से बड़ी मानीखेज सूक्तियां गढ़ने के लिए ख्यात मनोहर श्याम जोशी के एक उपन्यास में आता है कि बेशक यह दुनिया भगवान की ही बनायी हुई है और इस दुनिया के आदि-अंत पर उसका अख्तियार है, लेकिन भगवान भी नहीं जानता कि उसकी बनायी दुनिया में कब कौन-सा कण कैसी गति करेगा. […]
भाषा में छेड़ से बड़ी मानीखेज सूक्तियां गढ़ने के लिए ख्यात मनोहर श्याम जोशी के एक उपन्यास में आता है कि बेशक यह दुनिया भगवान की ही बनायी हुई है और इस दुनिया के आदि-अंत पर उसका अख्तियार है, लेकिन भगवान भी नहीं जानता कि उसकी बनायी दुनिया में कब कौन-सा कण कैसी गति करेगा. यही बात दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के बारे में कही जा सकती है. अर्थव्यवस्था हमेशा से भविष्यदर्शी नीतियों का विषय है और नीतियां बड़े जतन से बनायी जाती हैं कि आगे अनुकूल नतीजे मिलें. तो भी, चाहे कोई इस मैदान का कितना भी बड़ा महारथी क्यों ना हो, दावे के साथ नहीं कह सकता कि नतीजों का ऊंट कब किस करवट बैठेगा.
मिसाल के लिए सरकार के नोटबंदी के फैसले को लिया जा सकता है. उस घड़ी सरकार ने कहा कि यह फैसला अर्थव्यवस्था पर पड़नेवाले दूरगामी अच्छे प्रभाव को देखते हुए लिया गया है. लेकिन, देश की बैंकिंग व्यवस्था के सिरमौर स्टेट बैंक का अनुमान कुछ और ही बताता है. इस बैंक ने अपने 15 हजार करोड़ के शेयरों की अपनी बिक्री से पहले सांस्थानिक निवेशकों को आगाह किया है कि अर्थव्यवस्था और बैंकिंग के क्षेत्र पर नोटबंदी के फैसले के क्या असर होंगे, इसके बारे में कहना मुश्किल है. सांस्थानिक निवेशकों के लिए इसका एक मतलब हुआ कि बैंक के शेयर खरीदने से पहले जोखिम का आकलन कर लें. स्टेट बैंक की इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि 33 लाख करोड़ की बैलेंस शीट वाला यह बैंक पांच साथी बैंकों और भारतीय महिला बैंक के साथ अपने मेल के बाद दुनिया के 50 बड़े बैंकों में शुमार हो गया है.
स्टेट बैंक की बात को केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) और रिजर्व बैंक के नये आंकड़ों के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए. सीएसओ ने आर्थिक वृद्धि दर के आखिरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर के घटने की सूचना दी. तीन साल पहले की तुलना में आर्थिक वृद्धि दर तकरीबन दो फीसदी घटी है. कच्चे तेल, कोयला आदि के उत्पादन में कमी की भी सूचना आयी, जो कि घरेलू बाजार में उत्पादन कम होने का संकेत है.
रिजर्व बैंक के आंकड़ों का भी यही इशारा है. बैंकों में चालू खाते और बचत खाते में जमा रकम इतनी ज्यादा हो गयी है कि नकद जमा को हतोत्साहित करने के लिए बैंकों ने ब्याज दर घटा दिया है. नकदी का बैंक में पड़ा रहना बैंकों के लिए घाटे का सौदा है और मांग के घटने का संकेत भी. उम्मीद की जानी चाहिए कि इन संकेतों से झांकते हालात के मद्देनजर सरकार अर्थव्यवस्था के उभार के फौरी कदम उठायेगी.
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