Ratan Tata: 14 अखबार पढ़ते थे रतन टाटा, हॉकर जब न्यूज पेपर देता तो चेहरे पर आ जाती थी मुस्कान

Published by : Amitabh Kumar Updated At : 11 Oct 2024 10:41 AM

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Ratan Tata: हरिकेष ने अखबार बांटने का काम गुरुवार को जल्दी खत्म किया. इसके बाद वह टाटा को अंतिम विदाई देने के लिए पहुंचा. उसने रतन टाटा को लेकर कई बातें साझा की.

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Ratan Tata: भारत ने अपने ‘रतन’ मशहूर उद्योगपति रतन टाटा को गुरुवार को भावभीनी विदाई दे दी. उनका अंतिम संस्कार मुंबई के वर्ली श्मशान घाट में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया. टाटा से जुड़ी कई तरह की खबरें सामने आ रहीं हैं. इस बीच एक खबर उनके अखबार से जुड़ाव को लेकर आई है. दरअसल, दुनिया के सबसे प्रभावशाली उद्योगपति के निधन ने उन्हें अखबार देने वाले हॉकर हरिकेष सिंह को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी कोराना काल है या टाटा का इस दुनिया से चले जाना?

39 साल के हरिकेष को बुधवार तक लगता था कि वैश्विक महामारी कोविड-19 उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी. लेकिन अब वह उससे भी ज्यादा दुखी है. दरअसल, संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू लॉकडाउन के दौरान उसका अखबार वितरण का कारोबार बहुत ही बुरी तरह से प्रभावित हुआ था और लंबे समय तक उसे परेशानी का सामना करना पड़ा था.

कितना अखबार पढ़ते थे रतन टाटा?

कम से कम 14 अखबार लेने वाले पसंदीदा ग्राहक (रतन टाटा) के निधन की खबर सुनने के बाद हरिकेष को सोचना पड़ रहा है कि उसके लिए जीवन की सबसे बड़ी त्रास्दी क्या है? कोविड-19 महामारी या रतन टाटा का निधन…करीब दो दशक से अधिक समय तक टाटा के घर में अखबार देने वाले हॉकर ने कहा कि वह एक बहुत अच्छे इंसान थे. गरीबों के लिए वे किसी मसीहा से कम नहीं थे. उसने बताया कि साल 2001 में टाटा के घर में अखबार देना उसने शुरू किया था. उस वक्त टाटा कोलाबा की बख्तावर के एक अपार्टमेंट में रहते थे. कुछ सालों के बाद वह इसी इमारत के बगल में एक निजी बंगले ‘हलकाई’ में रहने लगे थे. हरिकेष ने कहा कि उसकी आंखों के सामने आज भी वह दृश्य घूम रहा है, जब टाटा सुबह अपने बंगले के गार्डन में बैठकर मुस्कराहट के साथ उसका दिया अखबार पढ़ते थे.

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जब टाटा ने की 5 लाख की मदद की

गुरुवार को हरिकेष ने अखबार बांटने का काम जल्दी खत्म किया. इसके बाद वह टाटा को अंतिम विदाई देने के लिए कोलाबा बाइलेन पहुंचा, जहां हजारों लोग पहले से मौजूद थे. उसने बताया कि टाटा हाथ हिलाकर उसका अभिवादन स्वीकार करते, यही नहीं कई बार ऐसा हुआ कि उन्होंने उसका हालचाल भी पूछा. उसने बताया कि कुछ साल पहले उसके एक रिश्तेदार को कैंसर हो गया. जब टाटा को यह बात पता चली तो उन्होंने टाटा मेमोरियल अस्पताल को पत्र लिखकर उसका त्वरित उपचार सुनिश्चित करने को कहा, साथ ही उसे 5 लाख रुपये की आर्थिक मदद भी दी.

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लेखक के बारे में

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अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.

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