नदी की व्यथा

राजीव रंजन गिरि टिप्पणीकार कोई तीन साल पहले की बात है. हम कुछ मित्र इकट्ठा हुए थे. बातचीत के दौरान पत्रकारिता पर शोध कर रही अनुपमा के मोबाइल की घंटी ने सबका ध्यान भंग किया.अमूमन बातचीत के दौरान फोन की घंटी कोफ्त का कारक लगती है. पर, तब मधुर संगीत की ध्वनि और गीत के […]
राजीव रंजन गिरि
टिप्पणीकार
कोई तीन साल पहले की बात है. हम कुछ मित्र इकट्ठा हुए थे. बातचीत के दौरान पत्रकारिता पर शोध कर रही अनुपमा के मोबाइल की घंटी ने सबका ध्यान भंग किया.अमूमन बातचीत के दौरान फोन की घंटी कोफ्त का कारक लगती है. पर, तब मधुर संगीत की ध्वनि और गीत के कारुणिक बोल के कारण कोफ्त न होकर, ध्यान आकर्षित हुआ.
उस गीत में गायिका की आवाज में कशिश के साथ व्यथा भी थी. गीत में नदी से धीरे बहने का इसरार था. कारण बताया गया था कि चूंकि अब लोगों को तुम्हारी परवाह नहीं है, इसलिए धीरे बहो. मानव सभ्यता नदियों के किनारे पल्लवित-पुष्पित हुई.
नदियों ने मनुष्यों की चिंता की, पर सभ्यता के विकास ने बदसलूकी की. क्या नदियों को यही प्रतिदान मिलना था! नदियां ही क्यों समूची प्रकृति का सिर्फ दोहन हुआ. प्रकृति के तमाम अंगों-उपांगों को परस्पर साहचर्य के स्थान पर सिर्फ दोहन और दुत्कार मिला. ऐसा दर्शन विकसित हुआ कि सारी प्रकृति मनुष्यों के अनियंत्रित और असंयमित भोग के लिए है. विकास का शास्त्र भी इसी सोच की बुनियाद पर गढ़ा गया.
उस धुन को सुन कर पूरा गीत सुनने की इच्छा हुई. सुना भी. गायिका थीं चंदन तिवारी. फिर पता चला भोजपुरी गीतों के संरक्षण और संस्कृति में लगी संस्था ‘पुरबिया तान’ के बारे में. ऐसे दौर में जब भोजपुरी गीत-संगीत का मतलब अश्लील-द्विअर्थी और कानफोड़ू हो गया है, भोजपुरी लोकसर्जकों के गीत जो कभी इस इलाके के लोगों के कंठहार थे, अब सुनने को कम ही मिलते हैं. लिहाजा पुरबिया तान के बारे में और जानने की इच्छा हुई. यूट्यूब और यत्र-तत्र से सुनना-जानना शुरू किया. भोजपुरी लोक में रचे-बसे गीतों के कार्यक्रमों का आयोजन एक मायने में लोक-संस्कृति के इस आवश्यक आयाम का संरक्षण-संवर्धन है.
चंदन तिवारी ने नदी का शोकगीत नहीं गाया था. नदी और मानव सभ्यता के रिश्ते के संक्षिप्त इतिहास वाले इस गीत में एक संवेदनशील नागरिक की गहरी पीड़ा थी. जनमानस नदी की तकलीफ अपने सगे के दुखों की मानिंद महसूस करे, यह भाव था. नदी मनुष्यों से कुछ नहीं मांगती. बिना शर्त अनवरत दान करती है. जीवों को जीवन देती है. नदी का बहना उसकी सांस है.
उसके प्रवाह को रोकना वैसा ही है, जैसे किसी की सांसों पर पहरेदार बैठा दिया गया हो. बांध, बैराज और गाद नदी की श्वासनली को आवश्यकता अनुरूप नहीं रहने देते. उसे संकरा बनाते हैं. क्या आवश्यकता से कम ऑक्सीजन पर जीव-जंतु जी सकते हैं? फिर नदी कैसे जिंदा रहेगी! चंदन तिवारी नदी की जो व्यथा गाकर सुना रही हैं, उसे हम कब सुनेंगे?
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