Namami Ganga: नमामि गंगे योजना के तहत 68 फीसदी प्रोजेक्ट का काम हुआ पूरा

पिछले पांच साल में 208 परियोजनाओं का काम पूरा हो चुका है. जिसमें 76 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शामिल है और इस प्लांट की कुल क्षमता 3200 एमएलडी है. इसके अलावा 12641 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 71 नयी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिससे 2210 एमएलडी की सीवेज ट्रीटमेंट की क्षमता का विकास होगा.
Namami Ganga: गंगा और उसकी सहायक नदियों की निर्मलता और अविरलता को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरुआत की. राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत विभिन्न एजेंसियों को 21340 करोड़ रुपये वितरित किए गए हैं, जिसमें से 16025.97 करोड़ रुपये सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए आवंटित किया गया. कार्यक्रम के तहत कुल 524 परियोजनाओं को मंजूरी दी गयी, जिसमें से 355 परियोजनाएं (68 फीसदी) फरवरी 2026 तक पूरी हो चुकी हैं.
पिछले पांच साल में 208 परियोजनाओं का काम पूरा हो चुका है. जिसमें 76 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट शामिल है और इस प्लांट की कुल क्षमता 3200 एमएलडी है. इसके अलावा 12641 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 71 नयी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिससे 2210 एमएलडी की सीवेज ट्रीटमेंट की क्षमता का विकास होगा. औद्योगिक प्रदूषण को कम करने के लिए मथुरा सीईटीपी (6.25 एमएलडी) और जाजमऊ सीईटीपी (20 एमएलडी) पूरी हो चुकी हैं. साथ ही जैव विविधता संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश के सात जिलों में जैव विविधता पार्क और और उत्तर प्रदेश में तीन, बिहार में एक और झारखंड में एक 5 प्राथमिकता वाले वेटलेंड स्वीकृत किए गए हैं. गंगा और सहायक नदियों में समय के साथ प्रदूषण में कमी आ रही है. लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय जल संसाधन राज्य मंत्री राजभूषण चौधरी ने यह जानकारी दी.
जैवविविधता पर भी दिया जा रहा है जोर
नमामि गंगे के तहत राज्य वन विभाग के जरिये गंगा नदी के मुख्य धारा में एक फॉरेस्ट्री इंटरवेंशन प्रोजेक्ट लागू किया गया है. इस योजना के तहत लगभग 414 करोड़ रुपये खर्च कर 33024 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण किया गया है. वनीकरण के साथ ही मछली जैवविविधता और नदी डॉल्फिन के शिकार आधार को संरक्षित करने तथा गंगा बेसिन में मछुआरों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए गंगा में कुल 203 लाख भारतीय मेजर कार्प (आईएमसी) को संरक्षित करने का काम किया जा रहा है.
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), देहरादून और राज्य वन विभाग के सहयोग से डॉल्फिन, ओटर, हिलसा, कछुआ और घड़ियाल जैसी जलीय प्रजातियों के लिए विज्ञान आधारित प्रजाति पुनर्वास कार्यक्रम, बचाव और पुनर्स्थापन कार्यक्रम का असर दिख रहा है. इसके कारण डॉल्फिन, ओटर, हिलसा, कछुआ और अन्य नदी प्रजातियों में वृद्धि हुई है.
गंगा डॉल्फिन संरक्षण के तहत 28 नदियों का 8507 किलोमीटर क्षेत्र शामिल था. इसके अलावा घड़ियाल और कछुए के संरक्षण का भी अभियान चलाया गया. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) गंगा नदी के पांच मुख्य धारा वाले राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, और पश्चिम बंगाल के 112 स्थानों पर गंगा नदी की जल गुणवत्ता की मैन्युअल निगरानी करता है. बक्सर से भागलपुर के बीच आंशिक प्रदूषण बचा है. जबकि झारखंड में कोई भी गंगा क्षेत्र प्रदूषित नहीं हैं.
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