Explainer: ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ में प्रियंका गांधी लगाएंगी सेंध! यहां जानिए ग्वालियर का समीकरण

Published by : Amitabh Kumar Updated At : 21 Jul 2023 7:49 AM

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MP Election 2023 : मध्य प्रदेश में सिंधिया के वफादार विधायकों ने कांग्रेस छोड़ दी थी और बाद में उन्होंने मार्च 2020 में भाजपा का दामन थाम लिया था. ग्वालियर संभाग में कांग्रेस को मजबूत करने की जिम्मेदारी प्रियंका गांधी को दी गयी है.

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MP Election 2023 : कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा केंद्रीय मंत्री और पार्टी के पूर्व नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के गृह क्षेत्र ग्वालियर में गरजती नजर आने वालीं हैं. शुक्रवार को वह एक जनसभा को संबोधित करेंगी. प्रियंका गांधी की पिछले 40 दिन में मध्य प्रदेश की यह दूसरी यात्रा होने वाली है जिसको लेकर प्रदेश की राजनीति गरम हो चुकी हैं. कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह खुद इस रैली की तैयारी में जुटे हुए हैं. आपको बता दें कि प्रदेश में इस साल की अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं जिसको लेकर कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा ने भी कमर कस ली है.

कांग्रेस की मध्य प्रदेश इकाई के मीडिया विभाग के अध्यक्ष के के मिश्रा ने प्रियंका गांधी की रैली को लेकर जानकारी दी है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पूर्वाह्न 11 बजे ग्वालियर पहुंचेंगी और फिर रानी लक्ष्मीबाई के स्मारक पर जाएंगी, जहां वह महान स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि देने का काम करेंगी. करीब साढ़े 11 बजे मेला मैदान में एक जनसभा को प्रियंका संबोधित करेंगी जिसकी तैयारी करीब पूरी कर ली गयी है. उल्लेखनीय है कि इससे पहले प्रियंका ने 12 जून को जबलपुर में एक रैली को संबोधित कर प्रदेश में अपनी पार्टी के चुनाव अभियान की शुरुआत की थी. कांग्रेस नेता ने जबलपुर में कहा था कि यदि कांग्रेस प्रदेश में सत्ता में आती है तो वह पांच योजनाएं लागू करेंगी जिनमें महिलाओं को प्रतिमाह 1,500 रुपये की आर्थिक सहायता, 100 यूनिट मुफ्त बिजली और कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना की बहाली शामिल हैं.

सिंधिया हैं प्रियंका गांधी के निशाने पर

जबलपुर की रैली में प्रियंका गांधी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार पर भ्रष्टाचार में डूबे रहने और नौकरियां देने में विफल रहने का आरोप लगाया था. यही नहीं उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सिंधिया पर भी कटाक्ष किया था. गौर हो कि मध्य प्रदेश में सिंधिया के वफादार विधायकों ने कांग्रेस छोड़ दी थी और बाद में उन्होंने मार्च 2020 में भाजपा का दामन थाम लिया था. इस वजह से 15 महीने में कमलनाथ के नेतृत्व वाली सरकार गिर गयी थी और शिवराज चौहान के सत्ता में लौटने का मार्ग प्रशस्त हुआ था.

ग्वालियर संभाग पर एक नजर

मध्य प्रदेश का ग्वालियर संभाग की बात करें तो इस राज्य के उत्तरी भूभाग के पांच जिलों को मिलाकर यह क्षेत्र बनता है. ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, अशोकनगर और गुना इसे क्षेत्र के जिले हैं. इन पांच जिलों में 21 विधानसभा सीटें हैं जिसमें सीधे तौर पर भाजपा और कांग्रेस के बीच जंग देखने को मिलती है. हर जिले में एक सीट अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के लिए आरक्षित रखी गयी है. मध्य प्रदेश की सियासत के हिसाब से यह कद्दावर नेताओं का गढ़ माना जाता है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया जैसे राजनीतिज्ञ का इस संभाग से गहरा नाता रहा है जो देश की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे. वहीं वर्तमान में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, वर्तमान शिवराज सरकार में मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा जैसे नेता भी इसी धरती से आते हैं जिनका नाम देश के शीर्ष नेताओं में गिनती की जाती है.

जनता ने दिया था कांग्रेस का साथ

साल 2018 की बात करें तो इस वर्ष हुए विधानसभा चुनाव के बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने में ग्वालियर का बड़ा योगदान था. वहीं साल 2020 में प्रदेश की सत्ता की करवट बदलने में ज्योतिरादित्य सिंधिया और इसी ग्वालियर-चंबल संभाग की अहम भूमिका देखने को मिली थी. मध्य प्रदेश में साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता पर काबिज हुई थी. पार्टी के दिग्गज नेता कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इस चुनाव में ग्वालियर संभाग के मतदाताओं ने कांग्रेस पर पूरा भरोसा जताया था. साल 2018 में ग्वालियर संभाग की 21 सीटों में से 16 कांग्रेस पर कांग्रेस का झंडा बुलंद हुआ था. वहीं इस क्षेत्र में भाजपा को 5 सीटों पर ही जीत मिली थी.

