सोशल मीडिया के जरिए Gen Z को निशाना बना रहा पाकिस्तान? ऐसे शुरू होता है पूरा खेल
दिल्ली स्पेशल सेल ने 4 आरोपियों को किया गिरफ्तार. फोटो- सोशल मीडिया
जांच एजेंसियों ने पाकिस्तान से संचालित हो रहे एक ऐसे रैकेट का भंडाफोड़ किया है जो सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को अपने जाल में फंसा रहा है. आर्थिक तंगी और कम शिक्षा का फायदा उठाकर उन्हें अपराध की दुनिया में धकेला जा रहा है. यह मामला युवाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
भारत में पिछले दो वर्षों में उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और महाराष्ट्र की एजेंसियों ने ऐसे दर्जनों युवाओं का पता लगाया है, जिन्हें कथित तौर पर पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स ने सोशल मीडिया के जरिए अपने नेटवर्क में शामिल किया. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, आर्थिक तंगी, कम शिक्षा और नशे की लत से जूझ रहे युवाओं को खास तौर पर निशाना बनाया गया.
पहले पैसे का लालच, फिर बढ़ता अपराध
जांच एजेंसियों के के मुताबिक, युवाओं को शुरुआत में 12 हजार से 25 हजार रुपये तक दिए जाते थे. इसके बाद उनसे छोटे-छोटे काम कराए जाते. पुलिस स्टेशन या किसी संवेदनशील जगह की वीडियो बनाने जैसे कामों से शुरुआत कर धीरे-धीरे उन्हें गंभीर आपराधिक गतिविधियों की ओर धकेलने का आरोप है.
पाकिस्तानी गैंगस्टर का नाम सामने
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, इस कथित नेटवर्क में पाकिस्तान के गैंगस्टर शहजाद भट्टी और उसके सहयोगियों की भूमिका सामने आई है. आरोप है कि सोशल मीडिया पर युवाओं से संपर्क कर उन्हें प्रभावित किया जाता और फिर अलग मैसेजिंग ग्रुप में जोड़ा जाता था. वहां भारत और अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के जरिए उनका मानसिक तौर पर प्रभाव बनाने की कोशिश की जाती.
अशरफ दानियाल से ऐसे हुई कथित शुरुआत
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के 23 वर्षीय अशरफ दानियाल का नाम भी जांच में सामने आया है. महाराष्ट्र के भिवंडी में हैंडलूम का काम करने वाले दानियाल से कथित तौर पर जनवरी में इंस्टाग्राम के जरिए हम्माद मेमन ने संपर्क किया. मेमन को भट्टी का सहयोगी बताया गया है. बाद में दानियाल को एक अन्य मैसेजिंग ग्रुप में जोड़े जाने का दावा किया गया.
गरीबी और मजबूरी को बनाया हथियार
जांच में सामने आए युवाओं में मुंबई के 21 वर्षीय साजिद महबूब शेख, गोरखपुर के 20 वर्षीय कृष्णा मिश्रा और पंजाब के अमरजीत सिंह, करनजीत सिंह व सतनाम सिंह के नाम भी बताए गए हैं. एजेंसियों का आरोप है कि इन युवाओं की कमजोर आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का फायदा उठाकर उन्हें कथित नेटवर्क में खींचा गया.
Gen Z के लिए बढ़ा खतरा
यह मामला दिखाता है कि सोशल मीडिया पर मिलने वाला अनजान संपर्क किस तरह युवाओं को धीरे-धीरे प्रभावित कर सकता है. जांच एजेंसियां अब ऐसे नेटवर्क, ऑनलाइन संपर्कों और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रख रही हैं. सवाल सिर्फ सुरक्षा का नहीं, बल्कि यह भी है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर युवाओं को कट्टरपंथी नेटवर्क से बचाने के लिए परिवार और समाज कितने तैयार हैं.
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By सत्येन्द्र गिरि
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