सोशल मीडिया पर बच्चों के अकाउंट होंगे बैन ? रोज 6 घंटे से ज्यादा खर्च कर देते हैं अपना समय

Published by : Amitabh Kumar Updated At : 05 Apr 2025 6:44 AM

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सांकेतिक तस्वीर

Social Media Ban for Children : सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध संबंधी याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है. इससे पहले लोगों के जेहन में सवाल आ रहा था कि क्या सोशल मीडिया पर बच्चों के अकाउंट बैन कर दिए जाएंगे ? लेकिन इस सवाल का जवाब है नहीं. याचिका में कहा गया कि 9-17 वर्ष की आयु के 17 प्रतिशत बच्चे रोजाना छह घंटे से ज्यादा या तो सोशल मीडिया या गेमिंग प्लेटफार्म पर अपना समय बिताते हैं.

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Social Media Ban for Children : सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध संबंधी याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है. इससे पहले लोगों के जेहन में सवाल आ रहा था कि क्या  सोशल मीडिया पर बच्चों के अकाउंट बैन कर दिए जाएंगे ? लेकिन इस सवाल का जवाब है नहीं. याचिका में कहा गया कि  9-17 वर्ष की आयु के 17 प्रतिशत बच्चे रोजाना छह घंटे से ज्यादा या तो सोशल मीडिया या गेमिंग प्लेटफार्म पर अपना समय बिताते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन लगाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. इससे यह साफ हो गया है कि बच्चों के अकाउंट जारी रहेंगे. जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले की सुनवाई की. इस दौरान उन्होंने कहा कि यह नीतिगत मामला है. आप संसद से कानून बनाने के लिए कह सकते हैं. यह हमारे दायरे से बाहर की चीज है.

याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

याचिका में बच्चों पर सोशल मीडिया के गंभीर शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव का उल्लेख किया गया था. साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफार्म तक बच्चों की पहुंच को कंट्रोल करने के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम जैसी मजबूत एज वेरिफिकेशन सिस्टम शुरू करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया. पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील से कहा, ‘‘यह नीतिगत मामला है. आप संसद से कानून बनाने के लिए कहें.’’ आगे पीठ ने कहा, ‘‘इसलिए हम याचिकाकर्ता को प्रतिवादी प्राधिकारी के समक्ष अपना पक्ष रखने की छूट देते हुए याचिका का निपटारा करते हैं.’’ ‘जेप फांउंडेशन’ द्वारा दायर याचिका दायर की गई. 

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कितना समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं बच्चे

याचिका में कहा गया है कि भारत में बच्चों में अवसाद, चिंता, खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति और आत्महत्या की दर में खतरनाक वृद्धि देखी जा रही है. इसका कारण ज्यादा सोशल मीडिया का यूज करना है. याचिका में कहा गया है, ‘‘स्टडी से यह स्पष्ट है कि सोशल मीडिया के ज्यादा संपर्क में रहने वाले नाबालिग अत्यधिक मनोवैज्ञानिक संकट, सामाजिक अलगाव, लत लगने से पीड़ित हैं.’’ याचिका के अनुसार, देश की लगभग 30 प्रतिशत आबादी में चार से 18 वर्ष की आयु के बच्चे शामिल हैं. याचिका में महाराष्ट्र की रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसमें बताया गया कि 9-17 वर्ष की आयु के 17 प्रतिशत बच्चे रोजाना छह घंटे से अधिक या तो सोशल मीडिया या गेमिंग प्लेटफार्म पर अपना समय बिताते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के सोशल मीडिया पर बैन

ऑस्ट्रेलिया में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन है. इस संबंध में बिल नवंबर, 2024 में संसद से पारित हुआ था. पक्ष और विपक्ष दोनों ने इस बिल का समर्थन किया था जिसके बाद ऑस्ट्रेलिया ऐसा बिल पारित करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया.

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अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.

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