सिंधिया ने की थी कांग्रेस से बगावत

यदि आपको याद हो तो कांग्रेस सरकार से नाराज से चल रहे विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में सामूहिक इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद प्रदेश की कमलनाथ सरकार गिर गयी थी. इनमें ग्वालियर संभाग के 9 विधायक शामिल थे. इन विधायकों ने कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था. विधायकों ने इस्तीफे दिए तो नवंबर 2020 में जिन 28 सीटों पर उपचुनाव कराये गये. इसमें ग्वालियर जिले की 3 सीट ग्वालियर, ग्वालियर पूर्व और डबरा शामिल थीं. इसके साथ ही दतिया जिले की भांडेर, शिवपुरी जिले की 2 करैरा और पोहरी, गुना जिले की बमोरी और अशोकनगर जिले की 2 अशोकनगर व मुंगावली सीट पर उपचुनाव कराये गये थे.

उपचुनाव में भाजपा ने मारी बाजी

जहां साल 2018 के चुनाव में ग्वालियर संभाग में कांग्रेस ने 16 सीटों पर जीत का परचम लहराया था, वहीं वर्ष 2020 के उपचुनाव में भाजपा ने 6 सीटें और जीतकर प्रदेश की राजनीति में खलबली मचा दी. इस प्रकार कांग्रेस के पास 10 और भाजपा के पास 11 सीटें हो गईं. तीन सीटों डबरा, ग्वालियर पूर्व और करैरा में कांग्रेस अपना कब्जा बरकरार रखने में सफल रही थी. कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुईं पूर्व मंत्री डबरा विधायक इमरती देवी, ग्वालियर पूर्व के विधायक मुन्नालाल गोयल और करैरा के विधायक जसमंत जाटव को हार का मुंह देखना पड़ा. वहीं अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित भांडेर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी फूल सिंह बरैया केवल 161 वोटों से हारते नजर आये थे.

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इस बार किन मुद्दों के साथ उतरेगी कांग्रेस

बताया जा रहा है कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार, महंगाई और राज्य पर बढ़ते कर्ज समेत अन्य मुद्दे जोर-शोर से उठाएगी. सीधी पेशाब कांड को भी कांग्रेस मुद‍्दा बना सकती है. इस बीच आपको बता दें कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ऐसी 66 विधानसभा सीटों पर पैनी नजर रखे हुए हैं जो लंबे समय से भाजपा के कब्जे में है. पिछले कुछ महीनों में उन्होंने 35 जिले की 67 विधानसभा सीटों का दौरा किया और यहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया.

क्या है कांग्रेस की रणनीति

जो खबर सामने आ रही है उसके अनुसार इस बार कांग्रेस ने जो रणनीति तैयार की है. रणनीति के अनुसार, एक तो जहां पर कांग्रेस लगातार जीत दर्ज करती आ रही है, वहां पर वह पूरी ताकत के साथ लड़ेगी. जबकि दूसरी ओर जिन सीटों पर कांग्रेस कमजोर है, वहां पर किस रणनीति के तहत पार्टी को मजबूत किया जाए, इसपर पार्टी मंथन कर रही है. बताया जा रहा है कि दिग्विजय सिंह को इस काम पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने लगाया है. कांग्रेस ने इस बार प्रदेश में जीत दर्ज करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है.

आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में 10 संभाग और 52 जिले हैं. प्रदेश के 10 संभागों के अंतर्गत आने वाले जिलों की सूची इस प्रकार है….

1. भोपाल संभाग- भोपाल, रायसेन, राजगढ़, सीहोर, विदिशा

2. ग्वालियर संभाग- अशोकनगर, शिवपुरी, दतिया, गुना, ग्वालियर

3. नर्मदापुरम संभाग- हरदा, होशंगाबाद, बैतूल

4. चंबल संभाग- मुरैना, श्योपुर, भिंड

5. इंदौर संभाग- बड़वानी, बुरहानपुर, धार, इंदौर, झाबुआ, खंडवा, खरगोन, अलीराजपुर

6. जबलपुर संभाग- बालाघाट, छिंदवाड़ा, जबलपुर, कटनी, मंडला, नरसिंहपुर, सिवनी

7. रीवा संभाग- रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली

8. सागर संभाग- छतरपुर, दमोह, पन्ना, सागर, टीकमगढ़

9. शहडोल संभाग- शहडोल, उमरिया, डिंडोरी, अनूपपुर

10. उज्जैन संभाग- देवास, मंदसौर, नीमच, रतलाम, शाजापुर, उज्जैन

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गौर हो कि मध्य प्रदेश राज्य का गठन 1956 में किया गया था. ग्वालियर, इंदौर और भोपाल ब्रिटिश रियासतें आधुनिक मध्य प्रदेश का हिस्सा हैं. मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ का गठन 2000 में हुआ.

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Amitabh Kumar

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By Amitabh Kumar

अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.

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